Srishti Khanda Extracted Page 632

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-632

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Sanskrit Original

`" सृष्टिखण्ड ६०७ जयदितिजकुलमहोदधिबडवानलमधुरमयूरर थसुरमकुटकोटिकुंचितचरणनखांकुरमहासेन ॥ १८ २॥ जयचलितललितचूडाक लापनवविमलकमलदंडकांतदै त्येशबं शदु: सहदावानल ॥१८३॥ जयविशाखविभो जयबालसप्तवासर भुवनालिशोकशमन जयसकललोकदितिसुतधुरंधरनाशकस्कंद ॥१८४॥ रुत्वैतत्ताकः सर्वमुदघुष्टं देववंदिभिः । सस्मार ब्रह्मणो वाक्यं वधं बालादुपस्थितम् ॥१८५॥ स्मृत्वा घर्मौधविध्वंसी सदावीरपदानुगः। मंदिरान्निर्जगामाशु शोकग्रस्तेन चेतसा ॥१८६॥ कालनेमिमुखा दैत्याः संत्रस्ता भ्रांतचेतसः । स्वेष्वनीकेषु च तदात्वराविस्मितचेतसः ॥१८७॥ हिरण्यकशिपुः प्राह दानवानां धुरंधरः । त्रपाकरं भवेन्मह्यं बालस्यास्य पलायनम् ॥१८८॥ यद्यहं हतवे यामि सोपि वैकमलाश्रितः। हत्वाहं बालकं चैनं दुःस्पर्शः स्यामकारणम् ॥१८९॥ यात धावत गृह्णीत योजयध्वं वरूथिनीम् । कुमारं तारको दृष्ट्वा बभाषे भीषणाकृतिः ॥१९०॥ कि बाल योद्धकामोऽसि क्रीड कंदुकलीलया। येनातपो निसृष्टस्ते सत्संगरविभाषक ॥१९१॥ बालत्वादथ ते बुद्धिरेवंस्वल्पार्थद्शिनी । कुमारोपि तमग्रस्थं बभाषे हर्षवत्तमम्॥१९२॥ शृणु तारकणशास्त्रार्थं इह नैव निरूप्यते । शस्रैरर्था न दृश्यंते समरे निर्भरं भये॥१९३॥ शिशुत्वं मावमंस्थामे शिशुः कष्टो भुजंगमः। दुष्प्रेक्षो भास्करो बालस्तथाहं दुर्जयः शिशुः ॥१९४॥ अल्पाक्षरो न मंत्र: कि सस्फुरो दैत्यदृश्यते । कुमारे प्रोक्तवत्येवं दैत्यश्चिक्षेपमुद्नरम्॥९९५॥ कुमारस्तनिरासोग्र चक्रेणामोघवर्चसा । ततश्चिक्षेपदैत्येंद्रो भिदिपालमयोमयम् ॥ ९ ९६॥ हो ॥१८१॥ दैत्य वंशरूपी महासागर के लिए बडवानल, मनोहर मयूर नामक रथ वाले, देवताओं के करोड़ों मुकुटो की कान्ति से प्रकाशित नख वाले, महासेन की जय हो ॥१८२॥ चंचल एवं मनोहर चूडा कलाप वाले, नवीन स्वच्छ कमल के समान कान्ति वाले, दैत्य वंश के लिए दुःसह दावाग्नि के समान आपकी जय हो ॥१८३॥ हे विशाख प्रभो ! हे सात दिन के बालक लोक समूह के शोक सन्ताप का शमन करने वाले आपकी जय हो । सम्पूर्ण लोकों में विद्यमान दैत्याग्रगण्य का नाश करने वाले आपकी जय हो ॥१८४॥ देवताओं के इन सम्पूर्ण उदघोषों को सुनकर तारकासुर ब्रह्माजी के द्वारा कहे गये बालक के द्वारा अपने वध को उपस्थित हुआ जान लिया ॥१८५॥ उस बात का स्मरण करके महावीरों के मार्ग का अनुसरण करने वाला वह पापी शोक संतप्त मन से शीघ्र ही अपने गृह से निकल पड़ा ॥१८६॥ कालनेमि आदि दैत्य शीघ्रता करते हुए तथा भयभीत होकर शीघ्रता से आश्चर्यित मन से अपनी सेनाओं में प्रवेश कर गये ॥१८७॥ दानवों में धुरन्धर तारक ने हिरण्यकशिपु से कहा इस बालक से पलायन करना मेरे लिए लज्जा की बात है ॥१८८॥ तारकासुर ने कहा-- यदि मैं इस बालक को मारने जाता हूँ तो वह भी मेरे लिए लज्जा की बात है । इस बालक को मारकर मैं आकरण ही दुःस्पर्श हो जाऊँगा ॥१८९॥ तुमलोग अपनी सेना तैयार करो जाओ, दौड़ो और कुमार को बन्दी बना लो । इसतरह से कुमार को देखकर तारकासुर ने कहा।।१९०॥ बालक क्या युद्ध करना चाहते हो कन्दुक क्रीडा करो । जिससे धूप से निसृष्ट पसीना तुम्हारे युद्ध का प्रकाशक होगा ।।१९१।। बालक होने के कारण तुम्हारी बुद्धि वस्तुत ठीक निश्चय नहीं करने वाली है । सामने विद्यमान उसको हँसते हुए कुमार ने भी कहा ॥१९२॥ कुमार ने कहा-- हे तारक ! सुनो, यहाँ शास्त्रार्थ का निरूपण नहीं किया जाता है । भययुक्त युद्ध में शास्रं के द्वारा अर्थ नहीं दिखता है ।।१९३॥। मेरे शिशुत्व का अपमान न करो, छोटा भी सर्प भयङ्कर होता है । बाल सूर्य भी दुष्मेक्ष्य होता है, उसीतरह मैं दुर्जय शिशु हूँ।१९४॥ दैत्य ! स्फुरण युक्त कम अक्षरों वाला भी मंत्र नहीं होता है क्या ? महर्षि पुलस्त्य ने कहा-- कुमार के इसतरह

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