Srishti Khanda Extracted Page 615

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-615

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Sanskrit Original

श्रीपद्यमहापुराण उक्तवत्यङ्क आधाय पर्यष्वजत् तं कपोले चुचुम्बागराण्नन्दिनी । मूर्ध्युपाप्राय संमार्ज्य गात्राणि चा भूषयामास दिव्यैः स्वयं भूषणैः ॥४८ ५॥ किंकिणी मेखलानूपुरैः सन्मणिप्रोतकेयूरहारैरमूल्यै गुणैः । कोमलैः पल्लवैश्चित्रितश्चारुभिर्मगलैः कंकणैर्दिव्यमंत्रोद्धवैः ॥४८६॥ तस्य शुद्धैस्ततो भूरिभिश्चाकरोन्मिश्रसिद्धार्थकैरङ्गर क्षाविधिम् । एवमादाय चोवाच कृत्वा स्रजं मूर्ध्नि गोरोचनापत्रभंगोज्ज्वलैः ॥४८७॥ वत्सवत्साधुना क्रीडसार्दधगणैरप्रमत्तो व्रजश्रश्रवर्जशनै । व्यालमालाकुलाः शैलसानुद्रूमादंतिभिर्भग्रशाखाः परंभंगिनः ॥४८८॥ जाह्ववीमंडलक्षुव्धतोयाकुलं माविशेथाबहुव्याघ्रजुष्टे वने । वत्ससंख्येषु दुर्गेषु यद्वीरकापुत्रभावाय तां स्वच्छचित्तोजनः ॥४८ ९॥ प्रार्थितं भव्यमायातभाविन्यसौभाव्यतां सोपि निर्वर्त्यसवैर्गुणै: । एवमुक्तोनया वीरको मातरं सस्मयन्नाह लीलावशाविष्टधीः ॥४९०॥ एष मात्रा स्वयं मे कृतः कंकण: पत्रकश्चित्रितः पाटलैर्बिदुभिः । चारुपुष्पैरियं मालतीभिः कृता मालिकामे शिरस्याहिता कोमला ॥४९ १॥ तोषयामीश्वरीमित्ययं सत्वरं चिन्तयित्वा ब्रजद्वाह्मतः क्रीडनम् । स्वैर्गुणैः संयुतो वीरको हर्षितो दक्षिणात्पश्चिमं पश्चिमादुत्तरम् ॥४९२॥ उत्तरात्पूर्वमभ्येत्यसख्या युता प्रेक्षते तं गवाक्षांतराद्वीरकम् । शैलपुत्री बहिः क्रीडितारं जगत् स्रेहतः पुत्रलुब्धा यतस्सोऽत्रकः ॥४९३॥ SOMOS ENN MP uss EASED है॥४८४।। इस प्रकार से कहकर पार्वती ने उसे गोद में बैठाकर उसको गले से लगाया और उसकी गालों को चूम लिया । उसके शिर को सूंधकर तथा उसके शरीर को साफ करके अपने हाथों से उसे दिव्य आभूषणों से अलंकृत किया ॥४८५॥ किंकिणी से युक्त करधनी, नूपुर, अच्छे मणियों से जटित केयूर तथा अनर्ध्य रत्नों से उसे भूषित किया । कोमल पल्लवों के जिन पर चित्र बने थे ऐसे मंगलभय कंकण जो दिव्य मन्त्रों से उत्पन्न थे, उससे उसे भूषित किया ॥४८६॥ उसके बाद उन्होंने शुद्ध पीली सरसों से उसके अआङ्गों की रक्षा किया । इसतरह से उसको माला पहनाकर उसे गोरोचन की पत्रावली से चित्रित किया और कहा ॥४८७॥ हे वत्स ! इस समय तुम गणों के साथ खेलो और कहीं भी सावधानी पूर्वक जाओ । पर्वतों पर सर्प रहते हैं और हाथी अपने दांतों से वृक्षों की शाखाओं को तोड़ देते हैं ॥४८८॥ गङ्गा में आवर्त युक्त जल रहता है, और अनेक व्याप्रों से युक्त वनों में भी तुम मत जाना हे वत्स ! युद्धों में दुर्गो में जो वीरक होते हैं, वे पुत्र भाव के लिए स्वच्छ चित्त वाले होते हैं ॥४८ ९॥ प्रार्थना करने पर भव्यता आती है वे भी भव्यता के सभी गुणों से परिपूर्ण होते हैं पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- पार्वतीजी के द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर वीरक ने भी लीला बुद्धि से अपनी माता से कहा ॥४९०॥ माँ ने मुझे कंकण स्वयं पहनाया है तथा पाटल (गुलाब) के पराग से मेरी पत्रावली बनाया है । सुन्दर मालती पुष्पों से निर्मित कोनल माला को मेरे शिर पर रखा है ॥४९१॥ अतएव मैं इनको शीघ्र सन्तुष्ट करता हँ, इस तरह से विचार करके वह बाहर खेलने के लिए गया । अपने गणों के साथ हर्षित वीरक दक्षिण से पश्चिम दिशा में गया और पश्चिम से उत्तर दिशा में गया । उत्तर से पूर्व में आया पार्वतीजी भी अपनी सखी के साथ खिड़की से वीरक को देख रही थी । शैलपुत्री

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