Srishti Khanda Extracted Page 644

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-644

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

अपरेण गते सूर्ये सलोकानां युगक्षये । तदा हिरण्यकशिपो दैत्यस्योपरिवेश््मनः ॥१४९॥ भांडागारायुधागारे निविष्टमभवन्मधु । असुराणां विनाशाय सुराणां विजयाय च ॥१४२॥ दृश्यंते विविधोत्पाता घोरा घोरनिदर्शनाः । एते चान्ये च बहवो घोररूपाः समुत्थिताः ॥९४३॥ दैत्येद्रस्य विनाशाय दृश्यंते रणशंसिनः । मेदिन्यां कंपमानायां दैत्येंद्रेण महात्मनः ॥१४४॥ महीधरा नागगणा निपेतुरमितौजसः । विषज्चालाकुलैर्वक्त्रैः र्विमुंचंतो हुताशनम् ॥९४५॥ चतुः शीर्षाः पंचशीर्षाः सप्तशीर्षाश्च पन्नगाः । वासुकिस्तक्षकश्चैव कर्कीटकधनंजयौ ॥१४६॥ एलामुखः कालियश्च महापद्याश्च वीर्यवान् । सहस्त्रशीर्षश्शुद्धांगो हेमतालध्वजः प्रभुः ॥१४७॥ शेषोनंतो महानागो ह्याप्रकंप्यश्च कंपिताः । दीप्यंतेंतर्जलस्थानि पृथिवीविवराणि वै ॥१४८॥ सप्तदैत्येंद्रकोपेन कंपितानि समंततः । नानातेजोधराश्चापि पातालतलचारिणः ॥१४९॥ पाताले सहसा क्षुब्धे दुष्प्रकंप्याः प्रकंपिताः । हिरण्यकशिपुर्दैत्यस्तदा संस्पृष्टवान्महीम् ॥१५०॥ संदष्टौष्टपुटः क्रुद्धो वराह इव पूर्वजः । गंगाभागीरथीचैव कौशिकी सरयूरपि ॥१५१॥ यमुना चाथ कावेरी कृष्णावेणी च निप्रगा। तुंगभद्रा महावेगा नदीगोदावरी तथा ॥१५२॥ चर्मण्वती च सिंधुश्च तथानदनदीपतिः। मेलकप्रभवश्चैव शोणोमणिनिभोदकः ॥१५३॥ नर्मदा च शुभस्रोतास्तथा वेत्रवती नदी । गोमती गोकुलाकीर्णा तथा पूर्वा सरस्वती ॥१५४॥ महाकालमहीचैव तमसापुष्पवाहिनी । जंबूद्वीपं रत्मवच्च सर्वरत्मोपशोभितम् ॥१५५॥ सुवर्णपुटकं चैव सुवर्णाकरमंडितम् । महानदश्च लौहित्यश्शैलः कांचनशोभितः ॥१५६॥ पड़ती थी । सभी जीवों की छाया में कोई परिवर्तन नहीं होता था ॥१४०॥ लोकों के युगक्षय (विनष्ट) की वेला में सूर्य के अपरभाग में पहुँच जाने पर उस समय हिरण्यकशिपु के ऊपर घर के भाण्डगार तथा युद्धागार में असुरों का विनाश करने के लिए तथा देवताओं को विजय प्रदान करने के लिए मधु ने प्रवेश किया ॥१४१-१४२॥ भयङ्कर परिणाम को उपस्थित करने वाले अनेक प्रकार के उत्पात होने लगे । ये सभी तथा इनके अतिरिक्त बहुत से दूसरे शकुन होने लगे ॥१४३॥ वे रण में दैत्येन्द्र के विनाश को सूचित करते थे । जब पृथिवी काँपने लगी तो दैत्येन्द्र के द्वारा ॥१४४॥ महा ओजस्वी पृथिवी को धारण करने वाले नागगण ऊपर से गिरे । वे विष की ज्वाला से भरे हुए अपने मुख से अग्नि उगल रहे थे ॥१४५॥ किसी के चार शिर थे तो किसी के पांच, किसी के सात शिर थे ऐसे पन्नग, वासुकी, तक्षक, धनञ्जय और कर्कोटक नामक सर्प थे ॥१४६॥ एलामुख, कालिय, पराक्रमी महापद्म । हजार शिरों वाले, शुद्धांग सुवर्णतालध्वज के समान ऊंचे ॥१४७॥ अनंत शेष अप्रकम्प्य महानाग भी काँपने लगे । पृथिवी फट गयी और उसके छिद्रों में जल दिखने लगा ॥१४८॥ हिरण्यकशिपु के क्रोध से ये सातो पाताल काँपने लगे । ये सभी तेजस्वी तथा पाताल में रहने वाले सर्प थे ॥१४९॥। सहसा पाताल के क्षुब्ध हो जाने पर दुष््रकम्प्य भी काँप गये उस समय हिरण्यकशिपु ने पृथिवी का स्पर्श किया ॥ १५०॥ क्रुद्ध वराह भगवान् के समान उसने क्रुद्ध होकर अपने ओठों को काट लिया, उससे भागीरथी गङ्गा, कौशिकी, सरयू ॥१५१॥ यमुना, कावेरी, कृष्णावेणी, तुद्ठभद्रा, महावेगा गोदावरी ॥१५२॥ चर्मण्वती, सिन्धु तथा नदों एवं नदियों के स्वामी सागर मणि के समान जल वाला तथा मेलक की उत्पत्ति स्थान शोणनद ॥१५३॥ मङ्गलमय स्रोत वाली नर्मदा, वेत्रवती नदी, गोकुल कीर्णा, गोमती नदी, प्राची सरस्वती ॥१५४।॥ महाकाल की नगरी (उज्जैन) तमसा, पुष्प वाहिनी, सभी रत्नों से सुशोभित और द्वीपों में रत्न के समान जम्बुद्वीप ॥१५५॥ सुवर्ण के खजाने से अलङ्कृत सुवर्ण पुटक, महानद, सुवर्ण से सुशोभित लौहित्य

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know