Srishti Khanda Extracted Page 634
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-634
Sanskrit Original
गतासुः स पपातोर्व्यां प्रलये भूधरो यथा । विकीर्ण मकुटोष्णीषो विस्रस्ताखिलभूषणः ॥२१२॥ तस्मिन्विनिहते दैत्ये दानवानां धुरंधरे । नाभूत्कश्चित्तदा दुःखी नरकेष्वपि पापकृत् ॥२१३॥ स्तुवंतः षण्मुखं देवाः प्राक्रीडन्नागतस्मिताः । जग्मुः स्वानेवभुवनान्निरस्यासंस्तथोत्सुकाः ॥२१४॥ ददुश्चापि वरं सर्वे देवाश्च षण्मुखं प्रति । तुष्टाः संप्राप्तसर्वार्थास्सहसिब््वैस्तपोधनैः ॥ २ १५॥ देवा ऊचुः यः पठेत्स्कंदसंबंधां कथामेतां महामतिः। शृणुयाच्छावयेद्वापि स भवेत्कीर्तिमान्नरः ॥२१६॥ बह्वायुः सुभगः श्रीमान् कीर्तिमान् शुभदर्शनः । भूतेभ्यो निर्भयश्चापि सर्वदुः खविवर्जितः ॥२ ९७॥ संध्यामुपास्य यः पूर्वा स्कंदस्य चरितं पठेत् । सयुक्तः किन्नरैः सर्वै र्महाधनपतिर्भवेत् ॥२१८॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे कुमारसंभवतारकवघो नाम चतुशचत्वारिशत्तमोऽध्यायः ॥४४॥ — Ae पैतालिसवाँ अध्यायय भीष्म उवाच इदानीं श्रोतुच्छिमि हिरण्यकशिपोर्वधम् । नरसिंहस्य माहात्म्यं तथा पापविनाशनम् ॥१॥ पुलस्त्य उवाच पुरा कृतयुगे राजन् हिरण्यकशिपुः प्रभुः । दैत्यानामादिपुरुषश्चकार सुमहत्तपः ॥ २॥ समान ध्वनि करने वाली उस शक्ति ने वज्र निर्मित पर्वत के समान कर्कश तारकासुर के हृदय को चीर दिया॥२११॥ मरकर वह प्रलय काल में पर्वत के समान पृथिवी पर गिर पड़ा । उसके मुकुट, उष्णीश तथा सारे भूषण विखर गये।२१२॥ दानवों में धुरन्धर उस दैत्य के मार दिये जाने पर नरकों में विद्यमान कोई पापी भी दुःखी नहीं हुआ।२१३॥ जिनके मुख पर मुस्कान आ गयी थी वे देवता षण्मुख की स्तुति करते हुए क्रीडा करने लगे । वे अपने लोकों में चले गये तथा मनुष्य प्रसन्न हो गये ॥२१४॥ सभी देवताओं ने षण्मुख को वरदान दिया । सिद्ध तथा मुनिगण प्रसन्न हो गये उनको मानों सर्वार्थ की प्राप्ति हो गयी ॥२१४॥। सभी देवताओं ने षण्मुख को वरदान दिया सिद्ध तथा मुनिगण प्रसन्न हो गये । उनको भी मानों सर्वार्थ की प्राप्ति हो गयी ॥२१५॥ देवताओं ने कहा-- जो बुद्धिमान् व्यक्ति स्कन्द की इस कथा को पढेगा, सुनेगा या सुनायेगा वह मनुष्य यशस्वी होगा ॥२१६। उसकी आयु बहुत होगी । वह सुनकर और ऐश्वर्य सम्पन्न होगा । सभी दुखों से रहित वह भूतों से निर्भय होगा ॥२१७॥ जो प्रातः संध्या करके स्कन्द चरित का पाठ करेगा, वह सभी किन्नरों के साथ महाधनवान् होगा ॥२१८॥ इस तरह श्रीपद्मपुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड का कुमारोत्पत्ति तथा तारकवध नामक चौवालिसवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। ४४।। —— ke नृसिंहावतार का वर्णन और हिरण्यकशिपुवध का वर्णन भीष्मजी ने कहा-- अब मैं हिरण्यकशिपु के वध की कथा को सुनना चाहता हूँ भगवान् नृसिंह की महिमा तथा उस पापी हिरण्यकशिपु का विनाश सुनना चाहता हूँ ॥१॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- हे राजन् ! प्राचीन काल व्हत
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