Srishti Khanda Extracted Page 611
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-611
Sanskrit Original
कायेनातिविशालेन जगदापूरयत्तदा । पुत्रेत्युवाच तं देवी पुत्रेत्युचे च जाह्नवी ॥४३५॥ गांगेय इति देवैस्तु पूितोभूद्रजाननः । विनायकाधिपत्यं च ददावस्य पितामहः ॥४३६॥ पुनः सा क्रीडती चक्रे तरुं च वरवर्णिनी । मनोज्ञमंकरं रूढमशोकस्य शुभानना ॥४३७॥ वर्द्धास तं चापि कृतसंस्कारमंगलम्। बृहस्पतिमुखै विपरैर्दिवस्पतिपुरोहितैः ॥४३८॥ ततो देवैः समुनिभिः प्रोक्ता देवीत्विदं वचः । अधुना दर्शिते मार्गे मर्यादां कर्तुमर्हसि ॥४३९॥ फलं किं भविता देवि कल्पितैस्तरुपुत्रकैः । इत्युक्ता हर्षपूर्णांगी प्रोवाचाति शुभां गिरम्॥४४०॥ एकं निरुदके ग्रामे यःकूपं कारयेद्बुधः । बिंदौ बिंदौ च तोयस्य सवसेद्वत्सरं दिवि ॥४४९॥ दशकूपसमावापी दशवापीसिमो ह्वदः । दशह्नदसमा कन्या दशकन्यासमो द्वुम: ॥४४२॥ एषा वै शुभमर्यादा नियतां लोकभाविनी । इत्युक्तास्तु ततोविप्रा बृहस्पतिपुरोगमाः ॥४४३॥ जग्मुः स्वमंदिराण्येव भवानी वंद्यमातरम् । गतेषु तेषु देवोपि शङ्करः पर्वतात्मजाम् ॥४४४॥ पाणिनालम्ब्यमानेन स्वमावासमगच्छत । चित्तप्रसादजननं प्रासादाट्टालगोपुरम् ॥४४५॥ लंबमौक्तिकदामानं मालिकाकुलवेदिकम् । सुनब्धकलधौतं च कीडागृहमनोगतम् ॥४४६॥ प्रकीर्णकुसुमामोदमत्तालिकुलकूजितम् । किन्नरोद्वीतसंगीतगृहांतरिताभित्तिकम् ॥४४७॥ सुगंधिधूपसंघातं मनः प्राप्यमलक्षितम् । क्रीडामयूरनारीभिर 'भितोरभसार्पितम्॥४४८॥ उबटन को लेकर गजानन नामक मनुष्य को बना दिया ॥४३२-४३३॥ और शिवा नामक सखी के साथ पुरुष क्रीडा करती हुयी पार्वती ने उस पुरुष की मूर्ति को जाह्नवी में फेंक दिया । उसके बाद उस पुरुष का शरीर बड़ा हो गया ४३४।। उसने अपने विशाल शरीर से जगत् को भर दिया । उसको पार्वती और गङ्गा दोनों ने पुत्र कहा॥४३ ५॥ देवताओं ने उस पुरुष को गाङ्गेय कहा इस तरह वे गजानन पूजित हुए । ब्रह्माजी ने उस पुरुष को विनायकों का स्वामी बना दिया ॥४३६॥ फिर क्रीडा करती हुयी सुन्दर मुखवाली पार्वतीजी ने सुन्दर अङ्कुर से युक्त अशोक वृक्ष को बनाया ॥४३७॥ और इन्द्र के पुरोहित बृहस्पति के द्वार उसका संस्कार मङ्गल कराकर उसको बड़ा किया॥४३८॥ उस समय देवताओं और मुनियों ने पार्वतीजी से कहा आप शास्रविहित मर्यादा के अनुसार कार्यो को करें ॥४३९॥ हे देवि ! इन कल्पित पुत्रों से आपको कौन सा लाभ होने वाला है ? इसतरह से कहने पर अत्यन्त प्रसन्नता का अनुभव करती हुयी पार्वतीजी ने कहा ॥४४०॥ जो व्यक्ति जल रहित ग्राम में एक कूप बनवाता है तो उसमें जितनी बूंद जल होता है, उतने वर्ष तक वह स्वर्ग में निवास करता है ॥४४१॥ दश कूपों के फल के समान बावली निर्माण का फल होता है । दश वापी के फल के समान एक सरोवर के बनाने का फल होता है । दश सरोवर के फल के समान एक कन्या उत्पन्न करने का फल होता है तथा दश कन्या के समान एक वृक्ष के लगाने का फल होता है ॥४४२॥ यही लोक की मङ्गलमयी मर्यादा है जो लोक कल्याण करने वाली है । इसतरह से कहने पर बृहस्पति इत्यादि ब्राह्मण ॥४४३॥ जगन्माता पार्वती की वन्दना करके चले गये । उन सबों के चले जाने पर शङ्करजी पार्वतीजी को ॥४४४॥ अपने हाथ से पकड़कर अपने निवास स्थान पर चले गये । वह भवन मन को प्रसन्न करने वाला था अट्टालिकाओं और गोपुर से अलंकृत था ॥४४५॥ मोती की मालाएँ लटक रही थीं वेदियों पर मालाएँ सजी थीं, सोने चाँदी से अलङ्कृत क्रीडा गृह बने थे जो मनोनुकूल थे ॥४४६॥ बिछे हुए पुष्पों की सुगन्धि से आकृष्ट भौरें गूंज रहे थे । घर की दिवार के बाहर किन्नर गण सङ्गीत गा रहे थे ॥४४७॥ मनोनुकूल सुगन्धि युक्त धूप की सुगन्धि आ रही थी, जिसको मन से जाना जा सकता था, वह दिखायी नहीं पड़ता था । चारो ओर कीडा
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