Srishti Khanda Extracted Page 623

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-623

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

प्राप्ता प्रसन्नवदने युक्तमेवं विधं त्वायि। इत्युक्तो दानवेद्रस्तु तं बभाषे स्मितं शनैः ॥६६॥ स चाबुध्यदभिज्ञानैः प्राह त्रिपुरघातिनम् । दैत्य उवाच यातास्मि तपसः कामाद्दरं लब्धुं हिमाचलम् ॥६७॥ रतिश्च तत्र मे नाभूत्ततः प्राप्ता त्वदंतिकम् । इत्युक्तः शङ्करः शङ्कां चित्ते प्राप्तो विचारयन् ॥६८॥ हृदयेन समाधाय देवः प्रहसिताननः । कुपिता कुपितं बुद्ध्वा प्रकृत्या च दृढव्रता ॥६९॥ अप्राप्तकामा संप्राप्ता किमेतत्संविजानती। इति चित्यहरस्तस्या अभिज्ञानं विचारयन् ॥७०॥ नापश्यद्वामपाश्चे तु तदंकं पद्मलक्षणम् । लोम्नामावर्तचितं ततो देवः पिनाकधृक् ॥७ १॥ बुद्ध्वा तां दानवीं मायामाकारं गूहयंस्ततः । मेढृदंष्टरात्रमादाय दानवं तमसादयत् ॥७२॥ नचाबुध्यत तद्वृत्तं वीरको द्वाररक्षकः । कुसुमामोदिनं दृष्ट्वा स्त्रीरूपं दानवेश्वरम् ॥७३॥ दूतेन मारुतेनाशु बोधिता हिमशैलजा । श्रुत्वा वायुमुखाद्देवी क्रोधरक्ताविलेक्षणा ॥७४॥ अपश्यद्वीरकं पुत्रं हृदयेनैव दूयता । देव्युवाच मातरं मां परित्यज्य यस्मात्त्वंस्नेहविक्लवाम् ॥७५॥ विहितावसरः स्त्रीणां शङ्करस्य रहो विधौ । तस्मात्ते मानुषे रूक्षा जडाहदयवर्जिता॥७६॥ गणेशाकारसदूशी शिला माता भविष्यति । निमित्त एष विख्यातो वीरकस्य सुतादरात् ॥७७॥ संभवे प्रक्रमे चैव विचित्राख्यानसंशयः । एवमुत्सृष्टशापायां गिरिपुत्र्यामनंतरम् ॥७८॥ देखकर उसे वे उमा ही मान रहे थे । उन्होंने कहा पर्वती यह तुम्हारा साधुभाव कृत्रिम नहीं है ॥६४॥ तुम मेरे अभिप्राय को जानकर तुम मेरे पास आयी हो । तुम्हारे बिना मेरे लिए यह त्रैलोक्य सूना-सूना है ॥६५॥ प्रसन्न मुख से तुम मेरे पास आयी हो यह तुम्हारे लिए उचित ही है । इसतरह से वह दैत्य मुस्कुराते हुए धीरे से कहा । शङ्करजी भी उसके अभिप्राय को जान गये दैत्य ने कहा-- में हिमालय पर तपस्या करके वरदान प्राप्त करने के लिए गयी थी ॥६७॥ किन्तु वहाँ मेरा मन नहीं लगा, अतएव में आपके पास आ गयी । इसतरह से कहने पर शङ्करजी को शङ्का हो गयी और मुस्कुराते हुए भगवान् शिव समाहित होकर विचार किए । पार्वती स्वभाव से दृढव्रता है । वह क्रुद्ध जानकर कुपित हो गयी थी ॥६८-६९॥ अपने अभिलषित अर्थ को प्राप्त किए बिना ही लौट आयी यह कैसे सम्भव है ? इसतरह से सोचकर शङ्करजी ने उसके चिह्लों का विचार किया तो उसके वाम पार्श्व में रोओं के आर्वत से बने हुए कमल के चिह्न को नहीं देखे ॥७०॥ उन्होंने उसे दानवी माया समझकर अपने आकार को छिपाते हुए मेढ़दंष्टा नामक अस्त्र को अपनाकर उस दानव को मार दिया ॥७१॥ द्वार रक्षक वीरक उसे पहचान नहीं पाये थे। वे उस स्री वेषधारी दानव को कुसुमामोदी (मालिन) समझ लिया था ॥७३। देवताओं के दूत वायु ने इस बात को जाकर पार्वतीजी को बतला दिया । वायु के मुख से इस बात को सुनकर पार्वतीजी की आँखें क्रोध से लाल हो गयीं।।७४॥ उन्होंने अपने दुःखी हृदय से अपने पुत्र को देखा ।देवी पार्वती ने कहा-- चूकि स्नेह से परिपूर्ण अपनी माता मुझको छोड़कर तुमने अवसर प्राप्तकर शङ्करजी के पास स्त्री को एकान्तिक कृत्य के लिए जाने दिया, अतएव तुम्हारी हदयहीन, जडाबुद्धि मानुषी हो गयी है ॥७६॥ तुम्हारी माता गणेश के आकार वाली शिला होगी । वीरक के उत्पन्न होने और उसके क्रम के विषय में यह विचित्र आख्यान विख्यात है । इसतरह पार्वती के शाप दे देने

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know