Srishti Khanda Extracted Page 627

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-627

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Sanskrit Original

जलधयो ललितोद्धतवीचयो हुतवहो द्युतिदग्धचराचरः । फणसहस्त्रभृतश्च भुजंगमास्त्वमभिधास्यसि मामभयङ्करा ॥११७॥ भगवति स्थिरभक्तजनाश्रये प्रतिगतो भवती चरणाश्रयम् । करणजातिमहास्तुममाद्यवैतवविलासमुखानुभवास्पदम् ॥ ९ १८॥ सुप्रसन्ना ततो देवी वीरकस्येति संस्तुता। प्रविवेश शुभं भर्तुर्भवन॑ भूधरात्मजा ॥११९॥ द्वास्थोपि वीरको देवान् हरदर्शनकांक्षिणः । व्यसर्जयत्स्वकानेव गृहानादरपूर्वकम् ॥१२०॥ नास्त्यत्रावसरो देवा देव्याः सह वृषाकपिः । निभृतः क्रीडतीत्युक्ता ययुस्ते च यथागतम् ॥९२९॥ गते वर्षसहस्रे तु देवास्त्वरितमानसाः । ज्वलनं चोदयामासु ज्ञातुं शङ्करचेष्टितम् ॥१२२॥ प्रविश्य पक्षिरं्रेण शुकरूपी हुताशनः। ददर्श शयने सर्व रतौ गिरिजया सह॥१२३॥ ददर्श तं च देवेशो हुताशं शुकरूपिणम्। तमुवाच महादेवः किंचित्कोपसमन्वितः ॥९२४॥ शर्व उवाच निषिक्तमर्धं देव्यां मे बीर्य न शुकविग्रह । लज्जया विरतिश्चास्य त्वमर्ध पिब पावक ॥१२५॥ यस्मात्तु त्वत्कृते विध्नं तस्मात्त्वय्युपपद्यते। इत्युक्तः प्राञ्जलिर्वह्विरपिबद्दीर्यमाहितम् ॥१ २६॥ तेनाप्लुतास्ततो देवास्तन्मुखा ऋभवो यतः । विपाट्य जठरं तेषां वीर्यमाहेश्वरं तत: ॥१२७॥ निष्क्रांते तप्तहेमाभं वितते शङ्कराश्रमे । तस्मिन्सरो महज्जातं विमलं बहुयोजनम् ॥१२८॥ प्रोत्फुल्लहेमकमलं नानाविहगनादितम्। तच्छुत्वा तु सरो देवी जातं हेममहांबुजम् ॥१२९॥ है ॥११६।। ललित तथा उद्धत तरङ्गों वाले समुद्र, तथा अपनी कान्ति से चराचर को जला डालने वाला अग्नि, हजारों फणाओं वाले सर्प ये सब के सब तुम्हारा ही वर्णन करते हें । आपने मुझे अभय बना दिया है ॥११७॥ हे स्थिर भक्त जनों के आश्रय स्वरूपे भगवति ! माँ ! मेरी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ आपके चरणाश्रित हो जायँ और तुम्हारे विलासों का अनुभव करने में प्रवृत्त रहें ॥११८॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- वीरक के द्वारा स्तुति की गयी देवी पार्वती ने प्रसन्नता पूर्वक अपने पति के आश्रम में प्रवेश किया ॥११९॥ वीरक ने कहा-- भगवान् शिव का दर्शन करना चाहने वाले देवताओं को आदर पूर्वक उनके घर लौटा दिया ॥१२०॥ उसने कहा--- देवों इस समय अवसर नहीं है । इस समय भगवान् शिव देवी के साथ एकान्त में क्रीडा कर रहे हैं । इसतरह से कहने पर वे देवता भी चले गये ।।१२१॥ एक हजार वर्ष बीत जाने पर देवताओं ने शीघ्रता करने की इच्छा से अग्नि को भगवान् शिव की चेष्टाओं को जानने के लिए प्रेरित किया ॥१२२॥ शुक पक्षी का रूप बनाकर पक्षी के मार्ग से अग्नि ने गिरजा के साथ रति करते हुए भगवान् शिव को देखा ॥१२३॥ भगवान् शिव ने शुक पक्षी का रूप बनाये हुए अग्नि को देखा। कुछ क्रोध करके महादेव ने अग्नि से कहा ॥१२४। शङ्करजी ने कहा-- हे अग्नि ! मैंने अपना आधा वीर्य देवी में आहित कर दिया है । लज्जा के कारण वह तो विरत हो गयीं; अब आधे वीर्य को तुम पीओ ॥१२५॥ चूकि तुमने ही विघ्न किया है अतएव तुमको यह करना उचित ही है । पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- इसतरह से कहने पर अग्नि ने उस वीर्य को पी लिया ॥१२६॥ उससे ऋभु नामक देवता उत्पन्न हो गये । उसके बाद शिवजी का वह वीर्य उन सबों का पेट फाड़कर ॥१२७॥ सुवर्ण की कान्ति के समान कान्ति वाला बाहर निकल पड़ा और विस्तृत शङ्करजी के आश्रम में अनेक योजन विस्तृत एक स्वच्छ सरोवर उत्पन्न हो गया ॥१५२८॥ उसमें स्वर्णिम कमल विकसित थे, अनेक प्रकार के पक्षी कलरव कर रहे थे । उस सरोवर के विषय में सुनकर देवी पार्वती उस

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