Srishti Khanda Extracted Page 613
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-613
Sanskrit Original
नानाविहंगवदना नानाविधसुराननाः । कौशेयचर्मवसना नम्नाश्चान्ये विरूपिणः ॥४६३॥ गोकर्णा गजकर्णाश्च बहुवक्त्रेक्षणोदराः । बहुपादा बहुभुजा दिव्यनानास्त्रपाणयः॥४६४॥ अनेककुसुमापीडानानाव्याकुलभीषणाः । कृतनानायुधधरा नानाकवचभूषणा: ॥४६५॥ विचित्रवाहनारूढा दिव्यरूपा वियच्चराः । वीणावाद्यरवोद्घुष्टा नानास्थानकनर्तकाः ॥४६६॥ गणेशांस्तांस्तथा दृष्ट्वा देवी प्रोवाच शङ्करम् । देव्युवाच गणेशा: कतिसंख्याताः किंनामानः किमात्मकाः ॥४६७॥ एकैकशो मम ब्रूहि निष्ठिता ये पृथक्पृथक् । शङ्कर उवाच कोटिकोटिश्चसंख्याता नाना विख्यातपौरुषाः ॥४६८॥ जगदापूरितं सर्वमेभिर्भीमै महाबलैः । सिद्क्षेत्रेषु रथ्यासु जीणाँद्यानेषु वेश्मसु ॥४६९॥ दानवानां शरीरेषु बालेषून्मत्तकेषु च। एते विशंति मुदिता नानाहारविहारिणः॥४७०॥ ऊष्मपा फेनपाश्चैव धूमपा मधुपायिनः। मेदाहारा रुधिरपास्सर्वभक्षा हाभोजना: ॥४७१॥ देवादास्तापसाहारा नानावाद्यरतिप्रियाः । नहि वक्तुमनंतत्वाच्छक्यन्ते हि गणाः पृथक् ॥४७२॥ देव्युवाच नागत्वगुत्तरासंगः शुद्धांगो मुंजमेखली | मनःशिलेन कल्केन चपलो रंजिताननः॥४७३॥ भृंगदष्टोत्पलानां च स्त्रग्दामा मधुराकृतिः । पाषाणशकलोत्तानकांस्यतालप्रवर्तकः ॥४७४॥ का था । कोई रेशमी वस्त्र तो कोई चर्म धारण किए या कोई नङ्गा था, तो कोई कुरुप था ॥४६३॥ किसी का कान गो के समान, किसी का हाथी के समान था उनके अनेक मुख नेत्र तथा पेट भी अनेक थे । वे अनेक चरणों तथा अनेक भुजाओं वाले । अपने हाथ में दिव्य अख्रों को धारण किए थे ॥४६४॥ अपने बालों में अनेक कुसुमों को लगाये थे वे व्याकुल तथा भयङ्कर थे । वे अनेक प्रकार के आयुध बनाकर धारण किए थे और अनेक प्रकार के कवचों और आभूषणों को धारण किए थे । वे अनेक बाहनों पर चढे थे उनका रूप दिव्य था और वे अकाशगामी थे । वे वीणा आदि वा्यों की ध्वनि कर रहे थे और अनेक प्रकार के नृत्य करते थे ॥४६६॥ उन सभी गणेशों को उस प्रकार से देखकर देवी ने शङ्करजी से कहा देवी ने कहा-- ये गणेश कितने हैं इनका नाम क्या है ? तथा इनका स्वरूप क्या है 2॥४६७॥ मुझे आप उन सबों को अलग-अलग बतलाइये । शङ्करजी ने कहा-- इनकी संख्या अनेक करोड़ है और इनका पौरुष विख्यात है ।।४६८॥ इन भयङ्कर तथा महाबलवान् गणेशों से संसार भर गया है। सिद्ध क्षेत्रों में गलियों में, पुराने उद्यानों में तथा गृहों में ॥४६९॥ दानवों के शरीर में बालकों में और उन्मत्तं में (पागलों) ये प्रसन्नता पूर्वक प्रवेश कर जाते हैं और अनेक प्रकार के आहार और बिहार करते हैं ॥४७०॥ गर्मी का पान करने वाले, फेन पीने वाले, धूम पीने वाले, मधुपान करने वाले, मेदस खाने वाले, खून पीने वाले, सब कुछ खाने वाले, निराहार रहने वाले ॥४७१॥ देवताओं को खाने वाले तपस्वियों को खाने वाले तथा अनेक प्रकार के वाद्यों को बजाने वाले तथा रतिप्रिय, इन अनन्त गणों का पृथक्-पृथक् वर्णन नहीं किया जा सकता ॥४७२॥ इसके बाद पार्वतीजी ने पूछा-- हे देव, हाथी का चमड़ा ओढे हुए, शुद्ध अङ्गों वाला, मेखला पहने हुए, मन: शिला के रंग से जिसने अपना मुख रङ्ग लिया है ॥४७३॥ जिस पर भौरे मडरा रहे हैं, ऐसे कमलों की माला पहने हुए तथा
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