Srishti Khanda Extracted Page 642

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-642

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Sanskrit Original

अख्नैःप्रज्वलितैः सिंहमावृणोदसुरोत्तमः । विवस्वान् धर्मसमये हिमवंतमिवांशुभिः ॥११०॥ सहामर्षानिलोद्धूतो दैत्यानां सैन्यसागरः। क्षणेनाप्लावयत्सर्व मैनाकमिवसागरः॥ ९ ९ १॥ प्रासैः पाशैश्च खड्गैश्च गदाभिर्मुसलैस्तथा। वज्रैरशनिभिश्चैव बहुशाखैर्महाद्रुमैः॥९ ९ २॥ मुहर: कूटपाशैश्च शिलोलूखलपर्वतैः । शतष्नीभिश्च दीप्ताभिर्दडैरपि सुदारुणैः ॥११३॥ ते दानवाः पाशगृहीतहस्ता महेद्रतुल्याशनितुल्यवेगाः । समंततोभ्युद्यतबाहुकायाः स्थिताः सशीर्षा इव नागपोताः ॥१९४॥ सुवर्णमालाकुलभूषितांगाः सुतीक्ष्णदंष्ट्राकुलवक्त्रगर्ताः । स्फुरत्प्रभास्ते च सश्ृंगदेहाश्चीनांशुका भांति यथैवहंसाः ॥१९१५॥ सोसृजद्दानवो मायामग्निं वायुं समीरितम्। तमिंद्रस्तोयदैः सार्थ सहस््राक्षोमहाद्युतिः ॥११६॥ महता तोयवर्षेण शमयमास पावकम् । तस्यां प्रतिहतायां तु मायायां युधि दानव: ॥९९७॥ असृजद्धोरसंकाशं तमस्तीव्रं समंततः। तमसा संवृते लोके दैत्येष्वात्तायुधेषु च ॥९१८॥ स्वतेजसा परिवृतो दिवाकर इवोह्रतः। त्रिशिखां श्रुकुटीमस्य ददृशुदनिवा रणे ॥११९॥ ललाटस्थां त्रिकूटस्थां गङ्गां त्रिपथगामिव । ततः सर्वासु मयासु हतासु दितिनंदनाः ॥९२०॥ हिरण्यकशिपुं दैत्या विषण्णाश्शरणं ययुः। ततः प्रज्वलितः क्रोधात््रदहन्निवतेजसा ॥१२१॥ तस्मिन्क्ुद्धे तु दैत्येद्रे तमोभूतमभूज्जगत् । आवहःप्रवहश्चैव विवहोथ समीरणः ॥१२२॥ परावहस्संवहश्च उद्दहश्च महाबल: तथा परिवहः श्रीमानुत्पातभयशंसिनः ॥९२३॥ इत्येवं क्षुभिताः सप्त मरुतो गगनेचराः। येग्रहास्सर्वलोकस्य क्षये प्रादुर्भवति हि ॥१२४॥ है ॥११०॥ वह क्रोध से भरा हुआ मानो दैत्य सैन्य सागर भगवान् को प्राश, पाश, खड्ग, गदा, मुसल, वद्र, अशनि तथा अनेक शाखाओं वाले वृक्षो, मुद्र, कूट पाश, शिला, उलूखल, पर्वत, देदीप्यमान शतध्नी तथा भयङ्कर दण्ड उसी तरह से ढँक दिया जिसतरह मैनाक पर्वत को सागर ने ढँक लिया था ॥१११-११३॥ सभी दानव हाथ में प्राश लिए हुए, वद्र के वेग से युक्त इन्द्र के समान चारो ओर से हाथ उठाये हुए उसीतरह से खड़े हो गये, जैसे फन काढे हुए साँप के बच्चे खड़े हो ॥११४॥ उन सबों के अङ्ग सुवर्ण की माला से अलङ्कृत थे । उनके मुख तीक्ष्ण दाँतों से भरे थे उनकी कान्ति चमक रही थी । शरीर में सींग जमे थे । चीनांशुक से उनके शरीर हंस की भांति चमक रहे थे ॥११५॥ हिरण्यकशिपु ने माया के द्वारा वायु से प्रदीप्त अग्नि की सृष्टि कर दी तो इन्द्र ने मेघों के साथ अत्यधिक वर्षा के द्वार उस अग्नि को शान्त कर दिया । युद्ध में उस माया के विनष्ट हो जाने पर हिरण्यकशिपु ने ॥११६-११७॥। चारो ओर घोर अन्धकार की सृष्टि कर दी । संसार के अन्धकाराच्छन्न हो जाने पर तथा दैत्यों के आयुध धारण कर लेने पर तेजः सम्पन्न सूयोंदय सा हो गया । दानवों ने नृसिंह की टेढी भृकुटी को देखा।११८-११९॥ लगता था जैसे ललाटस्थ त्रिकूट पर त्रिपथगा गङ्गा प्रवाहित हो रही हो । उसके पश्चात् जब सारी मायायें विनष्ट हो गयीं उस समय सभी दैत्य ॥१२०।। उदास हो गये और दैत्य हिरण्यकशिपु के शरण में गये। हिरण्यकशिपु अपने क्रोध के तेज से प्रज्ज्वलित सा हो गया ॥१२१॥ उसके क्रुद्ध होने पर सारा जगत् अन्धकारमय हो गया और आवह तथा प्रवह नामक वायु चलने लगी ॥१२२॥ उन दोनों के साथ परावह, संवह उद्वह एवं महाबलवान् भय को सूचित करने वाली परिवह नामक वायु जोर से चलने लगी ॥१२३॥ आकाशगामी सातो वायु क्षुब्ध हो गयी । सम्पूर्ण लोकों के विनाश के समय जो ग्रह उदित होते हैं ॥१२४॥ वे सभी ग्रह. आकाश

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