Srishti Khanda Extracted Page 640

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-640

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Sanskrit Original

ऐश्वर्य दैत्यसिंहस्य यथा तस्यमहात्मनः । न श्रुतं नैव दृष्टं च कस्यापि भुवनत्रये ॥८०॥ रजतकनकचित्रवेदिकायां परिकृरत्मविचित्रवीथिकायाम् । स ददर्शमृगाधिपः सभायां सुरुचिरजालगवाक्षशोभितायाम् ॥८ १॥ कनकवलयहारभूषितांगं दितितनयं समृगाधिपो ददर्श । दिवसकरकरप्रभं ज्वलंतं दितिजसहस्त्रशतैर्निषेव्यमाणम् ॥८ २॥ ततो दृष्ट्वा महाभागं कालचक्रमिवागतम्। नारसिंहवपु$ छन्नं भस्मच्छन्नमिवानलम्॥८ ३॥ हिरण्यकशिपोः पुत्रः प्रह्लादो नामवीर्यवान् । दिव्येन वपुषा सिंहमपश्यद्देवमागतम् ॥८ ४॥ तं दृष्ट्वा रुक्मशैलाभमपूर्वा तनुमाश्रितम् । विस्मिता दानवाः सर्वे हिरण्यकशिपुश्च सः ॥८५॥ प्रहाद उवाच महाराजमहाबाहो दैत्यानामादिसंभव । न॒ श्रुतं नैव मे दृष्टं नारसिंहमिदं वपुः ॥८६॥ अव्यक्तं परमं दिव्यं किमिदं रूपमागतम्। दैत्यांतकरणं घोरं शंसतीव मनो मम ॥८७॥ अस्य देवाः शरीरस्थाः सागराः सरितस्तथा । हिमवान् पारियात्रश्च ये चान्ये कुलपर्वताः ॥८८॥ चंद्रमास्सहनक्षत्रैरादित्यारश्मिभिः सह । धनदो वरुणश्चैव यमः शक्रः शचीपतिः ॥८९॥ मरुतो देवगंधर्वा ऋषयश्चतपोधनाः । नागा यक्षाः पिशाचाश्च राक्षसा भीमविक्रमाः ॥९०॥ ब्रह्मा देवाः पशुपर्तिललाटस्था भ्रमंति हि । स्थावराणि च सर्वाणि जंगमानि तथैव च ॥९१॥ भवांश्च सहितोस्माभिः सर्वै दैत्यगणै वृतः । विमानशतसंकीर्णा सर्वा या भवतः सभा॥९२॥ सर्व त्रिभुवनं राजन् लोकधर्मश्च शाश्वतः। दृश्यते नरसिहेस्मिस्तथेदं निखिलं जगत् ॥९३॥ थे ॥७९॥ दैत्याग्रण्य हिरण्यकशिपु का जैसा ऐश्वर्य था वैसा ऐश्वर्य त्रैलोक्य में न तो किसी का सुना गया है और न देखा गया है ॥८०॥ रत्नों से चित्रित सोने और चाँदी की वेदी पर रत्न जटित गलियारे बनाये गये थे । सुन्दर-सुन्दर जिसकी खिडकियाँ थी । इन सबों से सुशोभित सभा में सुवर्ण के कंकण और हार से सुशोभित अड्डों वाले, सूर्य की किरणों के समान देदीप्यमान कान्ति वाले हिरण्यकशिपु को बैठे हुए भगवान् नृसिंह ने देखा ॥८ १-८ २॥ उसके पश्चात, महाभाग, कालचक्र के समान आये हुए नर और सिंह शरीर वाले भस्म से ढँकी हुयी अग्नि के समान।।८३॥ दिव्य शरीर वाले समागत भगवान् नरसिंह को हिरण्यकशिपु के पराक्रमी पुत्र प्रह्लाद ने देखा ॥८४॥ सुवर्ण पर्वत के समान कान्ति वाले, अपूर्व शरीरधारी उन भगवान् को देखकर सभी दानव तथा हिरण्यकशिपु सबके सब आश्चर्यित होगये ॥८५॥ प्रह्माद ने कहा-- हे महाराज ! हे महाबाहो ! हे दैत्यों में सबसे प्राचीन इस प्रकार का नारसिंह शरीर न तो मैंने कभी देखा है और न सुना है ॥८६॥ यह अव्यक्त और परम दिव्य शरीर कहाँ से आ गया ? मुक्षे तो लगता है कि यह भयङ्कर रूप दैत्यों का विनाश करने वाला है ॥८७॥ इसके शरीर में सभी देवता, सागर, नदियाँ, हिमालय, पारियात्र तथा दूसरे कुलपर्वत, सभी नक्षत्र, चन्द्रमा तथा सूर्य अपनी कान्तियों के साथ विद्यमान हैं । धनद, वरुण, शचीपति इन्द्र ॥८८-८९॥ मरुद्रण, देवता, गन्धर्व, तपस्वी ऋषिगण, नाग, यक्ष, पिशाच तथा भयंकर पराक्रमी राक्षस विद्यमान हें ॥९०॥ ब्रह्माजी, दूसरे देवता और पशुपति, इसके ललाट प्रदेश में विचरण कर रहे हैं। सभी स्थावर एवं जंगम ॥९१॥ और हमलोगों के साथ आप भी सभी दैत्यों के साथ विद्यमान हैं । सैकड़ों विमानों से भरी हुयी यह आपकी जो सभा है वह तथा ॥९२॥ राजन् सम्पूर्ण त्रैलोक्य शाश्वत लोकधर्म तथा सम्पूर्ण जगत् इस नरसिंह के भीतर दिखायी देते हैं ॥९३॥ इसमें ही प्रजापति, महात्मा मनु, महान् योगीगण, थिवी, आकाश, उत्पात

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