Srishti Khanda Extracted Page 638
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-638
Sanskrit Original
पुष्पिताग्रान् महाशाखान् प्रवालांकुरधारिण: । लतावितानसंछन्नान् कल्पानैक्षिष्ट स प्रभुः ॥४७॥ गंधवंति च पुष्पाणि रसवंति फलानि च । तानि शीतानि चोष्णानि तत्र तत्र सरांसि च ॥४८॥ अपश्यद्धूपतीर्थानि सभायां तस्य स प्रभुः । नलिनैः पुंडरीकैश्च शतपत्रैः सुर्गंधिभिः ॥४९॥ रक्तैः कुवलयैश्चैव कल्हारैरुत्पलैस्तथा। नानाश्चर्यसमोपेतैः पुष्पैरन्यैश्चसुप्रियैः ॥५०॥ कारंडवैश्चक्रवाकैः सारसैः कुररैरपि । विमलस्फटिकाभानि पांडुरच्छदनैद्धिजै: ॥५१॥ बहुहंसोपगीतगनि सारसानां रुतानि च । गंधयुक्ता लतास्तत्र पुष्पमंजरिधारिणीः ॥५ २॥ दृष्टवान् भगवान् हृष्टः खादिरान् वेतसार्जुनान्। चूता निम्बा नागवृक्षाः कदंबा वकुला धवाः ॥५३॥ प्रियंगव: पाटलाख्याः शाल्मल्यस्सहरिद्रवाः । शालास्तालास्तमालाश्च चम्पाकाश्च मनोरमाः ॥५४॥ तथैवान्ये व्यराजत सभायां पुष्पिता द्रुमाः । एला ककुभकंकोललवलीकर्णपूरकाः ॥५५॥ मधूकाः कोविदाराश्च बहुतालसमुच्छ्याः। अंजनाशोकपर्णासा बहवश्चित्रकाद्ुमाः ॥५६॥ वरुणाश्च पलाशाश्च पनसास्सहचंदनैः । नीलास्सुमनसश्चैव नीपाश्चाश्वत्थ तिंदुकाः ॥५७॥ पारिजाताश्च तरवो मल्लिका भद्रदारवः । अटरूषाः पीलुकाश्च तथाचैवैलवालुकाः ॥५८॥ मंदारकाः कुरवका पुन्नागाः कुटजास्तथा। रक्ताः कुरवकाश्चैव नीलाश्चागरुभिः सह ॥५९॥ किंशुकाश्चैव भव्याश्च दाडिमा बीजपूरकाः । कालेयका दुकूलाश्च हिंगवस्तैलवर्त्तिकाः ॥६०॥ खर्जूरा नालिकेराश्च हरीतकमधूककाः । सप्तपर्णाश्च बिल्वाश्च सयावाश्च शरावताः ॥६१॥ असनाश्च तमालाश्च नानागुल्मसमावृताः । लताश्च विविधाकाराः पुष्पपत्रफलोपगाः ॥६२॥ एते चान्ये च बहवस्तत्र काननजा द्रुमाः । नानापुष्पफलोपेता व्यराजन्त समंततः ॥६३॥ और सर्दी में गर्म रहता था ॥४६॥ नरसिंह भगवान् ने वहाँ पर विद्यमान कल्प वृक्ष की बड़ी-बड़ी शाखाओं को देखा, जिनके अग्रभाग में पुष्प विकसित थे । अङ्कुर से युक्त प्रवालों को धारण करने वाले तथा लता समूह से ढँके हुए थे ॥४७॥ पुष्प सुगन्धि युक्त थे और फल रस युक्त थे । विभिन्न स्थानों पर गर्म तथा शीतल जल वाले सरोवर थे ॥४८॥ हिरण्यकशिपु की सभा में भगवान् ने राजा का सरोवर देखा जो कमलिनी, श्वेत कमल तथा शतपत्रो से सुगन्धित था ॥४९॥ रक्त कमल, कह्लार, नील कमल तथा अनेक आश्चर्य मय दूसरे अत्यन्त प्रिय पुष्पों से सुशोभित था ॥५०॥ वह कारण्डव, चक्रवाक, सारस एवं कुरर पक्षियों से विमल स्फटिक के समान धवल ओष्ठों वाले दाँतों से सुशोभित था ॥५१॥ उसमें बहुत से हंस बोल रहे थे और सारस पक्षी बोल रहे थे । पुष्पां तथा मञ्जरी से युक्त सुगन्धित लताएँ थीं ॥५२॥ श्रीभगवान् ने वहाँ प्रसन्नता पूर्वक खैर, वेंत तथा अर्जुन के वृक्षों को देखा । आम, निम्ब, पुन्नागवृक्ष, कदम्ब, बकुल, धव ॥५३॥ प्रियङ्गु, पाटल, सेमर, हरिद्रव, शाल, ताल, तमाल तथा मनोहर चम्पा ॥५४॥ तथा दूसरे 'भी वृक्ष उस सभा में सुशोभित होते थे । एला (इलायची), कुंकुम, कङ्कोल, लवङ्ग, कर्णपूरा।॥५ ५;। महुआ, कोविदार तथा ऊँचे-ऊँचे ताल वृक्ष, अञ्जन, अशोक, पर्णास तथा बहुत से अद्धुत वृक्षा वहाँ पर लगे थे ॥५६॥ वरुण, पलास, चन्दन, नीले पुष्प, नीप (एकतरह का कदम्ब) पिप्पल, तिंदुक ॥५७॥ पारिजात के वृक्ष, मल्लिका, भद्रदार, अटरूष, पीलुक, ऐलवालुक ॥५८॥ मन्दार, कुरवक, पुन्नाग, कुटज, रक्त कुरवक, नीला कुरवक, अगरु ॥५९॥ किंशुक, भव्यअनार, बीजपूर, कालेयक, दुकूल, हींगु, तैलवर्ती ॥६०॥ खजूर, नारिकेल, हरीतक, मधूक, सप्तपर्ण (सप्तछद) विल्व, सयावा तथा शरावत ॥६१॥ असन तथा अनेक प्रकार के गुल्मों से आच्छन्न तमाल, पुष्प, पत्र तथा फल से भरी हुई अनेक प्रकार की लतायें ॥६२॥ ये सभी तथा बहुत से
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