Srishti Khanda Extracted Page 609

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-609

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Sanskrit Original

किंकरास्तस्य शैलस्य व्यग्राश्चश्रमवर्तिनः । नद्यः समुद्रा निखिलाः स्थावरं जंगमं च यत्॥४०५॥ ते सर्वे हिमशैलस्य महिमानमवर्द्वयन् । अभवन्मुनयो नागा यक्षा गंधर्वकिन्नराः॥४०६॥ शङ्करस्यापि विबुधा गंधमादनपर्वते । सज्जमंडनसंभारास्तस्थुर्निर्मलमूर्त्तयः ॥४०७॥ शर्वस्याथजटाजूटे चंद्रखंडं पितामह: । वबंधप्रणयोदारविस्फारितविलोचनः ॥४ ० ८॥ कपालमालां विपुलां चामुंडा मूर्ध्नि बध्नती । उवाचगिरिशं काली पुत्रं जनय शङ्कर ॥४०९॥ यो दैत्येंद्रकुलं हत्वा मां रक्तैस्तर्पयिष्यति । शौरिर्वतसिकारत्नं कंठाभरणमुज्ज्वलम् ॥४९०॥भुजंगाभरणं गृह्य सज्जश्शंभोः पुरोभवत्। शक्रोगजाजिनं तस्य वसाभ्यक्ताग्रपल्लवम् ॥४११॥ दध्रे सरभसं स्विद्यद्विस्तीर्णमुखपङ्कजम् । वायवश्चववुस्तीक्ष्णास्ती क्ष्णं हिमगिरिप्रभम् ॥४१२॥ वृषं विभूषयामासु ् हरयानं मनोजवम् । विरेजुर्नयनान्तस्थाः शंभोः सूर्यानलेंदवः ॥४१३॥ स्वां द्युतिं लोकनाथस्य जगतः कर्मसाक्षिणः | चिताभस्मसमाधत्त कपाले रजतप्रभम् ॥४१४॥ मनुजास्थिमयीं मालां निवबंध च पाणिना । प्रेताधिपः पुरे दूरे सभयः समवर्तत ॥४१५॥ नानाकारमहारत्नभूषणं धनदाहतम् । विहायोदीप्तसर्पेद्रकटकेन स्वपाणिना ॥४ १६॥ कर्णोत्तसं चकारेशो ह्यमलं तक्षकं स्वयम् । निष्पन्नाभरणं चैव प्रसाध्येशं प्रसाधनैः ॥४१७॥ तत्राप्येष नियमतो ह्याभवन्व्यग्रमूर्तयः । मुमोचाभिनवान्सर्वरम्यशालिरसौषधीन् ॥४९८॥ व्याग्रा तु पृथिवी देवी सर्वभावात्मनोरमा । गृहीत्वा वरुणः साक्षाद्रत्माढ्याभरणानि च ॥४९९॥ पुष्पाणि च विचित्राणि नानारत्नमयानि तु। तस्थौ साभरणो देवः सर्वज्ञः सर्वदेहिनाम् ॥४२०॥ गये थे । सभी नदियाँ तथा सभी समुद्र तथा सभी स्थावरजंगम जीव उस पर्वत की महिमा को बढा रहे थे । मुनिगण, नाग, यक्ष, गन्धर्व तथा किन्नर भी गन्धमादन पर्वत पर शङ्करजी की सेवा में लग गये । अलङ्कार की सारी सामग्री के साथ वे निर्मल मूर्ति वाले शङ्करजी को सजाने लगे ॥४०५-४०७॥ ब्रह्माजी ने शङ्करजी की जटा समूह में चन्द्रमा के खण्ड को बाँधा । उस समय प्रेमातिरेक के कारण उनके नेत्र चमक रहे थे ॥४०८।। शङ्करजी के मूंड पर चामुण्डा देवी कपालों की माला बाँध रही थीं । काली ने शङ्करजी से कहा-- हे गिरिश अब आप पुत्र उत्पन्न करें ॥४०९॥ जो दैत्येन्द्र के वंश का विनाश करके मुझे खून से तृप्त करेगा । भगवान् विष्णु ने उनके गले में मणिमाला पहना दी॥४१०॥ सर्पो के आभूषण को शिव ने पहले से ही पहन रखा था । इन्द्र ने उनको गजासुर का चमड़ा जिसमे वसा चू रही थी उन्हें ओढा दिया ॥४११॥ उसको जल्दी से शिवजी ने अपने मुख पर पोत लिया । हवाएँ तीव्र चलने लगीं । हिमालय पर्वत के समान कान्ति वाले तथा मन के सामन वेग वाले नन्दी को शङ्करजी की सवारी के लिए सजाया गया । उस समय सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्नि भगवान् शिव के नेत्रों के भीतर रहकर सुशोभित हो रहे थे ॥४१२-४१३॥ जो लोकों के कर्मों के साक्षी हैं तथा लोकनाथ शिवजी की कान्ति के साथ उनकी अपनी कान्ति मिल गयी थी । शिवजी ने चाँदी के समान चमकते हुए चिता के भस्म को अपने कपाल पात्र में रख लिया ॥४१४॥ उन्होंने अपने ही हाथों मनुष्यों की हड्डी की माला को धारण कर लिया प्रेतों के स्वामी यम भयभीत होकर अपने नगरी में दूर ही रहे ॥४१५॥ अनेक प्रकार के रत्नों से बने आभूषण को कुबेर लाये थे उसको छोड़कर अपने हाथ से शिवजी ने उग्र विष वाले सर्प का कड़ा पहन लिया ॥४१६॥ उन्होंने स्वयं चमकते हुए तक्षकों को अपना कुण्डल बनाया । सारे आभूषणों से शिवजै को सजाकर ॥४१७॥ उसमें भी इन सबों के नियमानुसार सब व्यग्र हो गये और उन्होंने सभी मनोहर नवीन रसों तथा औषधियों को त्याग दिया ॥४१८॥ घबरायी हुयी जल्दी से पृथिवी देवी ने

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