Srishti Khanda Extracted Page 619

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-619

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Sanskrit Original

A श्रीपद्ममहापुराण त्वं हि मुष्णासि दशनान्नेत्रहंताभगस्य च । आदित्यस्त्वां विजानाति भगवान् द्वादशात्मकः ॥७॥ मूर्ध्नि शूलं जनयसि स्वैदोषिर्मामधिक्षिपन् । यस्त्वं मामात्थ कृष्णेति महाकालोसि विश्रुतः ॥८॥ यास्याम्यहं परित्यक्तुमात्मानं तपसा गिरिम् । जीवंत्या न मया कृत्यं धूर्तेन परिभूतया॥९॥ कापालिकेन क्षुद्रेण शमशाने नित्यवासिना। भूत्या बिलिप्तस्वांगेन मातृमध्यस्थचारिणा ॥१०॥ निशम्य तस्या वचनं कोपतीक्ष्णाक्षरं हरः । उवाचानिष्टसंभ्रांतः प्रचलेनेंदुमौीलिना ॥९९॥ शर्व उवाच अगात्मजासि गिरिजे नाहं निंदापरस्तव। चाट्क्तिबुध्या तु मया कृत उन्मादसंश्रयः ॥१२॥ विकल्पः स्वस्थचित्तो तु गिरिजेन मम क्रमात्। यद्योवं कुपिता भीरु तत्त्वाहं न वै पुनः॥९३॥ नर्मवादी भविष्यमि जहि कोपं शुचिस्मिते । शिरसा प्रणतेनैष रचितस्ते मयांजलिः॥९४॥ निहीनो ह्यापमानेन निंदितेनैति विक्रियाम् । असतां तु सतां न स्यान्मर्मस्पृष्टो नरः किल ॥९५॥ अनेकैश्चाटुभिर्देवी देवेन प्रतिबोधिता । कोपं तीव्रं न तत्याज सतीमर्मणि घट्टिता॥१६॥ अवष्टब्धमथाच्छिद्य वासः शंकरपाणिना। विपर्यस्तालकावेगाद्नन्तुमैच्छच्च शैलजा ॥९७॥ तस्या ब्रजंत्या: कोपेन पुनराह पुरांतकः । सत्यं सर्वैरवयवैस्तनोषि सदृशं पितुः ॥१८॥ हिमाचलस्य शृंगस्थमेघजालाकुलं मनः । तथा दुरवगाह्येभ्यो गहनो हि तवाशयः॥९९॥ काठिन्यमश्मसारेभ्यो वनेभ्यो बहुलां गता। कुटिलत्वं निम्नागाभ्यो दुःसेव्यत्वं हिमादपि॥२०॥ संक्रांत सर्वमेवैतत्तन्वंगि हिमभूधरात् । इत्युक्ता सा पुनः प्राह गिरिशं शैलकन्यका ॥२९॥ द्वादशात्मा भगवान् सूर्य ही जानते हैं ॥७॥ आप ही अपने दोषों से शूल उत्पन्न करते हैं, और मुझ पर दोष लगाते हैं । आपने मुझे काली कहा-- किन्तु आप तो महाकाल हैं ॥८॥ मैं पर्वत पर जाकर तपस्या करके अपना प्राण त्याग दूँगी । कपाल धारण करने वाले, क्षुद्र, निरन्तर श्मशान में रहने वाले, अपने शरीर में चिता का भस्म लपेटने वाले तथा मातृकाओं के मध्य में विचरण करने वाले, धूर्त के द्वारा अपमानित होकर मुझे अपने जीवन से कोई भी प्रयोजन नहीं है ।।९-१०॥ क्रोध के कारण पार्वतीजी के तीक्ष्ण वचनों को सुनकर होने वाले किसी अनिष्ट की शङ्का से शङ्करजी ने अपने शिर को कंपाते हुए कहा ॥११॥ हे गिरिजे ! तुम पर्वत पुत्री ही हो । मैने तुम्हारी निन्दा नहीं कर रहा हुँ । मैं तो परेमोन्मत्त होकर इन बातों को चाटुकारिता की बुद्धि से कहा है ॥१२॥ मेरे स्वस्थ चित्त में विकल्प नहीं है । यदि तुम इसतरह से क्रुद्ध होती हो तो फिर मैं ऐसा मजाक नहीं करूँगा । मधुर मुस्कान वाली, क्रोध छोड़ो मैंतुम्हें प्रणाम करता हूँ, हाथ जोड़ता हूँ ॥१३-१४॥ दुष्ट और हीन व्यक्ति भी अपमान तथा निन्दा के कारण विकार युक्त (क्रुद्ध) हो जाता है, सज्जनों को तो मर्मस्पर्शी नहीं होना चाहिए ॥१५॥ इसतरह से अनेक प्रकार से भगवान् शिव द्वारा मनाये जाने पर भी देवी पार्वती ने हृदय से दुःखी होने के कारण अपने तीव्र कोप का परित्याग नहीं किया॥ १६॥ उसके बाद शङ्करजी द्वारा हाथों से रोके जाने पर भी उनके हाथों को हटाकर विखरे हुए केशों वाली पार्वती वेग से जाना चाहीं ॥१७॥ वेग पूर्वक जाती हुयी पार्वतीजी से शङ्करजी ने फिर कहा शङ्करजी ने कहा-- यह सत्य है कि तुम अपने अङ्ग-अङ्ग से अपने पिता के ही समान आचरण करती हो ॥१८॥ हिमालय के शिखर पर स्थित मेघ समूह के समान तुम्हारा मन चझल है और उसी तरह तुम्हारा अन्तःकरण भी अत्यन्त दुरवगाह्य है॥ १९॥ तुम्हारा हृदय वज्र से भी अधिक कठोर है, तुम वनों से बहुलता प्राप्त हो, नदियों से भी अधिक कुटिल (टेढी) तथा हिम (वर्फ) से भी अधिक दुःसेवनीय हो ॥२०॥ सुन्दरी ये सारे हिमालय के गुण तुममें आ गये हैं । पुलस्त्य महर्षि

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