Srishti Khanda Extracted Page 626

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-626

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Sanskrit Original

ननिवर्तयितं शक्यः शापः किंतु ब्रवीमि ते। शीघ्रमेष्यसि मानुष्यात्सर्वकामसमन्वितः ॥ १ ० ८॥ शिरसा तु ततो वंद्य मातरं पूर्णमानसः । उवाच साध्वीं पूर्णोन्दुद्युतिं तुहिनशैलजाम् ॥९०९॥ नत सुरासुर मौलिलसन्मणि प्रवरकान्तिकरालिनखाडिघ्रिके । नगसुते शरणागतवत्सले तवनमोवनतार्ति विनाशिनि ॥९९०॥ तपनमंडलमंडितकंधरे पृथुसुवर्णनगद्युतिहारिके । विषमभंगविषंगमभीषितो गिरिसुते भवतीमहाश्रये॥१९९॥ जगतिका प्रणताभिमता ददौ झटितिसिद्धिमृतेभवतीं यथा । जगतिकांप्रणमेच्छशिशेखरो भुवनभुन्मुनयो भवतीं यथा ॥११२॥ विमलयोगविनिर्मितदुर्जये सुतनुलुल्यमहेश्वरमंडली । विदलितांधकबांधवसंहतिः सुरवरैः प्रथमं त्वमभिष्टुता ॥१९३॥ सितसटापटलोद्धतकंधरा भवमहामृगराजरयस्थिता । विमलशक्तिमुखानलपिंगला यतभुजौघनिपिष्टमहासुरा ॥१ १४॥ निगदिता भुवने रतिचंडिका जननि शुंभनिशुंभनिषूदिनी । प्रणतचिंतितदा भवदानवप्रशमनैकरतिस्तरसा भुवि ॥११५॥ वियति वायुपथे ज्वलनाकुलेऽवनितले तवदेवि च यद्वपुः । तदजिते प्रतिमे प्रणमाम्यहं भुवनभाविनि ते भव वल्लभे ॥११६॥ Ci रचे गये वृत्तांत के कारण मैंने तुम्हें शाप दे दिया है । शङ्कर के साथ एकान्त में नारी का प्रवेश जानकर मैंने यह शाप दिया हैं ॥१०७॥ शाप को लौटाया तो नहीं जा सकता है किन्तु मैं तुमको बतला रही हूँ । तुम शीघ्र ही मनुष्यता का परित्याग करके और सम्पूर्ण कामनाओं से सम्पन्न होकर आओगे ॥१०८॥ इसके बाद वीरक ने शिर से माता को पूर्ण मन से प्रणाम करके पूर्ण चन्द्रमा के समान कान्ति वाली पार्वतीजी से कहा ।।१०९॥ वीरक ने कहा-- हे देवताओं और असुरों के द्वारा प्रणाम करते समय उनकी मुकुट मणियों से प्रकाशित नख एवं चरण वाली माँ, पर्वत पुत्रि, शरणागत वत्सले ! हे विनम्र जीवों के कष्ट को नष्ट करने वाली !आपको नमस्कार है ॥११०॥ आपका कन्धा सूर्य मण्डल से समलंकृत है, विशाल स्वर्ण पर्वत की कान्ति के समान कान्ति वाली माँ, विषम परिणाम वाले संसार से भयभीत मैं आपकी शरणागति करता हूँ ॥१११॥ जिसतरह से आपने सांसारिक अभिमत नम्रता युक्त सिद्धि प्रदान की आपको छोड़कर कौन देवता ऐसे दे सकता है ? संसार में ऐसी कौन नारी है जिसे शङ्करजी प्रणाम करें तथा मुनिगण जिस तरह आपको प्रणाम करते हैं, वैसी नारी कोन है 2॥११२॥ हे सुतनु माँ विमल योग के द्वारा दुर्जय बनी हुयी महेश्वर मण्डली को अन्धकासुर के बाँधवों ने परास्त कर दिया था । ऐसे श्रेष्ठ देवताओं ने तुम्हारी स्तुति की ॥११३॥ तो आप धवल आयार्क्ष के समूह से उन्नत कन्धे वाले महामृगराज के वेग में स्थित होकर विमल शक्ति रूपी मुख वाली तथा अग्नि के समान पीत वर्ण वाली आपने अपने भुजा समूह से असुरों को पीस दिया॥ ११४॥। हे माँ ! लोक में आपको चण्डिका से भी बढकर कहा गया है । आप शुम्भ तथा निशुम्भ का विनाश करने वाली हैं । आप शरणागत जीवों के अभिप्रेत अर्थों को प्रदान करने वाली हैं । आप संसार रूपी दाव का अत्यन्त वेग पूर्वक प्रशमन करती हैं ॥११५। आकाश में वायु मार्ग में और अग्नि से व्याकुल भूतल में हे देवि ! आपका जो शरीर है । हे शङ्कर प्रिये अजिते ! आपको मेरा प्रणाम है, हे लोक कल्याणकारिणि ! आपको मेरा प्रणाम

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