Srishti Khanda Extracted Page 630

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-630

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Sanskrit Original

नमोस्तु केयूरधराय तुभ्यं नमो धृतोदग्रपताकिने ते । नमः प्रभावप्रणताय तेस्तु नमोऽस्तु घंटाधरधैर्यशालिने ॥१५७॥ कुमार उवाच कं वः कामं प्रयच्छामि भवंतो ब्रूत निर्वृताः । यद्यप्यसाध्यं कृत्यं नो हृदये चिंतितं चिरम्॥१५८॥ इत्युक्तास्तु सुरास्तेन प्रोचुः प्रणतमौलयः। सर्व एव महात्मानं गुहं मुदितमानसाः ॥१५९॥ दैत्येंद्रस्तारको नाम सर्वामरकुलांतकृत् । बलवान् दुर्जयस्तीक्ष्णो दुराचारोतिकोपनः ॥१६०॥ तमेव जहि दुर्धर्ष दैत्यं सर्वविनाशनम् । उपस्थितः कृत्यशेषो ह्यस्माकं च भयावहः ॥१६१॥ हिरण्यकशिपुश्चोग्रो ह्ावध्यो देवतागणैः । यज्ञघ्नः पापकर्मा वै येन ब्रह्मापि तापितः ॥१६२॥ एतौ हरस्वभद्रं ते तावकं च महाबलम् । एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा सर्वामरपदानुगः ॥९६ ३॥ जगाम जगतां नाथस्तूयमानोऽमरेश्वरैः । तारकस्य वधार्थाय जगतां कंटकस्य च ॥१६४॥ ततश्च॒ प्रेषयामास शक्रोगूढसमाश्रयः । दूतं दानवसिंहस्य परुषाक्षरवादिनम् ॥१६५॥ स तु गत्वा ब्रवीदैत्यमभयो भीमदर्शनम् । दूत उवाच शक्रस्त्वामाह देवेशो दैत्यकेतुं दिवस्पतिः ॥१६६॥ तारकासुर तच्छक्त्या घटयस्व यथेच्छया। यज्जगज्ज्वलनो दीप्तं किल्बिषं च त्वया कृतम्॥१६७॥ तस्याहं सादकस्तेऽद्य राजास्मि भुवनत्रये । श्रुत्वैतदद्धुतं वाक्यं कोपसंरक्तलोचनः ॥१६८॥ है । महात्रत करने वाले स्कन्द को नमस्कार है । युद्ध में अत्यन्त उत्कट आपको नमस्कार है तथा देदीप्यमान मयूर को वाहन बनाने वाले आपको नमस्कार है ।।१५६॥ केयूर धारण करने वाले तथा उन्नत पताका धारण करने वाले आपको नमस्कार है । प्रभाव प्रणत रहने वाले आपको नमस्कार है तथा घण्टाधारी, धैर्यशाली आपको नमस्कार है॥१५७॥ कुमार ने कहा-- आपलोग बतलायें कि में आपलोगों की किस इच्छा को पूरा करूँ । आपलोग अपने हदय में किसी असाध्य कार्य को लेकर चिन्ता न करें ॥१५८॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- कुमार के द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर सभी देवताओं ने अपना शिर झुकाकर सारी बातों को गुह को बतलाया ॥१५९॥ तारक नामक दैत्यों का राजा सम्पूर्ण देवताओं को मारने वाला है । वह बलवान, दुर्जय, तीक्ष्ण दुराचारी तथा अन्यन्त क्रोधी है॥ १६०॥ उस दुर्धर्ष दैत्य का आप वध कर दें, वह दैत्य सबों का विनाश करने वाला है । यह कार्य शेष उपस्थित है जिसके कारण हम सभी भयभीत हैं ॥१६१॥ हिरण्कशिपु भी अत्यन्त उग्र हैं, सभी देवताओं के लिए वह अवध्य है । वह यज्ञों को विनष्ट करने वाला तथा पापी है, उसके कारण ब्रह्माजी भी सन्तप्त हें ॥१६२॥ आप इन दोनों को मार दें आपके महान् बल का कल्याण हो । पुलस्त्य महर्षि ने कहा--- इस तरह से कहने पर कुमार ने कहा ठीक है । कुमार के पीछे सभी देवता चले ॥१६३॥ जगत् के स्वामी कुमार देवताओं से स्तुति किए जाते हुए जगत् के कण्टक तारकासुर का वध करने के लिए गये ॥१६४॥ उसके बाद गूढ बातों को जानने वाले इन्द्र ने परुषवाणी बोलने वाले दूत को तारकासुर के पास भेजा ॥१६५॥ वह जाकर निर्भयता पूर्वक उस भयङ्कर दैत्य से कहा दूत ने कहा-- दैत्यों का विनाश करने वाले, स्वर्ग के स्वामी इन्द्र ने आप से कहा है ॥१६६॥ तारकासुर तुम अपनी शक्ति का प्रदर्शन करो । तुमने संसार को दुःख देने वाला पाप किया है ॥१६७॥ अब त्रिभुवन का स्वामी मैं तुम्हारा विनाश करने वाला हूँ । पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- इस अद्भुत वाक्य को सुनकर क्रोध से आँखें लाल करके

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