Srishti Khanda Extracted Page 631
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-631
Sanskrit Original
उवाच दूतं दुष्टात्मा नष्टप्रायविभूतिक: । तारक उवाच दृष्टं ते पौरुषं शक्र शतशोऽथ महारणे ॥१६९॥ नि्नपत्वान्न ते शांतिर्विद्यते शक्र दुर्मते । एवमुक्ते गते दूते चिंतयामास दानवः ॥१७०॥ नालब्धसंश्रयः शक्रो वक्तुमेवमिहार्हति । जातः स्कंदोऽधुना शक्राज्ज्ञायते समुपाश्रयात् ॥१७९॥ निमित्तौघांस्तदा दुष्टान् सोपश्यन्नाशवेदिनः । पांसुवर्षमसृक्यातं गगनादवनीतले ॥१७२॥ वामनेत्रप्रकंपं च वक्त्रशोषं मनोमयम् । स्वकानां वत्रपद्ानां म्लानतां च व्यलोकयत् ॥१७३॥ दुष्टांश्च प्राणिनो रौद्रान् सोऽपश्यद्दष्टवादिनः । तदचिंत्यैव दितिजो न्यस्तचित्तो भवत्क्षणात् ॥१७४॥ यावद््जघटाघंटाघनत्काररवोत्कटाम् । तद्दत्तरंगसंघातद्नेषोत्साहविभूषिताम् ॥१७५॥ सैन्यैस्सेनान्तरोदग्रध्वजराजैर्विराजिताम् । विमानैश्चाद्धुताकारैश्चलितामलचामरैः ॥१७६॥ विभूषणपिनद्वां च किन्नरोद्रीतनादिताम्। नानानाकतरूत्फुल्लकुसुमापीडधारिणीम् ॥१७७॥ विशोकाख्रपरिस्फारचर्मनीर्मलदर्शिनीम् । विघ्युत्पुष्टद्युतिधरां. नानावाद्य विनादिताम् ॥१७८॥ सेनां नाकसदां दैत्यः प्रासादस्थोव्यलोकयत् । सचिंतयामास तदा किंचिद्विभ्रांतमानसः ॥९७९॥ अपूर्वः को भवेद्योद्धा यो मयानविनिर्जितः । ततश्चिताकुलो दैत्यः शुश्रावकटुकाक्षरम् ॥ सिद्धवंदिभिरुदघुष्टमिदं हृदयदारुणम् ॥१८०॥ जयातुलशक्तिदीधितिपंजर भुजदंडप्रचंडतरर भससुरवदनकुमुदविकासनविलासनेत्रकुमारवर ॥१८९॥ जिसकी विभूति प्रायः नष्ट हो चुकी थी वह तारकासुर दूत से कहा तारकासुर ने कहा-- इन्द्र बड़े-बड़े युद्धं में मैने सैकड़ों बार तुम्हारा पराक्रम देखा है ॥१६८-१६९॥ मूर्ख इन्द्र ! निर्लज्ज होने के कारण तुम को शान्ति नहीं है पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- इस तरह से कहने पर जब दूत चला गया तो दानव तारक ने विचार किया ॥१७०॥ किसी की सहारा पाये बिना इन्द्र इस तरह से नहीं बोल सकता है । इन्द्र का रक्षक स्कन्द उत्पन्न हो गया ऐसा लगता है ॥१७१॥ उसके बाद उसने विनाश को सूचित करने वाले शकुनों को देखा । उस समय आकाश से पृथिवी पर खून और धूलि की वर्षा हुयी । उसकी वायीं आँख फड़कने लगी मुख और मन सुख गये । उसके अपने लोगों के मुखकमल सुखे हुए दिखने लगे ॥१७३॥ अशुभभाषी दुष्ट और भयङ्कर जीवों को उसने देखा । उन सारी बातों की चिन्ता किए बिना ही वह दैत्य क्षणभर में स्थिर चित्त वाला हो गया ॥१७४।॥ उसी समय अपने महल के ऊपर विद्यमान तारकासुर ने गज समूह के घंटा ध्वनि से उत्कटध्वनि वाली, उसी तरह घोड़ों के समूह की हिनहिनाहट से विभूषित ॥१७५॥ सेना के सैनिकों की ऊंची ध्वजा से सुशोभित, जिस पर चामर झले जा रहे थे ऐसे अद्भुत आकार वाले विमानों से विभूषित, जिसमें किन्नरों के गीत सुनाई पड़ रहे थे ऐसी अनेक स्वर्गीय वृक्षों के विकसित पुष्ममालाओं वाली, बिना किसी भय के चमकते हुए अख-शस्तर को धारण की हुयी, तेज से चमकने वाली विद्युत की कान्ति वाली अनेक प्रकार के वाद्यों से निनादित, देवताओं की सेना को अपने छत पर से देखा । कुछ विभ्रान्तमना होकर उसने सोचा ॥१७६-१७९॥ यह कौन सा अपूर्व योद्धा हो गया जिसको मैंने पराजित नहीं किया हो । उसके बाद चिन्ता सेव्याकुल होकर तारकासुर ने इस कठोर वाणी को सुना जो तारकासुर को दु:ख देने वाली थी और जिसका उदघोष वन्दीगण कर रहे थे ॥१८०॥ वन्दिगणों ने कहा-- अतुलनीय शक्ति, कान्ति तथा पंजररूपी भुजदण्ड सेप्रचण्ड, शीघ्र ही देवताओं के मुख कमल को विकसित करना रूपी विलास मय नेत्र वाले, कुमार की जय
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