Srishti Khanda Extracted Page 616

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-616

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

मोहमायाति यः स्वल्पवेत्ता जडो मां सविण्मूत्रसंघातदेहोद्वहः । द्रष्टमभ्यंतरे नाकवासेश्वरेष्विन्दुमौलिं प्रविष्टेषु कक्षांतरम् ॥४९४॥ वाहनान्येव मारोहमाणास्ततो लोकपालार्रपूगं मुहूत्तवधि । खड्गएषोविखड्गाकरोनिर्मलः कृंतक: कस्य केनाहतो ब्रूत नः ॥४९५॥ नोभवेद्धस्तदंडेन किं ब्रूमहे भीममूर्त्यङ्गणेनास्ति कृत्यंगिरौ । पाशएषोस्ति तेनात्रकोबध्यते मा वृथालोकपालानुगास्तिष्ठत ॥४९६॥ एवमेवैतदित्यब्रुवंस्ते तदा वीक्ष्य देवानुगं वीरकं रक्षकम् । प्राह देवी वने पर्वते निर्जराध्यप्रिशालामुखे भूतले भूतपाः ॥४९७॥ निर्झरांभोनिपातेषु नोमज्जतात्पुष्पजालावनद्धेषु धामस्वपि । प्रोच्चनानाद्रिकुंजावगाहेष्वथो मारुतास्फोटसंरक्षणे कामतः ॥४९८॥ कांचनोत्तुंगश्ृगावरोहक्षितौ हैमरेणूत्करासंगपिंगद्युतिः । खेचराणां वने चापि रम्ये बभौ रूपसंपत्रकारो गणोवासितुम् ॥४९९॥ मंदरे कंदरे चारु वापीतटे कुन्दमंदारपुष्पप्रवालांबुजे । सिब्धनारीभि रापीतरूपामृतं विस्तृतै्नेत्रमात्रैरनुन्मेषिभिः ॥५००॥ वीरकं शैलपुत्री निमेषांतरादस्मरत्पुत्रगृध्चुर्विनोदार्थिनी । सोऽपि तादृक् क्षणावाप्तपुण्योदयो यो हि जम्मांतरेऽ स्यात्मजत्वं ततः ॥५ ० ९॥ क्रीडतस्तस्यतृप्तिः कथंजायते योऽपि भावाज्जगद्देघसा तेजसा । कल्पितः प्रेक्षणं दिव्यगीतक्षणं नृत्यलोलैर्गणेशैः प्रवृत्यक्षणम् ॥५ ० २॥ बाहर खेलने वाले जगत् को स्नेह पूर्वक पुत्र के स्नेह के लिए लुब्ध हो जाय ऐसा कौन है ?॥४९२-४९३॥ अल्पज्ञ जीव तो मोहित हो जाता है और मल, मूत्र मांस से युक्त शरीर केवल ढोने का काम करता है । भीतर देखने के लिए देवताओं में भगवान् शिव को दूसरी कक्षा में चले जाने पर ॥४९४॥ वाहनों पर चढ़ता हुआ वीरक लोकपालों के अस्र समूह को मुहूर्त भर वे सभी यह खड्ग है, यह विशेष खड्ग है, यह स्वच्छ है । यह किसका कृकर है कह रहा (काटने वाला दाव) । यह बतलाओ ॥४९५॥ भुजदण्ड सै काम नहीं चलेगा । इस पर्वत भयङ्कर मूर्ति की कोई आवश्यकता नहीं है । यह पाश है । इससे यहाँ पर किसको बाँधा जाता है ? हे लोकपालो के अनुचर आपलोग यहाँ पर व्यर्थ में न रहें ॥४९६॥ इस तरह से देवानुग रक्षक वीरक को देखकर लोकपालों ने कहा देवी ने कहा-- पर्वत पर देवताओं की अग्निशाला के सामने तथा भूतल पर जहाँ पर झरने का पानी गिरता हो, वहाँ पर स्नान न करो, तथा पुष्प समूह से घिरे हुए गृहों में भी न जाना अत्यन्त ऊंचे अनेक पर्वतों के कुजों में तथा जहाँ पर वायु तीब्रता से टकराती हो वहाँ पर भी मत जाना किन्तु शीघ्र ही वह वीरक गया ॥४९७-४९८॥ सुवर्ण पर्वत के शिखरों पर चढा, तथा पृथिवी पर भी जहाँ सुवर्ण के पीले-पीले कण थे वहाँ भी गया । तथा आकाशचारियों के मनोहर वन में भी वह रूप सम्पत्ति से सम्पन्न गण के साथ रहने के लिए गया ॥४९९॥ मन्दणाचल पर्वत के मनोहर वावलियों के तट पर तथा कुन्द एवं मन्दार पुष्प एवं रक्त कमल वनों में भी गया, जहाँ सिद्धों की अपनी आँखों को बन्द नहीं करने वाली नारियों ने इसके (वीरक) के रूपामृत का पान किया ॥५००॥ पर्वत पुत्री तथा पुत्र को चाहने वाली पार्वतीजी ने अपने मनोविनोद के लिए क्षणभर बाद वीरक को स्मरण किया वीरक भी उसी क्षण पुण्य के उदय हो जाने के कारण

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know