Srishti Khanda Extracted Page 618

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-618

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Sanskrit Original

गिरिजाप्यसितापांगी नीलोत्पलदलच्छवि: । विभावर्या च संपृक्ता बभूवातीव गोमयी॥५१५॥ तामुवाच ततो देवः क्रीडा केलिकलायुताम् ॥५१६॥ इति श्रीपद्मपुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे गौरीविवाहवर्णनं नामत्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४३॥ — Re चौवालिसवाँ अध्याय शर्व उवाच शरीरे मम तन्वंगि सिते भास्यसितद्युतिः । भुजंगीवासिताशुभ्रे संश्रिलष्टा चंदने तरौ॥९॥ चंद्रातपेन संपृक्ता रुधिराम्बरसंवृता । रजनीवासिते पक्षे दृष्टिदोषं ददासि मे ॥२॥ इत्युक्ता गिरिजा तेन मुक्तकंठा पिनाकिनम्। उवाच कोपरक्ताक्षी भ्रुकुटीविकृतानना ॥३॥ देव्युवाच स्वकृतेन जनःसर्वो जाड्येन परिभूयते । अवश्यमर्थी प्राप्रोति खंडनं शशिमंडनम्॥४॥ तपोभिदीर्घचरितै र्या त्वां प्रार्थितवत्यहम् । तस्या मे नियतस्त्वेष ह्यावमानः पदे पदे ॥५॥ नैवास्मि कुटिला शर्व विषमा न च घूर्जटे। सविषस्त्वं जगत्ख्यातो व्यक्तदोषाकराश्रयः ॥६॥ भगवान् शिव शयन किए ॥५१४॥ काली-काली कटाक्षों वाली तथा नील कमल के समान सौन्दर्य वाली पार्वतीजी भी रात्रि से संबद्ध अत्यन्त निद्रित हो गयीं । क्रीडा की केली की कला को जानने वाली पार्वतीजी से भगवान् शिव ने कहा ॥५१६॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड का गौरीविवाह वर्णन नामक तैतालिसवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।।४३।। "शीर श्यामवर्ण की पार्वतीजी से भगवान् शिव का मनोविनोद, पार्वतीजी की तपस्या, ब्रह्माजी के वरदान से पार्वतीजी को गौरित्व की प्राप्ति, स्कन्द का जन्म, स्कन्द तारकासुर युद्ध और स्कन्द द्वारा तारकासुर का वध भगवान् शिव ने कहा-- हे सुन्दरि ! मेरे श्वेतवर्ण के शरीर पर श्याम वर्ण वाली तुम उसी तरह से सुशोभित होती हो, जिस तरह श्वेत वर्ण के चन्दन वृक्ष से कोई श्यामवर्ण की नागिन लिपटी हो ॥१॥ चन्द्रमा की कान्ति से संलग्न रक्त वर्ण के वस्र को धारण की हुयी तुम कृष्ण पक्ष की रात्रि के समान मेरे नेत्रं में दृष्टि दोष उत्पन्न करती हो ॥२॥ शङ्करजी के द्वारा ऐसा कहने पर पार्वतीजी ने उनके गले का संस्पर्श त्याग दिया और क्रोध से आँखे लाल-लाल करके तथा अपनी भोहें टेढी करके कहने लगीं ॥३॥ देवी ने कहा-- कोई भी मनुष्य अपनी जडता के ही कारण अपमानित होता है । अर्थी मनुष्य चन्द्रमा के अलङ्करण को अवश्य प्राप्त करता है ॥४॥ दीर्घकाल तक तपस्या करके मैंने आपको अपने पति के रूप में प्राप्त किया यही कारण है कि आप मेरा पग-पग पर अपमान करते हें ॥५॥ हे धूर्जटे! हे शर्व! मैं तो विषमा और न कुटिल बुद्धि वाली हूँ । हाँआपका ही विष युक्तत्व तथा दोषाकर (चन्द्रमा) युक्तत्व प्रख्यात है ॥६॥ आप ही भग देवता के दाँत और नेत्र का अपहरण करने वाले हैं । आप को तो

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