Srishti Khanda Extracted Page 637
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-637
Sanskrit Original
श्रीपद्ममहापुणण विष्णुरुवाच भयं त्यजध्वममरा अभयं वो ददाम्यहम्। तथैव त्रिदिवं देवाः प्रतिपद्यत माचिरम्॥३२॥ एनं हि सगणं दैत्यं वरदानेन गर्वितम् । अवध्यममरेद्राणां दानवेंद्रं निहन्म्यहम् ॥३३॥ एवमुक्त्वा तु भगवान् विश्वपो विष्णुरव्ययः । हिरण्यकशिपुस्थानं जगाम हरिरीश्वरः ॥३४॥ तेजसाभास्काराकारः शशीकांत्येव चापरः । नरस्य कृत्वार्धतनुं सिंहस्यार्द्धतनुं तथा ॥३५॥ नारसिंहेन वपुषा पाणिं संगृह्ण पाणिना । ततो ददर्श विस्तीर्णा दिव्यां रम्यां मनोरमाम् ॥३६॥ सर्वकामयुतां शुभ्रां हिरण्यकशिपोः सभाम् । विस्तीर्णा योजनशतं शतमध्यर्द्धमायताम् ॥३७॥ वैहायसीं कामगमां पंचयोजनमुच्छिताम् । जराशोकक्षमापेतां निष्प्रकम्प्यां शिवां सुखाम्॥३८॥ वेश्मासनवतीं रम्यां ज्वलंतीमिव तेजसा । अंतःसलिलसंयुक्तां विहिता विश्वकर्मणा ॥३९॥ दिव्यवर्णमयैर्वृक्षैः फलपुष्पप्रदैर्युताम् । नीलपीतासितश्यामैः श्रेतैलोहितकैरपि ॥४०॥ अवदातैस्तथागुल्मै रक्तमंजरिधारिभिः । सिताभ्रधनसंकाशां प्लवंतीं च ददर्श सः ॥४१॥ रश्मिमती स्वभावेन दिव्यगंधमनोरमा । सुसुखा न च दुःखा सा न शीता न च घर्मदा॥४२॥ न क्षुत्पिपासे ग्लानिं वा प्राप्य तां प्राप्नुवंति ते। नानारूपै रुपकृता सुचित्रैश्च सुभास्वरैः ॥४३॥ अतिचंद्रातिसूर्यातिशिखिकान्तिस्वयंप्रभा । दीप्यते नाकपृष्ठस्था भासयंती विभासुरा ॥४४॥ सर्वे चकाशिरे तस्यां मुदिताश्चैव मानुषाः । रसवच्च प्रभूतं च भक्ष्यभोज्यान्नमुत्तमम् ॥४५॥ पुण्यगंधा स्तरजश्चापि नित्यकालफलाहुमाः । उष्णे शीतानि तोयानि शीते चोष्णानि संति वै॥४६॥ सर्वश्रेष्ठ देव हें ॥३१॥ भगवान् विष्णु ने कहा-- देवताओं आपलोग भय छोड दें । मैं आपलोगों को अभय प्रदान करता हूँ । शीघ्र ही आपलोग पहले के समान स्वर्ग को प्राप्त कर लेंगे ॥३२॥ वरदान से गर्वित तथा देवताओं के लिए अवध्य इस दैत्य का में वध करूंगा ॥३३॥ इस तरह से कहकर विश्व की रक्षा करने वाले श्रीहरि भगवान् विष्णु हिरण्यकशिपु के स्थान पर चले गये ॥३४।॥ उस समय भगवान् का आकार सूर्य के समान तेजस्वी तथा चन्द्रमा के समान कान्तिमान था । उन्होंने अपना आधा शरीर मनुष्य का तथा आधा शरीर सिंह का बना लिया।।३५॥ नरसिंह शरीर से अपने हाथ में मणि लेकर श्रीभगवान् ने हिरण्यकशिपु की विस्तीर्ण, दिव्य, मनोहर ॥३६॥ सभी काम्य पदार्थो से युक्त तथा शुभ सभा को देखा । वह सभा सौ योजन लम्बी तथा पचास योजन चौड़ी थी ॥३७॥ वह सभा आकाश में स्थित थी इच्छानुसार चला करती थी । वह पाँच योजन ऊँची थी, जरा, शोक एवं क्षमा से रहित, अचल, कल्याणमयी और सुखप्रद थी ॥३८॥ गृहों तथा आसनों से युक्त, मनोहर तथा तेज से देदीप्यमान थी । उसके भीतर जल भरा था । उसको विश्वकर्मा ने बनाया था ॥३९॥ उसमें दिव्य वणों वाले तथा फल एवं पुष्प देने वाले वृक्ष लगे थे । वे नीला, पीला, श्वेत, श्याम, लाल तथा स्वच्छ गुल्मों एवं लाल मञ्जरियों को धारण किए थे । श्वेत मेघ के समान तथा चलती हुयी उस सभा को भगवान् नरसिंह ने देखा ॥४०-४१॥ वह सभा स्वभावत: कान्ति सम्पन्न, दिव्य गन्ध से मनोरम, दुःख रहित, सुखप्रद और समशीतोष्ण थी ॥४२॥ उस सभा में जाने पर किसी को भी भूख, प्यास तथा श्रान्ति नहीं होती थी । वह अनेक प्रकार के देदीप्यमान चित्रों से अलंकृत थी ॥४३॥ सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि से भी अधिक स्वाभाविक कान्ति से दीप्यमान वह स्वर्ग लोक में सुशोभित होती थी ॥४४।॥ उस सभा में सभी मनुष्य प्रसन्न और प्रकाशित होते थे । उसमें उत्तम कोटि के रसयुक्त भक्ष्य भोज्य अन्न प्रभूत मात्रा में विद्यमान थे ॥४५॥ वहाँ की मालाएँ सुगन्धि युक्त तथा वृक्ष सदैव फल देते रहने वाले थे । वहाँ जल गर्मी में शीतल
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know