Srishti Khanda Extracted Page 629
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-629
Sanskrit Original
स्कंदो विशाखः षड्वक्त्रः कार्तिकेयश्च विश्रुतः । पक्षे चैत्रस्य बहुले पंचदश्यां महाबलौ ॥९४५॥ संभूतावर्कसदूृशौ विशाले शरकानने। सिते पक्षे तु पंचम्यां तथैतौ पावकानलौ ॥१४६॥ बालकाभ्यां चकारैकं संध्यायामेव भूतये । तस्यामेव ततः षष्ठ्यामभिषिक्तो गुहः प्रभुः ॥१४७॥ सर्वैरमरसंघातै ब्रह्मोपेंद्रभास्करै: । गंधमाल्यैः शुभैः धूपैस्तथाक्रीडनकैरपि ॥१४८॥ छत्रैश्चामरजालैश्च भूषणैश्च विलेपनैः। अभिषिक्तो विधानेन यथावत् षण्मुखः प्रभुः ॥१४९॥ सुतामस्मै ददौ शक्रो देवसेनेति विश्रुताम् । पन्त्यर्थ देवदेवेशो ददौ विष्णुरथायुधम् ॥१५०॥ यक्षाणां दशलक्षाणि ददावस्य धनाधिपः । ददौ हुताशनस्तेजो ददौ वायुश्च वाहनम् ॥१५९॥ ददौ क्रीडनकं त्वष्टा कुक्कुटं कामरूपिणम्। एवं सुरास्तु ते सर्वे परिवारमनन्तकम् ॥१५२॥ ददुर्मुदितचेतस्काः स्कंदायादित्यवर्चसे । जानुभ्यामवनौ स्थित्वा सुरसंघास्तमस्तुवन् ॥१५३॥ स्तोत्रेणानेन वरदं षण्मुखं मुख्यशः सुराः। देवा ऊचुः नमः कुमाराय महाप्रभाय स्कंदाय चास्कंदिति दानवाय ॥१५४॥ ` नवार्क बिम्बप्रतिमप्रभाव नमोस्तु गुह्याय गुहाय तुभ्यम् । नमोस्तुतेलोक भयापहाय नमोस्तुतेलोककृपापराय ॥९५५॥ नमो विशालामललोचनाय नमोविशाखय महाब्रताय । नमो नमस्तेस्तुरणोत्कटायनमो मयूरोज्ज्वलवाहनाय॥१५६॥ ७ 6 oP PON cs So SANE न न न N के कारण वह षण्मुख हुआ । विशेष रूप से शाखा से युक्त होने के कारण उसका नाम विशाख हुआ । शिवाओं को शाखा कहते हैं, वे सव छह मुखों में विस्तृत हैं । इसलिए ही वह लोक में विशाख के नाम से विख्यात बालक हुआ॥१४४॥ लोक में वह षण्मुख, स्कन्द, षडवक्त, कार्तिकेय तथा विशाख के नाम से विख्यात हुआ । चैत्रमास के बहुल (शुक्ल) पक्ष की पूर्णिमा तिथि को वे दोनों महाबलवान बालक शरपत के वन में उत्पन्न हुए । शुक्लपक्ष की पञ्चमी तिथि को सायंकाल दोनों अग्नि (पावक तथा अग्नि) दोनों बालकों को मिलाकर लोक कल्याण के लिए एक बालक बना दिए । उसके पश्चात् उस पक्ष की षष्ठी तिथि को गुह (कार्तिकेय) को ॥१४५-१४७॥ ब्रह्मा, उपेन्द्र, इन्द्र, सूर्य आदि सभी देवताओं के समूह ने सिंहासनासीन किया । चन्दन, माला, धूप, खिलौना, छत्र, चामर, भूषण और अङ्गराग आदि के द्वारा षण्मुख विधिवत् अभिषिक्त हुए ॥१४८-१४९॥ उनको इन्द्र ने अपनी प्रख्यात पुत्री देवसेना को पत्नी के रूप में प्रदान किया और भगवान् विष्णु ने उनको आयुध प्रदान किया ॥१५०॥ कुबेर ने इनको दश लाख यक्षों को प्रदान किया; अग्नि ने उनको तेज प्रदान किया और वायु ने वाहन प्रदान किया ॥१५१॥ त्वष्टा ने उन्हें अपने मन से रूप बना लेने वाले मूर्गे को खिलौने के रूप में प्रदान किया । इसतरह उन सभी देवताओं ने उन्हें अनन्त नामक परिवार स्कन्द को प्रसन्नता पूर्वक प्रदान किया । इसके बाद देवताओं ने दोनों घुटने पृथिवी पर टेककर स्कन्द की स्तुति की ॥१५१-१५३॥। मुख्य-मुख्य देवताओं ने इस स्तोत्र से षण्मुख की स्तुति की देवताओं ने कहा-- महती कान्ति सम्पन्न कुमार को नमस्कार है । दैत्यों को मारने वाले स्कन्द को नमस्कार है॥१५४॥ नवीन सूर्य के समान अप्रतिम कान्ति सम्पन्न रहस्यमय गुह को नमस्कार है । संसार के भय को दूर करने वाले तथा संसार पर कृपा करने वाले आपको नमस्कार है ॥१५५॥ विशाल तथा निर्मल नेत्रों वाले आपको नमस्कार
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