Srishti Khanda Extracted Page 624
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-624
Sanskrit Original
निर्जगाममुखात्क्रोध:. सिंहरूपीमहाबल:। स॒तु सिंहः करालास्यः सटाजटिलकंधरः ॥७९॥ ऊर्ध्व प्रोद्धूतलांगूलो दंष्टोत्कटमुखावट: । व्यादितास्यो लंबजिह्ृः क्षामः कुक्षिबलादिषु ॥८ ०॥ अस्यास्ये वर्तितुं देवीव्यवस्थितवती तदा । ज्ञात्वा मनोगतं तस्या भगवांश्चतुराननः ॥८१॥ आजगामाश्रमपदं संपदामाश्रयं यतः। आगम्योवाचदेवेशो गिरजां स्पष्टया गिरा ॥८२॥ ब्रह्मोवाच किं पुनः प्राप्तुकामासि किमलभ्यं ददामि ते। विरम्यतामतिक्लेशात्तपसोस्मान्मदाज्ञया ॥८३॥ तच्छुत्वोवाचगिरिजा गुरोगौरवयंत्रितम् । वाक्यं वाचा हरोद्गीर्णवर्णनिर्गमवांछितम् ॥८ ४॥ देव्युवाच तपसा दुष्करेणाप्तः पतिर्वै शङ्करो मया । स मां श्यामलवर्णेति बहुशः प्रोक्तवान् रहः ॥८५॥ तस्मादहं कांचनाभवर्णा तन्नामसंयुता । भर्तुर्भूतपतेरंगमेकतो निर्विषं भवेत्॥८ ६॥ तस्यास्तद्धाषितं श्रुत्वा प्रोवाच जगदीश्वरः । एवं भव त्वं भूयश्च भतुर्दिहार्दचारिणी ॥८७॥ ततस्तत्याज तां कृष्णां फुल्लनीलोत्पलत्वचम् । त्वक्च साप्यभवद्धीमा घंटाहस्ता त्रिलोचना ॥८८॥ नानाभरणसंपूर्णा पीतकौशेयधारिणी। तामब्रवीत्ततो ब्रह्मा देवीं नीलांबुजत्विषम्॥८ ९॥ निशेभूधरजादेहसंपर्का त्वं मदाज्ञया। संप्राप्ता कृतकृत्यत्वमेकानंशापुरोह्यसि॥९ ०॥ य एष सिंहः प्रोद्धूतो देव्याः क्रोधाद्दरानने। स तेस्तु वाहनं देवि केतौ चास्तु महाबलः ॥९१॥ गच्छ विंध्याचलं तत्र सुरकार्यं करिष्यसि। पंचालो नाम यक्षोयं यक्षलक्षपदानुगः॥९२॥ पर उसके बाद ॥७७-७८॥ उनके मुख से महाबली सिंह का रूप बनाकर क्रोध निकला । भयङ्कर मुख वाला वह सिंह आयाल और जटा धारण किए हुए था ॥७९॥ वह अपनी पूंछ ऊपर उठाये था और उसका मुख भयङ्कर दाँतों वाला था । उसका मुख खुला था, जीभ लम्बी थी और उसकी कमर पतली थी ॥८०॥ देवी उसके मुख में समा जाना चाहती थीं, उसी समय देवी के मनोभावों को ब्रह्माजी ने जान लिया ॥८ १॥ सम्पत्तियों के आश्रय भूत वे उस आश्रम में आये, और वे स्पष्ट रूप से देवी गिरिजा से कहे ॥८२॥ ब्रह्माजी ने कहा-- तुम फिर क्या प्राप्त करना चाहती हो ? तुम्हारे लिए क्या अलभ्य है ? मैं उसे प्रदान करता हूँ, मेरी आज्ञा है, तुम इस क्लेशप्रद तपस्या को करना बन्द करो । उस बाणी को सुनकर ब्रह्माजी की महिमा का अनुभव करती हुयी पार्वतीजी ने शङ्करजी के द्वारा कही गयी वाणी को कहा ॥८४॥ उन्होंने कहा मैंने दुष्कर तपस्या करके शङ्करजी को पति के रूप में प्राप्त किया । वे शङ्करजी अकेले में मुझको कई बार काली कह चुके हैं ॥८५॥ आप मुझे सुवर्ण के समान रूप तथा वैसा ही नाम प्रदान करें और मेरे पति का एक ओर का अङ्ग विष हीन हो जाय ॥८६॥ पार्वतजी की उस वाणी को सुनकर जगदीश्वर ब्रह्माजी ने कहा ऐसा ही होगा तथा तुम अपने पति के आधे शरीर में संचरण करोगी ॥८७॥ उसके पश्चात् पार्वतीजी ने विकसित नीलकमल के समान त्वचा का परित्याग कर दिया पार्वतीजी का वह चमड़ा अपने हाथ में भयङ्कर घण्टा लिए हुए तीन नेत्रों वाली नारी हो गया ॥८८॥ वह नारी अनेक आभरणों तथा पीला रेशमी वख धारण किये थी । उसको ब्रह्माजी ने नीलकमल की कान्ति वाली देवी कहा ॥८९॥ ब्रह्माजी ने कहा-- हे रत्रि ! तुम मेरी आज्ञा से पार्वती के शरीर के साथ रहो । कृतकृत्यता को प्राप्त तुम एक अंश से यहाँ स्थिर रहो ॥९०॥ हे वरानने ! देवी के क्रोध से यह जो सिंह उत्पन्न हुआ है, वही तुम्हारा वाहन होगा और यह महाबलवान् तुम्हारी पताका पर बना रहेगा॥९१॥ तुम विंध्याचल चली जाओ, वहाँ पर देवताओं का कार्य करोगी । यह पंचाल नामक यक्ष है, इसके एक
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know