Srishti Khanda Extracted Page 639

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-639

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Sanskrit Original

चकोराः: शतपत्राश्च ॒ मत्तकोकिलशारिकाः । पुष्पितान् पुष्यिताग्रांश्च संपतंति महाद्रुमान् ॥६४॥ रक्तपीतारुणास्तत्र पादपाग्रगताः खगाः । परस्परमवैक्षंत प्रहृष्टा जीवजीवकाः ॥६५॥ तस्यां सभायां दैत्येंद्रो हिरण्यकशिपुस्तदा । आसीन आसने चित्रे दशनल्बप्रमाणतः ॥६६॥ दिवाकरनिभे दिव्ये दिव्यास्तरणसंस्तृते । हिरण्कशिपुर्दैत्य आस्ते ज्वलितकुंडलः॥६७॥ उपचेरुर्महादैत्या हिरण्यकशिपुं तदा। दिव्यतालानि गीतानि जगुर्गधर्वसत्तमाः ॥६८॥ विश्वाची सहजन्या च प्रम्लोचेति च पूजिता । दिव्याथ सौरभेयी च समीची पुंजिकस्थला॥६९॥ मिश्रकेशी च रंभा च चित्रभा श्रुतिविभ्रमा। चारुनेत्रा घृताची च मेनका चोर्वशी तथा ॥७०॥ एतास्सहस्रशश्चान्या नृत्यगीतविशारदाः । उपातिष्ठत राजानं हिरण्यकशिपुं प्रभुम् ॥७१॥ उपासते दितेः पुत्राः सर्वे लब्धवरास्तथा। बलि र्विरोचनस्तत्र नरकः पृथिवीसुतः ॥७२॥ प्रह्मादो विप्रचित्तिश्च गविष्ठश्च महासुरः। सुरहन्ता दुःखकर्ता सुमनास्सुमतिस्तथा ॥७३॥ घटोदरो महापार्श्वः क्रथनः पिठरस्तथा । विश्वरूपस्वरूपश्च विश्वकायो महाबलः ॥७४॥ दशग्रीवश्च वाली च मेघवासा महासुरः । घटाभो विटरूपश्च ज्यलनकश्चेंद्रतापनः॥७५॥ दैत्यदानवसंघास्ते सर्वे ज्वलितकुंडलाः । स्रग्विणो वर्मिणः सर्वे सर्वे च चरितव्रताः ॥७६॥ सर्वे लब्धवराः शूरास्सर्वे विहितमृत्यवः । एते चान्ये च बहवो हिरण्यकशिपुं प्रभुम् ॥७७॥ उपासते महात्मानं सर्वे दिव्यपरिच्छदाः । विमानै र्विविधाकारै भ्राजमानैरिवाप्रिभिः ॥७८॥ महेन्द्रवपुषः सर्वे विचित्रांगदबाहवः। भूषितांगा दितेः पुत्रास्तमुपासत सर्वतः ॥७९॥ वन में उत्पन्न होने वाले वृक्ष, अनेक प्रकार के पुष्प तथा फलों से युक्त होने के कारण सुशोभित हो रहे थे ॥६३॥ चकोर पक्षी, शतपत्र पक्षी, मदमत्त कोकिलाएँ और शारिकाएँ जिनके अग्रभाग में पुष्प विकसित थे, ऐसे बड़े-बड़े वृक्षों पर बैठे थे ॥६४॥ वृक्षों के अग्रभाग में रक्तवर्ण के, पीले तथा अरुण वर्ण के पक्षियों को पक्षियों पर अपनी जीविका चलाने वाले जीव प्रसन्नता पूर्वक देख रहे थे ॥६५॥ उस सभा में दैत्येन्द्र हिरण्यकशिपु विचित्र आसन पर बैठा था उसका प्रमाण दश नल्व था ॥६६॥ जिस पर दिव्य चादर बिछी थी ऐसी दिव्य शय्या पर, सूर्य के समान कान्तिमान हिरण्यकशिपु बैठा था, उसका कुण्डल चमक रहा था ॥६७॥ उस समय बड़े-बड़े दैत्य हिरण्यकशिपु की सेवा कर रहे थे । बड़े-बड़े गन्धर्व दिव्यतालों को गा रहे थे ॥६८॥ विश्वाची, सहजन्या, प्रम्लोचा, पूजिता, दिव्या, सौरभेयी, समीची, पुंजिकस्थला ॥६९॥ मिश्रकेशी तथा रम्भा चित्रभा, श्रुतिविभ्रमा, चारुनेत्रा, घृताची, मेनका तथा उर्वशी।।७०॥ ये सभी तथा अन्य हजारों अप्सराएँ जो नृत्य तथा गीत में निपुण थीं, वे स्वामी हिरण्यकशिपु की सेवा करती थीं॥७१॥ सभी वरदान प्राप्त दैत्य, बलि, विरोचन, पृथिवी पुत्र नरकासुर ॥७२॥। प्रह्माद, विप्रचित्ति, महान असुर गविष्ठ, सुरहन्ता, दुःखकर्त्ता, सुमना, सुमति ॥७३॥ घटोदर, महापार्श्व, क्रथन, पिठर, विश्वरूप, स्वरूपतः, महाबलवान् विश्वकाय ॥७४॥ दशग्रीव, वाली, महान् असुर मेघवासा, घटाभ, विटरूप, ज्वलन तथा इन्द्रतापन।।७५॥ इन सभी दैत्य एवं दानव समुदाय के कुण्डल चमक रहे थे । सभी माला तथा कवच धारण किए हुए थे, सबों ने रतानुष्ठान किया था ॥७६॥ सबके सब वरदान प्राप्त थे, तथा सबों की मृत्यु विहित थी । ये सभी तथा दूसरे भी दैत्य अपने स्वामी हिरण्यकशिपु की सेवा में थे ॥७७॥ सबों का अलङ्कार दिव्य था । वे अनेक प्रकार के अग्नि के समान देदीप्यमान विमानों से सुशोभित होते थे ॥७८॥ सबके सब महेन्द्र के समान शरीर वाले अपनी भुजाओं में अद्भुत केयूर (अङ्गद) धारण किए थे । सबों के अङ्ग अलंकृत थे और हर प्रकार से हिरण्यकशिपु की सेवा करते

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