Srishti Khanda Extracted Page 625

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-625

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Sanskrit Original

कक श्रीपद्ममहापुराण दत्तस्ते किंकरो देवि मया मायाशतैर्युतः । इत्युक्त्वा कौशिकी देवी विंध्यशैलं जगाम ह॥९३॥ उमापि प्राप्तसंकल्पा जगाम गिरिशांतिकम् । प्रविशंती तु तां द्वारादपहत्यसमाहितः ॥९४॥ रुरोधवीरकोदेवी हेमवेत्रलताधरः । तामुवाच च कोपेन रूपे तु व्यभिचारिणीम् ॥९५॥ प्रयोजनं न तेऽत्रस्ति गच्छ यावन्न भक्ष्यसे। देव्या रूपधरो दैत्यो देवं वंचितुमागतः ॥९६॥ प्रविष्टो न च दृष्टोऽसौ स च देवेन घातितः । घातिते चाहमाज्ञप्तो नीलकंठेनकोपिना ॥९७॥ द्वारेत्वनवधानं ते यस्मात्पश्यामि वै ततः । भविष्यसि न मे द्वास्थो वर्षपूगाननेकशः ॥९८॥ अतस्ते नात्रदास्यामि प्रवेशं गम्यतां द्रुतम्। एकां मुक्त्वा गिरिसुतां मातरं स्नेहवत्सलाम्॥९९॥ प्रवेशं लभते नान्या नारी कमललोचने । इत्युक्ता तु तदा देवी चिंतयामास चेतसा ॥९००॥ नारी नैव स दैतेयो वायुर्मे यामभाषत वृथैव वीरकश्शप्तो मया क्रोधपरीतया॥९०१॥ अकार्य क्रियते मूढैः प्रायः क्रोधसमन्वितैः । क्रोधेन नश्यते कीर्तिः क्रोधो हंति स्थिरां श्रियम्॥१०२॥ अपरिच्छिन्नतत्वार्था पुत्रं शापितवत्यहम्। विपरीतार्थबुद्धीनां सुलभो विपदागमः॥९०३॥ संचित्यैवमुवाचेदं वीरकं प्रति शैलजा । सज्ज लज्जा विकारेण वदनेनाम्बुजत्विषा ॥९०४॥ देव्युवाच अहं वीरक ते माता न तेस्तु मनसो भ्रमः । शङ्करस्यास्मि दयिता सुता तुहिनभुभृतः॥९०५॥ मम गात्रच्छविभ्रांत्या मा शङ्कां पुत्र धारय । तुष्टेन गौरता दत्ता ममेयं पद्मजन्मना॥१०६॥ मया शप्तोस्यविदिते वृत्तांते दैत्यनिर्मिते । ज्ञात्वा नारीप्रवेशं तु शङ्करे रहसि स्थिते ॥९०७॥ लाख यक्ष अनुचर हैं । इसको मैंने तुम्हें किंकर रूप से प्रदान किया है । यह अनेक प्रकार की मायाओं को जानता है । इसतरह से कौशिकी देवी विंध्याचल पर चली गयीं ॥९२-९३॥ उमा-भी अपने मनोरथ को प्राप्त करके भगु शिव के पास गयी । प्रवेश करती हुयी देवी को द्वार से हटाकर हाथ में वेत्रलता को धारण करने वाले सावधान वीरक ने ॥९४॥ रोक दिया । उसंने क्रोध करके कहा रूप बदलकर धोखा करने वाली ॥९५॥ जब तक में तुम्हें खा न जाऊं उससे पहले ही तुम यहाँ से चली जाओ । यहाँ तुम्हारी कोई आवश्यकता नहीं है । देवी का रूप बनाकर दैत्य भगवान् शिव के पास आया था ॥९६॥ वह प्रवेश कर गया और मैं उसे देख नहीं सका भगवान् शिव ने उसे मार दिया । उसके बाद क्रुद्ध होकर भगवान् नीलकण्ठ ने कहा ॥९७॥ मैं देखता हूँ कि द्वार पर तुम सावधान नहीं रहते हो अतएव अनेक वर्षों तक तुम मेरा द्वारपाल नहीं रहोगे ॥९८॥ अतएव मैं तुम्हें जाने नही दूँगा तुम शीघ्र चली जाओ । केवल अपनी स्नेहवत्सला माता पार्वती को छोड़कर मैं किसी दूसरी स्त्री को नहीं जाने दूँगा ॥९९॥ हे कमललोचने ! यहाँ कोई दूसरी नारी प्रवेश नहीं कर पायेगी । इसतरह से कहने पर देवी ने अपने मन में सोचा॥ १० ०॥ जिसके विषय में वायु ने मुझे कहा था, वह नारी नहीं अपितु दैत्य था । क्रुद्ध होकर मैने वीरक को व्यर्थ ही शाप दे दिया ॥१०१॥ क्रोधी मूर्ख प्रायः गल्त काम कर बैठते हैं । क्रोध से यशका नाश हो जाता है । क्रोध स्थिर लक्ष्मी को नष्ट कर देता है ॥१०२॥ विषय को ठीक-ठीक नहीं जान सकने के कारण मैंने अपने पुत्र को शाप दे दिया । जिसकी बुद्धि विपरीत हो गयी है, उसको यहाँ बड़ी आसानी से विपत्ति मिल जाती है ॥१०३॥ इसतरह से विचार करके वीरक से लज्जा से लज्जित मुख कमल से पार्वती ने कहा ॥१०४॥ देवी ने कहा-- वीरक मैं तुम्हारी माँ हूँ; तुमको भ्रम नहीं होना चाहिए । मैं शङ्कर की पत्नी और हिमालय की पुत्री हुँ ॥१०५॥ मेरे शरीर की छवि के भ्रम से तुम शंका न करो । प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने मुझे यह गौरता प्रदान किया है ।।१०६॥ दैत्य के द्वारा

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