Srishti Khanda Extracted Page 620

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-620

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Sanskrit Original

कोपकंपितमूर्द्धा सा प्रस्फुरद्दशनच्छदा । उमोवाच स्यात्सर्वं दोषदानेन निंदायां गुणिनो बलात् ॥२२॥ तवापि दुष्टसंपर्कात्संक्रांतं सर्वमेव हि। व्यालेभ्योनेकजिह्वत्वं भस्मनोऽस्नेहवृत्तिता ॥२३॥ हत्कालुष्यं शशांकोत्थं दुर्बाधत्वं विषादपि। किं चात्र बहुनोक्तेन अलं वाचां श्रमेण ते॥२४॥ श्मशानवासान्निर्भीस्त्वं ननग्नत्वात्तवनत्रपा । निर्घृणत्वं कपालित्वाद्दया ते विगता चिरम् ॥२५॥ इत्युक्त्वा मंदिरात्तस्मान्निर्जगाम हिमाद्रिजा । तस्यां व्रजंत्यां देवेश्यां गणैः किलकिला कृता॥२६॥ क्व मातर्गच्छसीत्युक्त्वा रुदद्धिर्धावितं पुनः । विष्टभ्यचरणौ देव्या वीरको वाष्पगद्रदः॥२७॥ प्रोवाच मातः किन्वेतत्कव यासि कुपितातुरा । अहं त्वामनुयास्यामि व्रजंतीं स्नेहवर्जिताम् ॥२८॥ नोचेत्पतिष्ये शिखरात्विरेरस्य त्वयोज्झितः । उन्नम्यवदनं देवी दक्षिणेन तु पाणिना ॥२९॥ उवाच वीरकं माता त्वं शोकं पुत्र मा कृथाः। शैलाम्रात्पतितुं नैव न च गंतुं मया सह ॥३०॥ युक्तं ते पुत्र गच्छामि येन कार्येण तच्छृणु । कृष्णेत्युक्ता हरेणाहं स्तंभितास्म्यवमानिता ॥३९॥ साहं तपःकरिष्यामि येन गौरीत्वमाप्नुयाम्। एष स्त्रीलंपटो देवो यातायां मय्यनंतरम्॥३२॥ द्वाररक्षा त्वया कार्या नित्यं रन््रान्ववेक्षणम् । यथा न काचित्प्रविशेद्योषित्तत्र हरांतिकम् ॥३३॥ ` दृष्ट्वा परस्त्रियं चापि वदेथा मम पुत्रक। शीघ्रमेव करिष्यामि यथायुक्तमनंतरम् ॥३४॥ एवमस्त्विति देवेशी वीरकोवाच सांप्रतम् । मातुराज्ञामृताहारप्लावितांगो गतज्वरः ॥३५॥जगाम रक्षां स द्रष्टुं प्रणिपत्य तु मातरम्। देवी चापश्यदायांतीं सखीं मातुर्विभूषिताम्॥३६॥ ने कहा-- इसतरह से कहे जाने पर पार्वतीजी ने पुन: शङ्करजी से कहा ॥२१॥ उस समय क्रोध के कारण उनका शिर काँप रहा था और ओष्ठ फड़-फड़ा रहा था उमा ने कहा-- अधिक गुणवानों के सभी दोष मिल ही जाते हैं॥२२॥ दुष्टों का सम्पर्क होने से ये सारी बातें आप में भी हैं । सर्पो से आपको कृटिलता तथा भस्म से स्नेह राहित्य मिला है ॥२३॥ चन्द्रमा से आपको हृदय की कुशलता तथा विष के संपर्क से आपको दुर्बाधता मिली है । बहुत अधिक कहने से क्या लाभ है, बहुत बोलना व्यर्थ है ॥२४॥ श्मशान में रहने के कारण आप निर्भय हो गये हें तथा नङ्गे रहने के कारण आप में निर्लज्जता आ गयी है, कपाल धारण के कारण आप में नेर्घुर्ण्य आया है, दया तो आप से चिरकाल से दूर चली गयी है ॥२५॥ यह कहकर पार्वतीजी उस भवन से निकल पड़ीं । पार्वतीजी के जाते समय सभी गण रोने चिल्लाने लगे ॥२६॥ माँ ! कहाँ जा रही हो यह कहकर सब रोते हुए उनके पीछे दौड़ने लगे । पार्वतीजी के चरणों को पकड़कर वीरक ने भरे कण्ठ से ॥२७॥ कहा माँ यह क्या कर रही हो क्रोध करके कहाँ जा रही हो ? तुम निष्ठुर हो गयी हो । मैं तुम्हारे साथ ही चलूँगा ॥२८॥ तुम यदि मुझे छोड़ दोगी तो पर्वत के शिखर से गिरकर जान दे दूँगा । देवी ने दाहिने हाथ से उसके मुखड़े को ऊपर उठाकर ॥२९॥ वीरक से कहा तुम शोक मत करो । तुम न तो शिखर से गिरना और न मेरे साथ चलो । पुत्र मैं जिस कार्य को करने जा रही हुँ उसे सुनो। शिव ने मुझे काली कहकर मेरा उपहास तथा अपमान किया है ॥३१॥ में ऐसी तपस्या करूंगी कि मैं गोरी हो जाऊँ। शिव स्त्री लम्पट है मेरे चले जाने के बाद ॥३२॥ तुम द्वार की रक्षा करना और सावधानी से देखना जिससे कि कोई सत्री शङ्कर के पास न जाय ॥३३॥ पुत्र किसी स्त्री को देखना तो मुझको बतलाना, उनके बाद जैसा उचित होगा वैसा मैं करूंगी।३४॥ वीरक ने पार्वतीजी से कहा ठीक है, मैं ऐसा ही करूंगा। माता की आज्ञा रूपी अमृत के आहार को

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