Srishti Khanda Extracted Page 635
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-635
Sanskrit Original
दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च । जलवासी समभवत् स्नानमौनधृतव्रतः ॥३॥ वृतः शमदमाभ्यां च ब्रहाचर्येण चैव हि । ब्रह्मा प्रीतो भवत्तस्य तपसा नियमेन च ॥४॥ ततः स्वर्यंभूर्भगवान्स्वयमागत्य तत्र हि । विमानेनार्कवर्णेन हंसयुक्तेन भास्वता ॥५॥ आदित्यै र्वसुभिः साध्ये रमरुद्धिदैवतैस्सह । रुद्रैर्विश्वसहायैश्च यक्षराक्षसपन्नगैः ॥६॥ दिग्भिञ्चैवविदिग्भिश्च नदीभिः सागरैस्तथा। नक्षत्रैश्च मुहू्तैश्रच खचरैश्च महाग्रहैः ॥७॥ देवैब्रहर्षिभि: सार्ध सिद्धैः सप्तर्षभिस्तथा। राजर्षिभिः पुण्यकृद्भि गन्धर्वाप्सरसांगणैः ॥८॥ चराचरगुरुः श्रीमान् वृतः सर्वैर्दिवौकसैः । ब्रह्मा ब्रह्मविदां श्रेष्ठो दैत्यं वचनमब्रवीत् ॥९॥ प्रीतोस्मि तव भक्तस्य तपसानेन सुव्रत। वरं वरय भद्रं ते यथेष्टं काममाप्नुहि ॥१०॥ हिरण्यकशिपुरुवाच नदेवासुरगंधर्वा नयक्षोरगराक्षसाः । न मानुषाः पिशाचाश्च हन्युर्मा देवसत्तम ॥११॥ ऋषयो मानवाः शापैर्नशपेयुः पितामह । यदि मे भगवान्प्रीतो वर एष वृतो मया ॥१२॥न शस्त्रेण न चास्त्रेण गिरिणा पादपेन वा। न शुष्केण न चार्द्रेण नस्याच्चान्येन मे बधः ॥१३॥ भवेयमहमेवार्कः सोमो वायुर्हृताशनः । सलिलं चांतरिक्षं च नक्षत्राणि दिशो दश ॥१४॥ अहं क्रोधश्च कामश्च वरुणो वासवो यमः। धनदश्च धनाध्यक्षो यक्षः किंपुरुषाधिपः॥१५॥ ब्रह्मोवाच एष दिव्यो वरस्तात मयादत्तस्तवाद्भुतः । सर्वकामप्रदो वत्स प्राप्स्यसि त्वं न संशयः ॥९६॥ एवमुक्त्वा स भगवान् जगामाकाशमेव हि। वैराजं ब्रह्मसदनं ब्रह्मर्षिगणसेवितम् ॥१७॥ में कृतयुग (सत्ययुग) में दैत्यों के स्वामी हिरण्यकशिपु ने घोर तपस्या की ॥२॥ वह स्नान तथा मौन का व्रत धारण करके ग्यारह हजार वर्षो तक जल में रहा ॥३॥ शम, दम तथा ब्रह्मचर्य को धारण करने वाले उस पर ब्रह्माजी उसकी तपस्या तथा .यम को देखकर प्रसन्न हो गये ॥४॥ उसके बाद सूर्य के समान देदीप्यमान तथा हंस से युक्त विमान से ब्रह्माजी स्वयं वहाँ आये ॥५॥ ब्रह्माजी के साथ आदित्यगण, वसुगण, साध्यगण तथा मरुद्रण आदि देवता विद्यमान थे । रुद्रगण, विश्वेदेव, यक्ष, राक्षस और पन्नग ॥६॥ दिशा, विदिशा, नदियाँ, सागर, नक्षत्र, मुहूर्त, ग्रहगण, महाग्रह ॥७॥ इत्यादि देवता, ब्रह्मर्षियों के साथ सिद्धगण, सप्तर्षिगण, राजर्षिगण, पुण्यवान पुरुष, गन्धर्व तथा अप्सराएँ ॥८॥ इन सबों के साथ चराचर गुरु ब्रह्माजी सभी देवताओं से वे घिरे थे । ब्रह्म ज्ञानियों में श्रेष्ठ त्रह्माजी ने दैत्य हिरण्यकशिपु से कहा ॥९॥ ब्रह्माजी ने कहा-- तुम्हारी इस तपस्या से हे सुब्रत भक्त ! मैं प्रसन्न हूँ; अतएव अपने मनोनुकूल तुम वरदान माँगो ॥१०॥ हिरण्यकशिपु ने कहा-- हे देवश्रेष्ठ ! मुझे देवता, असुर,गन्धर्व, यक्ष, उरग, राक्षस, मनुष्य तथा पिशाच नहीं मार सकें ॥११॥ हे पितामह ! मुझे ऋषिगण तथा मनुष्य शाप नहीं दे सकें । यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मैं यही वरदान माँगता हूँ ॥१२॥ शस्त्र, अस्तर, पर्वत तथा वृक्ष से भी मेरी मृत्यु न हो, न सुखी वस्तु से न गीली वस्तु से मेरी मृत्यु हो । अन्य किसी भी वस्तु से मेरी मृत्यु न हो ॥१३॥ सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, जल, अन्तरिक्ष, नक्षत्र, दशो दिशाएँ मैं ही हो जाऊं ॥१४॥ मैं ही क्रोध, काम, वरुण, इन्द्र, वसुगण, यम, धनाध्यक्ष कुबेर, यक्षों तथा किं पुरुषों का स्वामी हो जाऊं ।!१५॥ ब्रह्माजी ने कहा-- तात ! मैंने यह दिव्य तथा अद्भुत वरदान तुमको दे दिया । हे वत्स ! मैं सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला हूँ । इसमें कोई संशय नहीं है ॥१६॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- यह कहकर ब्रह्माजी, आकाश में ब्रह्मर्षि समूह सेवित
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