Srishti Khanda Extracted Page 633

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-633

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Sanskrit Original

करेण तं च जग्राह कार्तिकेयोऽमरारिहा । गदां मुमोच दैत्याय समुत्थाय खरस्वनाम् ॥१९७॥ तया हतस्ततो दैत्यश्चकम्पेऽचलराडिव । मेने च दुर्जयं दैत्यस्तदा बालं सुदुःसहम् ॥९९८॥ चितयामास बुदा वै प्राप्तः कालो न संशयः । कंपितं च समालोक्य कालनेमिपुरोगमाः ॥१९९॥ सर्वे दैत्यैश्वरा जघ्नुः कुमारं रणदारुणम् । स तैः प्रहारैरस्पृष्टस्तथा क्लेशैर्महाद्युतिः ॥२००॥ स बालो बलिभिवेंगैरयुध्यद्दानवै रणे । रणशोण्डाश्च दैत्येंद्राः पुनर्जघ्नुः शिलीमुखैः ॥२०१॥ कुमारं समरे दैत्या बलिनो देवकंटकाः। कुमारस्य व्यथा नाभूददैत्यास्त्रनिहतस्य तु ॥२०२॥ प्राणांतकरणं जातं देवानां दानवाहवम् । देवान्निपीडितान् दृष्ट्वा कुमारः कोपमाविशत् ॥२०३॥ ततोख्बैर्दारयामास दानावानामनीकिनीम् । तैरस््रैर्निष्प्रतीकारैस्ताडिताः सुरकंटकाः ॥२०४॥ कालनेमिमुखाः सर्वे रणेह्यासन्पराङ्मुखाः । विद्रुतेषु च दैत्येषु प्रहतेषु समंततः॥२०५॥ किन्नरोद्वारगीतैश्च हास्यसन्यस्तचेतनः । जघ्ने क्कुमारं गदया निष्टप्तकनकत्विषा ॥२०६॥ शरै र्मयूरं चित्रैश्च चकार विमुखं रणे। दृष्ट्वा पराङ्मुखो देवो मुक्तरक्तं स्ववाहनम् ॥२०७॥ जग्राह शक्ति विमलां रणे कनकभूषणाम्। बाहुनाहेमकेयूररुचिरेण षडाननः ॥२०८॥ ततोब्रवीन्महासेनस्तारकं दानवाधिपम् । तिष्ठ तिष्ठ सुदुर्बुद्धे यमलोकं विलोकय ॥२०९॥ हतोह्यसि मया शक्ततद्या स्मर स्वं दैत्यचेष्टितम्। इत्युक्त्वा तु ततः शक्ति मुमोच दितिजं प्रति ॥२९०॥ सा कुमारभुजोत्सृष्टा तत्केयूररवानुगा । विभेद दैतयहृदयं वञ्रशैलेद्रकर्कशम् ॥२९९॥ से कहने पर तारकासुर ने अपनी गदा का प्रहार किया ॥१९५॥ कुमार ने उसको अमोघ वर्चस्वी चक्र के द्वार खण्डित कर दिया । उसके बाद दैत्येन्द्र ने उनके ऊपर लौह निर्मित परिघ का प्रहार किया ॥१९६॥ देवशत्रुओं को मारने वाले कुमार ने उसको हाथ से पकड़ लिया । उन्होंने भयङ्कर ध्वनि करने वाली गदा को उठाकर फेंका।१९७॥ उस गदा के प्रहार से तरकासुर पर्वतराज के समान काँप उठा और उसने समझ लिया कि यह बालक दुर्जय है, ॥१९८॥ उसने समझ लिया कि यह मेरी मृत्यु की बेला आ गयी है । कम्पित हुए दैत्येन्द्र को देखकर कालनेमि इत्यादि॥ १९९॥ सभी बड़े-बड़े दैत्ययों ने भयङ्कर युद्ध करने वाले कुमार पर प्रहार किया, किन्तु उन प्रहारों तथा तज्जनय क्लेशों से कुमार का स्पर्श भी नहीं हुआ ॥२००॥ वह बालक उन बलवान् दानवों के साथ वेगपूर्वक युद्ध करने लगा । युद्ध करने में निपुण बड़े-बड़े दैत्यों ने उन पर बाणों से प्रहार किया ॥२०१॥ देवताओं के शत्रु दैत्यो ने कुमार पर प्रहार किया किन्तु दैत्यों के अख्रों के प्रहार से कुमार को कोई कष्ट नहीं हुआ ॥२०२॥ दैत्यों के द्वारा किया गया वह युद्ध देवताओं के लिए प्राणान्त करने वाला बन गया । देवताओं को पीड़ित देखकर कुमार कुपित हो गये ॥२०३॥ उसके बाद उन्होंने अखों के द्वारा दानवों की सेना को विदीर्ण कर दिया । जिनका कोई प्रतिकार नहीं था उन अखों के प्रहार से देवताओं के शत्रु कालनेमि इत्यादि युद्ध से भाग गये । दैत्यों के चारो ओर से मार दिए जाने पर तथा भाग जाने पर ॥२०४-२०५॥ किन्नरों के गीत को सुनकर तारकासुर होश में आ गया और उसने सन्तप्त सुवर्ण के समान कान्ति वाली गदा से कुमार पर प्रहार किया ॥२०६॥ उसने विचित्र बाणों के प्रहार से मयूर को युद्ध पराइमुख बना दिया । अपने वाहन को रक्त से सने हुए तथा युद्ध पराइमुख देखकर कुमार ॥२०७॥ ने सुवर्ण के भूषणों से भूषित निर्मल शक्ति को अपने केयूर भूषित हाथ में उठा लिया ॥२०८॥ उन्होंने दैत्यराज को तिष्ठ-तिष्ठ कहते हुए कहा मूर्ख ठहरो अब तुम यमलोक में जाओ ॥२०९॥ अब तुम मेरे द्वारा शक्ति से मारे जा रहे हो, अपने कर्मों को याद करो, यह कहकर उन्होंने तारक के ऊपर शक्ति का प्रहार किया ॥२१०॥ कुमार के हाथ से प्रहृत तथा केयूर के

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