Srishti Khanda Extracted Page 612

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-612

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Sanskrit Original

हंससंघातसंदिष्टस्फटिकस्तम्भतोरणम् । अनाविलमसंभ्रांत्या बहुशः किन्नराकुलम् ॥४४९॥ शुकैर्यत्राभिदृश्यंते पद्मरागविनिर्मिताः । भित्तयो जातिसंभ्रांत्या प्रतिबिंवितमौक्तिकाः ॥४५०॥ तत्राक्षैः प्रियाया देवो विहर्तुमुपचक्रमे । स्व्छेन्दनीलभूभागे क्रीडंतौ यत्र संस्यितौ ॥४५१॥ बपुः सहायतांप्राप्तौ विनोदरसनिर्वृतौ। एवंप्रकीडतोस्तत्र देवीशंकरयोस्तदा ॥४५२॥ प्रादुर्भूतोमहाशब्दः पतितांबरगोचरः। तच्छुत्वा कौतुकाद्देवी किमेतदिति शङ्करम् ॥४५३॥ पर्यपृच्छत्सुरवरं हरं विस्मितपूर्वकम् । उवाच देवो तैतत्तदृष्टपूर्वं शुचिस्मिते ॥४५४॥ एते गणेशाः क्रीडंते शैलेस्मिन्मत्प्रियाः सदा। तपसा : ब्रह्मचर्येण नामभिः क्षेत्रसेवनैः ॥४५५॥ यैरहं तोषितः पूर्व त एते मनुजोत्तमाः । मत्समीपमनुप्राप्ता मम हृद्याः शुभानने ॥४५६॥ कामरूपा महोत्साहा महारूपगुणान्विताः । कर्मभिर्विस्मयं तेषां प्रयामि बलशालिनाम्॥४५७॥ सामरस्यास्यजगतः सृष्टिसंहरणक्षमाः । ब्रह्मचन्द्रेद्रगंर्वैस्सकिन्नरमहोरगैः ॥४५८॥ विवर्जितोप्यहं नित्यं नैभिर्विरहितो रमे। हृद्या मे चारुसर्वाङ्गि त एते क्रीडिता गिरौ ॥४५९॥ इत्युक्ता तु तदा देवीत्यक्त्वा तं विस्मयाकुला । गवाक्षांतरमासाद्य॒ प्रेक्षते चकितानना ॥४६०॥ यावंतस्ते कृशा दीर्घा हृस्वाः स्थूला महोदराः । व्याप्रेभवदनाः केचित्केचिन्मेषाजरूपिणः ॥४६ १॥ अनेकप्राणिरूपाश्च ज्वालास्याः कृष्णपिंगलाः । सौम्या भीमाः स्मितमुखाः कृष्णपिंगजटास्सदा॥४६ २॥ मयूर तथा मयूरी चल रहे थे ॥४४८॥ हंसों का समूह दिखायी पड़ता था । उसके स्तम्भ तथा तोरण स्फटिक से निर्मित थे । उसमें कोई दोष नहीं था और उसमें किन्नरगण चल रहे थे ॥४४९॥ पद्मराग मणि से जिसमें शुक पक्षी बने हुए थे । मोतियों की ही जाति के दिवार में मोती प्रतिबिम्बित हो रही थी ॥४५०॥ वहाँ पर भगवान् शङ्कर पार्वतीजी के साथ द्यूतक्रीडा करने लगे । स्वच्छ इन्द्र नीलमणि के जमीन पर अकेले पार्वती एवं शङ्करजी मनोविनोद करते हुए अक्षक्रीडा कर रहे थे । उन दोनों को छोड़कर वहाँ दूसरा कोई नहीं था ॥४५१-४५२॥ उसी समय आकाश में जोर से शब्द हुआ । उसे सुनकर देवी ने कौतुकवशात् पूछा यह कैसा शब्द है ?॥४५३॥ इस तरह से मुस्कुराते हुए शिवजी से उन्होंने पूछा । शङ्करजी ने कहा-- हे सुन्दर मुस्कान वाली इसे तुमने पहले नहीं देखा है॥४५४॥ ये सभी गणेश इस पर्वत पर खेल रहे हैं । ये मुझको सदा प्राय लगते हैं; क्योंकि वे तपस्वी हैं तथा ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं तथा इस क्षेत्र की सेवा करते हैं ।।४५५॥ जिन मुनष्यों ने मुझे पूर्व काल में प्रसन्न किया था वे हीये हैं हे शुभानने ये मेरे सामीप्य को प्राप्त किए हैं और मेरे प्रिय हैं ॥४५६॥ ये अपनी इच्छा के अनुसार रूप को बना लेते हैं, महोत्साही हैं तथा महान् रूप तथा गुण से सम्पन्न हैं । इन बलवानों के कर्म से मैं विस्मित हूँ।४५७॥ ये इस जगत् की समरसता, सृष्टि तथा संहार करने में समर्थ हैं ।ब्रह्मा, चन्द्रमा, इन्द्र तथा गन्धर्व, किन्नर तथा महोरगों (महासर्पो) से ॥४५८॥ रहित भी होकर में इन सबों के बिना नही प्रसन्न रहता हूँ । हे सर्वाङ्ग सुन्दरि ! ये मुझको प्रिय हैं तथा इस पर्वत पर क्रीडा करते हैं ॥४५९॥ इस तरह से कहे जाने पर पार्वतीजी भगवान् शिव को छोड़कर खिड़की पर आयीं आश्चर्यित होकर उन सबों को देखने लगीं ॥४६०॥ उन सबों में कोई दुबला, कोई लम्बा, कोई छोटा, कोई मोटा, कोई बड़ा पेट वाला, कोई व्याघ्र के समान मुख वाला, कोई हाथी के समान मुख वाला, कोई भेडे के समान, तो कोई बकरे के समान रूप वाला था ॥४६१॥ उनका रूप अनेक प्राणियों के समान था, उनके मुख से ज्वाला निकलती थी तथा वे काले और पीले थे । कोई सौम्य था, कोई भयङ्कर था, कोई मुस्कुराता था, उनकी जटाएँ काली और पीली थीं ॥४६२॥ उनका मुख अनेक पक्षियों का था एवं मुख अनेक प्रकार

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