Srishti Khanda Extracted Page 628

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-628

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

जगामकौतुकाविष्टा तत्सरः कनकांबुजम् । तत्र कृत्वा जलक्रीडां तदब्जकृतशेखरा ॥१३०॥ उपविष्टा ततस्तस्य तीरे देवी सखीवृता | पातुकामा च तत्तोयं स्वादुनिर्मलपङ्कजम् ॥१३१॥ अपश्यत्कृत्तिका स्तास्सषडर्कद्युतिसन्निभाः । पद्मपत्रे तु तद्वारि गृहीत्वा प्रस्थिता गृहम् ॥१३२॥ हर्षात्सोवाच पास्यामि पद्मपत्रे स्थितं पय: । ततःस्ता ऊचुरखिलाः कृत्तिका हिमशैलजाम् ॥१३३॥ कृत्तिका ऊचुः दास्यामो दयिते गर्भे संभूतो यो भविष्यति । सोस्माकमपि पुत्रः स्यादस्मत्त्राता च वृत्तिमान्॥१३४॥ त्रिषु लोकेषु विख्यातः सर्वेष्वपि शुभानने। इत्युक्तोवाच गिरिजा कथंमद्रात्रसंभवैः ॥१३५॥ सर्वैरवयवैर्युक्तो भवतीभ्यः सुतो भवेत् । ततस्तां कृत्तिका ऊचुर्विधास्यमोस्य वै वयम् ॥१३६॥ उत्तमान्युत्तमांगानि यद्येवं तु भविष्यति। उक्ता वै शैलजा प्राह भवत्वेवमनिंदिताः ॥१३७॥ ततस्तु हर्षसंपूर्णाः पद्मपत्रस्थितं पयः । तस्यै ददुस्तया चापि तत्पीतं क्रमशो जलम् ॥१३८॥ पीते तु सलिले चैव तस्मिन्नेव क्षणे वरः । विपाट्यदेव्याश्च ततो दक्षिणं कुक्षिमुद्रतः ॥१३९॥ निश्चक्रामाद्धतो बालो रोगशोकविनाशनः। प्रभाक रकरव्रातप्रकारप्रकरप्रभुः ॥१४०॥ गृहीतनिर्मलोदग्रशक्तिशूलांकुशोऽ नलः । दीप्तोमारयितुं दैत्यानुत्थितः कनकच्छविः ॥१४९॥ एतस्मात्कारणादेव कुमारश्चापि सोऽ भवत् । वामं विदार्य निष्क्रांतस्ततो देव्याः पुनः शिशुः॥ १४ २॥ स्कंदोऽथ वदनाद्वह्लेः शुभ्रात्षड्वदनोरिहा। कृत्तिकासलिलादेव शाखाभिः सविशेषतः ॥१४३॥ शाखाः शिवाः समाख्याताः षट्सु बक्त्रेषु विस्तृताः । यतस्ततो विशाखोऽसौ ख्यातो लोकेषु षण्मुखः ॥९४४॥ स्वणिम कमलवाले सरोवर के पास कोतुकाविष्ट होकर गयीं । उस सरोवर में जलक्रीडा करके तथा उसके कमल को अपने शिर में लगाकर ॥१२९-१३०॥ वे अपनी सखियों के साथ उस सरोवर के तट पर बैठ गयीं वे उस सरोवर के स्वादिष्ट जल को पीना चाहती थी ॥१३१॥ वहाँ उन्होंने छह सूर्यो के समान कान्ति वाली छह कृत्तिकाओं को देखा । उस जल को कमल के प्ते में लेकर वे अपने घर गयीं ॥१३२॥ प्रसन्नता पूर्वक उन्होंने कहा कि इस पद्म पत्र के जल को मैं पीऊंगी । उसके बाद उन सभी कृत्तिकाओं ने पार्वतीजी से कहा ॥१३३॥ कृत्तिकाओं ने कहा-- आपके गर्भ से जो बच्चा उत्पन्न होगा वह यदि हमलोगों का भी पुत्र हो तथा हमलोगों की रक्षा करे तब हमलोग इस जल को देंगी ॥१३४॥ हे शुभानने ! वह बालक सभी लोकों में विख्यात होगा मेरे शरीर से उत्पन्न सभी अङ्गो वाला वह पुत्र आपलोगों का पुत्र कैसे हो सकता है ? यदि ऐसी बात है, तो हमलोग भी उसे प्रदान करेंगी ॥१३५-१३६॥ यदि वह हमलोगों का भी पुत्र होगा तो हमलोग उसे उत्तम शिरों को प्रदान करेंगी । इस पर पार्वतीजी ने कहा-- यदि ऐसी बात है तो वह तुम लोगों का भी पुत्र होगा ॥१३७॥ इसके बाद उन कृत्तिकाओं ने भी पद्मपत्र पर स्थित जल को पार्वतीजी को दिया और पार्वतीजी ने भी उन जलों को क्रमशः पिया ॥१३८॥ जल के पी लेने पर उसी क्षण देवी पार्वती की दाहिनी कुक्षि को फाड़कर श्रेष्ठ गुण युक्त अद्भुत तथा शोक को विनष्ट करने वाला बालक बाहर निकला। सूर्य की किरणों के समान उसकी कान्ति थी ॥१४०॥ वह दैत्यों को मारने के लिए देदीप्यमान सुवर्ण के समान कान्ति वाले अपने हाथ में निर्मल तथा श्रेष्ठ शक्ति, त्रिशूल, अङ्कुश तथा अग्नि को धारण किए हुए था॥१४१॥ इसी कारण वह कुमार हुआ । उसके बाद देवी पार्वतीजी की वामकुक्षि को विदीर्ण करके शिशु फिरा पैदा हुआ ॥१४२॥ अग्नि के समान शुभ वदन वाला होने के कारण उसका नाम स्कन्द हुआ । छह कृतिकाओं के जल

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know