Srishti Khanda Extracted Page 622
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-622
Sanskrit Original
| हतेकिलांधके दैत्ये गिरिशेनासुरद्विषा । आडिश्चकारविपुलं तपः परमदारुणम् ॥५०॥ समागत्याब्रवीदब्रह्मा तपसा परितोषितः । किमाडे दानवश्रेष्ठ तपसा प्राप्तुमिच्छसि ॥५ ९॥ ब्रह्माणमाह दैत्यस्तु निर्मृत्युत्वमहं वृणे । ब्रह्मोवाच जातानामिह संसारे विना मृत्युं न युज्यते ॥५२॥ यतस्ततोपि दैत्येद्र मृत्युः प्राप्यश्शरीरिभिः। इत्युक्तो दैत्यसिंहस्तु प्रोवाचांबुजसंभवम् ॥५३॥ रूपस्य परिवर्तो मे यदास्यात्पद्संभव । तदामृत्युर्मम भवेदन्यथा त्वमरोस्म्यहम् ॥५४॥ इत्युक्तस्तु ततोवाच तुष्टः कमलसंभवः । यदाद्वितीयो रूपस्य विवर्त्तस्ते भविष्यति ॥५५॥ तदा ते भविता मृत्युरन्यथा न भविष्यति । इत्युक्तोऽ मरतां मेने दैत्यसूनुर्महाबलः॥५६॥ तस्मिन्काले त्वसंस्मृत्य तद्दधोपायमात्मनः । प्रतिहतुर्ृष्टिपथे वीरकस्याभवंस्तदा ॥५७॥ भुजंगरूपी रंध्रेण प्रविवेश दूशःपथम् । परिहृत्य गणेशस्य दानवो रौद्रदुर्जयः ॥५८॥ अलक्षितो गणेशेन प्रविश्याथ परां तनुम् । भुजंगरूपं संत्यज्य जग्राहाथ महासुरः॥५९॥ उमारूपं रमयितुं गिरिशं मूढचेतनः । कृत्वा मायामयं रूपमप्रतर्क्यं मनोहरम् ॥६०॥ सर्वैरवयवैः पूर्ण सर्वाभिज्ञानबृंहितम् । कृत्वा भगांतरे दन्तं दैत्यो वञ्रमयं दृढम्॥६९॥ तीक्ष्णाग्रं बुद्धिमोहेन गिरिशं हंतुमुद्य॒तः । कृत्वोमारूपसंस्थानं गतो दैत्यो हरांतिकम् ॥६२॥ पापो रम्याकृतिश्चित्रभूषणांबरसंयुतः । तं दष्ट्वा गिरिशस्तुष्टस्तमालिग्य महासुरम् ॥६३॥ मन्यमानो गिरिसुतां सर्वैरवयवां तरैः। अपृच्छत्साधुभावं ते गिरिपुत्रि न कृत्रिमम्॥६४॥ या त्वं मदाशयं ज्ञात्वा प्राप्तेह वरवर्णिनी । त्वया विरहितं शून्यं ममस्थानं जगत्त्रयम् ॥६५॥ ने जब अंधकासुर का वध कर दिया, तो आडि ने घोर तपस्या की ॥५०॥ उसकी तपस्या से सन्तुष्ट होकर ब्रह्माजी ने कहा-- वत्स आडि ! हे दानवश्रेष्ठ तपस्या के द्वारा तुम क्या प्राप्त करना चाहते हो ॥५१॥ आडी ने ब्रह्माजी से कहा में चाहता हुँ कि मेरी मृत्यु न हो ब्रह्माजी ने कहा--- जो इस संसार में जन्म लेता है, वह न मरे ऐसा नहीं हो सकता है ॥५२॥ अतएव हे दैत्येन्द्र शरीरधारियों की तो मृत्यु होती ही है इसतरह कहने पर वह दैत्य श्रेष्ठ ब्रह्माजी से कहा ॥५३॥ हे ब्रह्माजी ! जब मेरा रूप परिवर्तन हो तो उसी समय मेरी मृत्यु हो, नहीं तो मैं अमर रहूँ।॥५४॥ इसतरह से कहने पर ब्रह्माजी उसकी वाणी से सन्तुष्ट हो गये और उन्होंने कहा जब तुम्हारा दूसरा रूप होगा ॥५५॥ उसी समय तुम्हारी मृत्यु होगी अन्यथा नहीं होगी । ब्रह्माजी के इस तरह से कहने पर वह महाबलवान् दत्यपुत्र अपने को अमर मान लिया ॥५६॥ उस समय अपनी मृत्यु के उपाय को भूलकर जब प्रतिहार पर विद्यमान वीरक के सत्रिकट आया तो साँप का रूप बनाकर वह भयङ्कर दानव वीरक की आँखें से बचकर भीतर प्रवेश कर गया ॥५८॥ वीरक के देखे बिना ही प्रवेश करके उसने सर्प के रूप को छोड़कर उमा का रूप धारण कर लिया । शङ्करजी से स्मरण कराने के लिए उसने मायामय ऐसा रूप बनाया कि उसके विषय में कोई शङ्का न हो ॥६०॥ उसके सारे अङ्ग तथा चिह्न उमा के ही समान हो गये । उसने अपने योनि के भीतर वज्र के समान तीक्ष्ण एवं सुदृढ दाँतों को बना लिया वह अपने बुद्धिमोह के कारण शङ्करजी को मारने के लिए उद्यत था । वह उमा के ही समान रूप तथा संस्थान को बना कर शङ्करजी के सन्निकट गया ॥६१-६२॥ उस पापी मनोहर रूप वस्र तथा भूषणों को धारण किए था । उसको देखकर प्रसन्न होकर शङ्करजी ने उसका आलिङ्गन किया ॥६३॥ उसके सारे अङ्गां को | ||
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