Srishti Khanda Extracted Page 610
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-610
Sanskrit Original
ज्वलनश्चापि दिव्यानि हैमान्याभरणानि च । जातरूपपवित्राणि प्रयतः समुपस्थितः ॥४२१॥ वायुर्ववौ च सुरभिः सुखसंस्पर्शनो विभुम् । छत्रं चंद्रकरोद्दामं हासितं च शतक्रतुः ॥४२२॥ जग्राह मुदितः श्रीमान् बाहुभिर्वज्रभूषणः । जगुर्गधर्वमुख्याश्च ननृतु श्चाप्सरोगणाः ॥४२३॥ वादयन्तोतिमधुरं जगुर्गधर्वकिन्नराः । मुहूर्तादूतवस्तत्र जगुश्च नतृतुश्च वै ॥४२४॥ चपला श्व गणास्तस्थुलोडयन्तो हिमाचलम् । उपविष्टः क्रमाद्धाता विश्वकृद्धगनेत्रहा ॥४२५॥ चकारौद्वाहिकं कृत्यं पत्न्या सह यथोदितम् । दत्तार्थ्योगिरिराजेन सुरबृंदैर्विनोदितः ॥४२६॥ अवस्त्तांक्षपां तत्र पत्या सह पुरांतकः। ततो गंधर्वगीतेन तृत्येनाप्सरसामपि ॥४२७॥ स्तुतिभिर्देवदैत्यानां विबुद्धो विबुधाधिपः । आमंत्र्य हिमशैलेंद्रं प्रभाते जायया सह ॥४२८॥ जगाम मंदरगिरिं वायुवेगेन श्रृंगिणा । ततो गते भगवति नीललोहिते सहोमया रतिमनुभूतभूधर: ॥४२९॥ सबांधवो भवति हि कस्य नो मनो विश्रुंखलं जगति हि कन्यकापितुः । पुरोद्यानेषु रम्येषु. विविक्तेषु वनेषु च ॥४३०॥ सुरक्तहदयो देव्या विजहारभगाक्षिहा । ततो बहुतिथे काले पुत्रनाम्ना गिरेः सुता ॥४३९॥ सखीभिः सहिता क्रीडां चक्रे कृत्रिमपुत्रकैः । कदाचिद्वंधतैलेन गात्रमभ्यज्यशैलजा ॥४ ३ २॥ चूर्णरुद्वतयामास मलेनापूरितां तनुम् । तदुद्वर्तनक॑ गृह्य नरंचक्रे गजाननम् ॥४३ ३॥ पुरुषं क्रीडती देवी तच्चाप्यक्षिपदंभसि । जाहव्या शिवया सख्या ततः सोभूहहत्तनु:॥४ ३ ४॥ वरुण देव के द्वारा लाये गये रत्न निर्मित आभूषणों को लेकर ॥४१९॥ अनेक रत्नों से निर्मित अद्भुत पुष्पों को लेकर शिवजी को सजाया । अलङ्कारों से भूषित सबों के विषय में सब कुछ जानने वाले शिवजी खड़े हो गये॥४२०॥ अग्नि भी दिव्य शुद्ध सुवर्ण निर्मित आभरणों को लेकर सावधानी पूर्वक उपस्थित हो गये ॥४२१॥ सुगन्धित तथा सुखद वायु भी बहने लगी । चन्द्रमा की किरणों के समान स्वच्छ कान्ति वाले को ॥४२२॥ जो अनेक हीरों से समलंकृत था उसको प्रसन्नता पूर्वक इन्द्र ने धारण किया । प्रधान गन्धर्व गायन करने लगे और अप्सरायें गीत गाने लगीं ॥४२३॥ अत्यन्त मधुर वाद्य बजाकर गन्धर्व और किन्नर सङ्गीत कर रहे थे । मुहूर्त भर ऋतुओं ने भी वहाँ गाया और नृत्य किया ॥४२४॥ शिव के चञ्चल गणों ने हिमालय को मथ दिया । क्रमश: विश्व ष्ट ब्रह्मा तथा भग देवता के नेत्र को विनष्ट करने वाले शिवजी बैठ गये ॥४२५॥ और अपनी पत्नी के साथ सम्पूर्ण वैवाहिक कृत्य को सम्पन्न किए । हिमालय ने उन्हें अर्ध्य प्रदान किया शिवजी से देवताओं ने मनोविनोद किया ॥४२६॥ त्रिपुर का विनाश करने वाले शिवजी उस रात्रि को अपनी पत्नी कै. साथ वहीं निवास किए । उसके बाद गन्धवों के गीत तथा अप्सराओं के नृत्य, देवों तथा दैत्यों की स्तुति के शब्दों को सुनकर देवाधिप शिवजी जगे । प्रातःकाल हिमालय से विदा लेकर शिवजी प्रातःकाल अपनी पत्नी के साथ ॥४२७-४२८॥ नन्दी के द्वारा वायु के वेग से मन्दराचल पर्वत पर चले गये । पार्वती के साथ भगवान् शिव के चले जाने पर हिमालय ने प्रसन्नता का अनुभव किया ॥४२९॥ संसार में किस कन्या के पिता का मन अपने बान्धवों के साथ विशृंखल (अव्यवस्थित) नहीं होता है ? भगवान् शिव अत्यन्त प्रेम पूर्वक पार्वतीजी के साथ नगर के मनोहर उद्यानों में तथा एकान्त वनों में विहार किये । उसके बाद पार्वतीजी ने पुत्र के नाम से ॥४३०-४३१॥ कृत्रिम पुत्रों के द्वारा अपनी सखियों के साथ क्रीडा किया । एक बार पार्वतीजी ने अपने शरीर में सुगन्धित तेल लगाकर मैल से भरे हुए अपने शरीर में चूर्णो का उबटन लगाया । उस |
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