Srishti Khanda Extracted Page 614
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-614
Sanskrit Original
असौ गणेश्वरो देव किं नामा किन्नरानुगः । य एष गणगीतेषु दत्तकर्णो मुहुर्मुहुः ॥४७५॥ शर्व उवाच स एष वीरको देवि सदा मे हृदयप्रियः । नानाश्चर्यगुणाधारो गणेश्वरगणार्चित: ॥४७६॥ देव्युवाच ईदृशस्य सुतस्यास्तिममोत्कंठा पुरांतक । कदाहमीदृशं पुत्रं द्रक्ष्याम्यानददायकम् ॥४'७७॥ शर्व उवाच एष एव सुतस्तेस्तु नयनानंदकारकः। त्वया मात्रा कृतार्थो हि वीरकोपि सुमध्यमे ॥४७८॥ इत्युक्ता प्रेषयामास विजयां हर्षणोत्सुकाम् । वीरकानयनायाशु दुहिता भूभृतः सखीम् ॥४७९॥ सावरुह्यात्वरायुक्ता प्रासादादंबरस्पशृः । विजयोवाच गणपं गणमध्यस्थ सूर्यकोटिप्रवर्तनम् ॥४८०॥ एहि वीरक चापल्यात्त्वया देवी प्रतोषिता । त्वामाह्यति चेत्युक्तस्त्यक्त्वा पाषाणखंडकम्॥४८ १॥ देव्याः समीपमागच्छट्विजयानुगत: शनैः । प्रासादशिखरोत्फुल्लरक्तांबुजनिभद्युतिः ॥४८२॥ तं दृष्ट्वा प्रस्थितानल्पस्वादुक्षीरपयोधरा । गिरिजोवाच पिब क्षीरमिदं वत्स स्रुतं पिब यथेच्छकम् ॥४८ ३॥ उवाच देवीसस्रेहें गिरा मधुरवर्णया । एहि सद्योहि जातोसि मे पुत्रको देवदेवेन दत्तोऽ धुनावीरक ॥४८४॥ मनोहर आकार वाला जो पत्थर के टुकडों को उठाकर कांस्य के समान बजा रहा है ॥४७४।। जिसके पीछे किन्नर चलते हैं, हे देव उसका क्या नाम है ? जो गणों के गीतों को बार-बार सुन रहा है ॥४७५॥ शङ्करजी ने कहा-- हे देवि ! यह वीरक है और यह मेरे हदय को प्रिय है । अनेक आश्चर्यमय गुणों वाला तथा गणेश्वर उसकी पूजा करते है ॥४७६॥ देवी ने कहा- हे त्रिपुर का विनाश करने वाले ! में इस तरह के पुत्र को प्राप्त करना चाहती हूँ । वह कब समय आयेगा जब मैं अपने इस प्रकार के आनंददायी पत्र को देखूँगी ॥४७७॥ शिवजी ने कहा-- तुम्हारे नेत्रों को आनन्द देने वाला यह वीरक ही तुम्हारा पुत्र हो जाय । हे सुन्दरि ! तुम जैसी माता को प्राप्त करके यह वीरक भी कृतार्थ हो जायेगा ॥४७८॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- इसतरह से शिवजी के कहने पर पार्वतजी अत्यन्त हर्षित होकर विजया नाम की अपनी सखी को शीघ्र वीरक को बुलाने के लिए भेजा ॥४७९॥ आकाश चूंबी अट्टालिका से शीघ्र ही उत्तरकर विजया ने कहा-- गणों के बीच में विद्यमान, गणों की रक्षा करने वाले तथा करोड़ों सूर्यो को प्रवर्तित करने वाले ॥४८०॥ वीरक से कहा-- वीरक तुम आओ तुमने अपनी चञ्चलता से देवी को सन्तुष्ट कर दिया है । वे तुम्हें बुला रही हैं । यह सुनकर पाषाण खण्डों को त्याग कर ॥४८१॥ वह विजया के पीछे-पीछे देवी पार्वती के पास आया । उसकी कान्ति भवन के शिखर पर विकसित कमल के समान थी ॥४८२॥ उसको देखकर अत्यन्त स्वादिष्ट दुग्ध जिनके स्तन में भर गया था ऐसी गिरिजा देवी ने कहा-- वत्स ! इस दुग्ध का तुम यथेच्छ पान करो जो मेरे स्तन से बहा है ॥४८३॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- देवी ने स्नेह पूर्वक मधुर वाणी में कहा वीरक ! तुम आओ देवराध्य भगवान् शिव ने तुमको अभी-अभी पुत्र रूप में मुझे प्रदान किया
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