Srishti Khanda Extracted Page 621

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-621

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Sanskrit Original

कुसुमामोदिनी नाम तस्य शैलस्य देवताम् । सापि दृष्ट्वा गिरिसुतां स्नेहविक्लवमानसा ॥३७॥ क्व पुत्रि गच्छसीत्युच्चै रालिंग्योवाच देवता । सा तस्याः सर्वमाचख्यौ शङ्करात्कोपकारणम् ॥३८॥ पुनश्चोवाच गिरिजा देवतां मातृसंमिताम् । उमोवाच नित्यं शैलाधिराजस्य देवतात्वमनिंदिते ॥३९॥ सर्वतः सन्निधानं ते मनसातीव वत्सला । अतस्तु ते प्रवक्ष्यामि यद्विधेयं त्वयांबिके ॥४०॥ अन्यस्त्री संप्रवेशस्तु त्वया रक्ष्यः प्रयत्नतः । सरहस्ये प्रयत्नेन निषेव्यः सततं गिरौ ॥४१॥ पिनाकिनः प्रविष्टायां वक्तव्यं मे त्वयानघे । ततो हं संविधास्यामि यत्क्षमं तदनंतरम्॥४२॥ इत्युक्ता तां तथेत्युत्त्वा जगाम सा गिरिं शुभा । उमापि पितुरुद्यानं जगामाद्रि सुताद्धुतम्॥४३॥ अंतरिक्ष समाविश्य मेघमालाविलप्रभम् । भूषणानि ततोन्यस्य वृक्षवल्कलधारिणी ॥४४॥ ग्रीष्मे पंचाञ्रिसंतप्ता वर्षासु च जलोषिता। वन्याहारा निराहारा शुष्कस्थंडिलशायिनी॥४५॥ एवं साधयती तत्र तपः सा च व्यवस्थिता। ज्ञात्वा गतां गिरिसुतां दैत्यस्तत्रांतरे बली ॥४६॥ अंधकस्य सुतो हृष्टः पितुर्वथमनुस्मरन् । देवान्सर्वान्विजित्याजौ बकभ्राता रणोत्कटः ॥४७॥ आडिर्नामांतरप्रेक्षी सततं चंद्रमौलिनः । आजगामामररिपुः पुरं त्रिपुरघातिनः ॥४८॥ स तत्रागत्य ददृशे वीरकं द्वार्यवस्थितम् । विचित्य सोपि च वरं दत्तं कमलयोनिना॥४९॥ पाकर वह सर्वात्मना संतुष्ट हो गया ॥३५॥ अपनी माता को प्रणाम करके वह रक्षा करने के काम में लग गया । देवी ने देखा कि उनकी माता की सखी अलङ्कृत होकर उनके पास आ रही है ॥३६।। वह उस पर्वत की देवता थी और उसका नाम कुसुमामोदिनी था । वह भी पार्वती को देखकर स्नेह के कारण व्याकुल हो गयी ॥३७॥ उस देवता ने भी पार्वती का अलिङ्गन करके जोर से पूछा-- पुत्रि कहाँ जा रही हो ? पार्वती ने भी शङ्कर से क्रोध करने के समस्त कारणों को बतलाया ॥३८॥ उसके बाद अपनी माता के तुल्य उस देवता से कहा उमा ने कहा-- हे अनिन्दिते ! तुम इस पर्वतराज की नित्य देवता हो ॥३९। आपका यहाँ सर्वत्र सन्निधान बना रहता है, आप मन से अत्यन्त वात्सल्य गुण सम्पन्न हैं, अतएव हे मात: आपको मैं बतला रही हूँ कि आपको क्या करना है ॥४०॥ आपको दूसरी सत्री के प्रवेश से हर प्रकार से रक्षा करनी चाहिए । प्रयत्न पूर्वक रहस्य में ही रहकर सदा पर्वत की सेवा करनी चाहिए ॥४१।। हे अनधे ! यदि पिनाकी के पास किसी स्त्री का प्रवेश हो तो आप मुझे बतलायें । उसके बाद ही जो उचित होगा उसे मैं करूँगी ।।४२। इसतरह से पार्वतीजी के कहने पर वह देवता भी पर्वत पर चली गयी और पार्वती भी अपने पिता के अद्भुत उद्यान में चली गयीं ।।४३॥ मेघ माला से घिरे अन्तरिक्ष के समान कान्ति वाले उद्यान में प्रवेश करके पार्वती ने भूषणों का परित्याग करके वल्कल वस्र को धारण कर लिया ॥४४॥ वह ग्रीष्म ऋतु में पञ्चाग्नि का सेवन करती थीं और वर्षा के दिन में वह जल के भीतर रहती थी । वह वन्य फलों को खाती थी अथवा निराहार रहती थीं । शुष्क वेदी पर सोती थी ॥४५॥ पार्वती इस प्रकार से तपस्या कर रही हैं, इस बात को जानकर अन्धकासुर का पुत्र बलवान् दैत्य अपने पिता के बध का स्मरण करके प्रसन्न हो गया युद्ध में सभी देवताओं को परास्त करके वह सदा इस बात की प्रतीक्षा करता था कि कोई भी शङ्कर को मारने का मौका मिले, उसका नाम आडि था । वह त्रिपुरासुर को मारने वाले शङ्करजी के पास आया ॥४६-४८॥ यहाँ आकर उसने देखा कि द्वार पर वीरक पहरे पर है । उसने ब्रह्माजी के द्वारा प्रदत्त वरदान का विचार किया ॥४९॥ असुरों से द्वेष करने वाले शङ्करजी

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