Srishti Khanda Extracted Page 636

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-636

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

ततो देवाश्च गंधर्वा ऋषिभिः सहचारणाः । वरप्रदानं श्रुत्वैव॑ पितामहमुपस्थिता: ॥१८॥ देवा ऊचुः वरप्रदानाद्धगवन्वधिष्यति स नो सुरः । तत्प्रसादश्च भगवन् वधोप्यस्य विचित्यताम्॥१९॥ भगवान् सर्वभूतानामादिकर्तता स्वयंप्रभुः । स्रष्टा च हव्यकव्यानामव्यक्तप्रकृतिः परः ॥२०॥ सर्वलोकहितं वाक्यं श्रुत्वा देवः प्रजापतिः । आश्वासयामास तदा सुशीतै र्वचनांबुभिः॥२१॥ अवश्यं त्रिदशानेन प्राप्तव्यं तपसः फलम् । तपसोऽन्तेस्य भगवान्वधं विष्णुः करिष्यति ॥२२॥ तच्छुत्वा विबुधा वाक्यं सर्वे पङ्कजाननात् । स्वानि स्थानानि दिव्यानि विप्रजग्मु ् मुदान्विताः॥२३॥ लब्धमात्रे वरे सोऽथ प्रजास्सर्वा अबाधत । हिरण्यकशिपुर्दैत्यो वरदानेन गर्वितः ॥२४॥ आश्रमेषु महाभागान्मुनीन्वै शंसितव्रतान् । सत्यधर्मपरान् दान्तान् घर्षयामास दानवः ॥२५॥ देवांस्त्रिभुवनस्थांश्च पराजित्य महासुरः । त्रैलोक्यं वशमानीय स्वर्गे वसति दानवः ॥२६॥ यदा वरमदोत्सिक्तश्रोदितः कालधर्मिणा। यज्ञियानकरोद्दैत्यानयज्ञीयांश्च दैवतान् ॥२७॥ तथा दैत्याश्च साध्याश्च विश्वे च वसवस्तथा । रुद्रा देवगणा यक्षा देवद्विजमहर्षयः॥२८॥ शरण्यं शरणं विष्णुमुपतस्थुर्महाबलम्। देवदेवं यज्ञमयं वासुदेवं सनातनम् ॥२९॥ देवा ऊचुः नारायणमहाभाग देवास्त्वां शरणं गताः । त्रायस्व जहि दैत्येंद्रं हिरण्यकशिपुं प्रभो ॥३०॥ त्वं हि नः परमोदाता त्वं हि नः परमो गुरु: त्वं हि नः परमो देवो ब्रह्मादीनां सुरोत्तमः ॥३९॥ अपने वैराज नामक भवन में चले गये ॥१७॥ उसके बाद हिरण्यकशिपु को इस प्रकार की बात सुनकर देवता, गन्धर्व, ऋषिगण तथा चारणगण ब्रह्माजी के पास आये ॥१८॥ देवताओं ने कहा-- भगवन् ! वर को प्राप्त करके वह हमलोगों का वध करेगा । अतएव आप उसके वध का भी उपाय सोचिए ॥१९॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- सभी जीवों के आदि कर्ता, भगवान् प्रजापति तथा स्वयं प्रभु सृष्टि करने वाले हैं, वे ही हव्य और कव्य की सृष्टि करने वाले है, अव्यक्त तथा प्रकृति से परे (ऊपर) हैं ॥२०॥ सम्पूर्ण लोकों का कल्याण करने वाले वाक्य को सुनकर ब्रह्माजी ने उन लोगों को शीतल वचन रूपी जल से सींचते हुए आश्वासन दिया ॥२१॥ ब्रह्माजी ने कहा-- उसको अपनी तपस्या का फल अवश्य मिलना चाहिए । जब उसकी तपस्या समाप्त हो जायेगी तो भगवान् विष्णु , उसका वध करेंगे ॥२२॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- ब्रह्माजी के उस वाक्य को सुनकर सभी देवता प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने स्थान पर चले गये ॥२३॥ वरदान के गर्व से गर्वित हिरण्यकशिपु दैत्य वरदान प्राप्त कर लेने के पश्चात् सम्पूर्ण प्रजाओं को दुःख देने लगा ॥२४॥ वह दानव आश्रमों में रहने वाले प्रशंसित व्रत वाले, सत्य व्रत का पालन करने वाले तथा दमगुण सम्पन्न मुनियों को अपमानित किया ॥२५॥ वह महान् असुर त्रैलोक्य के देवताओं को .परास्त करके त्रैलोक्य को अपने वश में करके स्वर्ग में ही रहने लगा ॥२६। जब वरदान के मद से मत्त वह काल धर्म से प्रेरित होकर यज्ञीय देवताओं को अयज्ञीय बना दिया ॥२७॥ उस समय दैत्य, साध्यगण विश्वेदेव, वसुगण, रुद्रगण, देवगण, यक्ष, देवता, ब्राह्मण तथा महर्षिण ॥२८॥ सबों के आश्रय, सबों के रक्षक महाबलवान् देवाराध्य, यज्ञस्वरूप, सनातन वासुदेव भगवान् विष्णु की शरण में गये ॥२९॥ देवताओं ने कहा-- हे महाभाग नारायण ! सभी देवता आपके शरण में आये हैं, आप रक्षा कीजिये । प्रभो ! आप दैत्य हिरण्यकशिपु का वध कीजिये ॥३०॥ आप ही हमलोगों के सर्वश्रेष्ठ दाता और परमगुरु हैं । हे सुरोत्तम ! आप ही हम ब्रह्मा आदि के

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know