Srishti Khanda Extracted Page 617
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-617
Sanskrit Original
सिंहनादाकुले गंडशैलेज्वलद्रलजाले बृहत्सालतालेक्षणम् । फुल्लनानातामालालिकालेक्षणं वृक्षमूले विलोलोमरालेक्षणम् ॥५ ० ३॥ स्वल्पपंकेजले पंकजांकेक्षणं मातुरंकेशुभे निष्कलंके क्षणम् । परिक्रीडते बाललीलाविसारी गणेशाधिपो देवतानंदकारी ॥५० ४॥ निकुंजेषु विद्याधरोद्वीतशील: पिनाकीवलीलाविलासै: सलील: । प्रकाश्यभुवनं गोर्भिस्ततो दिनकरे गते ॥५०५॥ देशांतरं तदापश्चाहुरस्थो धरणीधरः । मित्रत्वमस्य सुदृढं हृदये द्योतयन्निव ॥५०६॥ नित्यमाराधितो विप्रैः श्रीमान् विखनसः सुतः। नाकरोत्सवितुर्मेरुरुपकारं पतिष्यतः ॥५ ० ७॥ जनेष्वेषाव्यवस्थेति श्रूयतेस्खलितोह्यधः । दिनेनानुगतो भानुः स्वजनं परिपूरयन् ॥५०८॥ संध्या बद्धांजलिपुटा मुनयोभिमुखा रविम् । यावदध्यासते शीघ्रं निवार्योष्णाभिभाविताम् ॥५०९॥ व्यजृंभताथलोकेस्मिन् क्रमाद्वैभावरं तमः । कुटिलस्येव हृदये कालुष्यं दूषयन्मनः ॥५९०॥ ज्वलत्फणिफणारत्नदीपोद्योतितभित्तिके । शयने शशिसंघातरत्मवस्त्रोत्तरच्छदे ॥५११॥ नानारत्मद्युतिलसच्छक्रचापविडंबके । रत्मैः किंकिणिजालेन लसमन्मुक्ताकलापके ॥५१२॥ कमनीयचलल्लीलावितानाच्छादितांबरे । मंदरे मंन्दसंचारं गते गिरिसुतायुतः॥५१९३॥ तस्थौ गिरिसुताबाहुलतामिलितकंधरः । शशिमौलिः सितज्योत्स्नास्फारपूरितगोचरः ॥५१४॥ जो दूसरे जन्म में पार्वतीजी का पुत्र बन चुका था ॥५०१॥ उसकी क्रीडा करने से तृप्ति कैसे हो सकती थी ? जो अपने प्रभाव से ब्रह्मा के तेज से जगत् की कल्पना किया दिव्य गीतों के समय चञ्चल गणेशों को देख रहा था, सिंहनाद से व्याप्त पर्वत पर चमकते हुए रत्नों के समूह पर विशाल ताल वृक्ष का विकसित तमाल समूह का वृक्षों की जड़ में चञ्लल हंसों का ॥५०२-५०३॥ जिसमें कीचड़ बहुत कम था ऐसे जल में कमलों का अवलोकन तथा माता पार्वती की गोद में निर्दोष अवलोकन कर रहा था । बाल लीला का विस्तार करने वाले वीरक गणेशों का स्वामी तथा देवताओं को आनन्दित करने वाला था ॥५०४॥ वह निकुझ्ों में विद्याधरों के समान गीत गाने वाला था और शङ्करजी के ही समान आसानी से लीलाएँ करता था । जब संसार को प्रकाशित करके सूर्य डूबने लग गये ॥५०५॥ उसके पश्चात् वे पर्वतराज इसके हदय स्थित सुदृढ मित्रता को मानो प्रकाशित करते हुए के समान सूर्य से दूर हो गये।।५ ०६॥ ब्राह्मणों ने ब्रह्मा के पुत्र नित्य अग्नि की आराधना की । गिरते हुए सूर्य की सुमेरु ने सहायता नहीं की।॥५०७॥ नीचे जिनका पतन हो जाता है, उन लोगों के भी विषय में यही व्यवस्था सुनी जाती है । सूर्य के पीछे दिन भी अपने जनों को परिपूर्ण करते हुए बीत गया ॥५०८॥ संध्या करने के लिए मुनिजन सूर्य के समक्ष हाथ जोड़कर खड़े हो गये । जब तक संसार में उष्णता दूर ही हो रही थी ॥५०९॥ उसी समय संसार में रात्रि का अन्धकार कुटिल व्यक्ति के मन को दूषित कर देने वाले कलुषता के समान फैल गया॥५१०॥ सर्पो की फणाओं के रत्नों की ज्योति दिवारों में प्रतिबिम्बित होने लगी । चन्द्रमा की किरण समूह के समान वसनो वाली शय्या पर ॥५११॥ अनेक रत्नों की कान्ति से सुशोभित वह शय्या इन्द्रधनुष के समान लगती थी । रत्नों की किंकिणी (छोटी घुंघरु) के समूह से मोती की मालायें सुशोभित हो रही थी ॥५१२॥ मनोहर चाँदनी से आच्छन्न वह शय्या थी । जब मन्दराचल पर लोगों का आना जाना कम हो गया उस समय पार्वतीजी के साथ॥५१३॥ पार्वतीजी की बाहुलता से जिनका कंधा सटा हुआ था एसे अपनी ध्वल कान्ति से प्रकाशित करने वाले
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