Srishti Khanda Extracted Page 608

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-608

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Sanskrit Original

सृष्टिखण्ड : ५८३ गिरीशं ते ततो दृष्ट्वा ते समं तुष्टवुर्मुदा ॥३९२॥ मुनय ऊचुः अहो कृतार्था वयमेव सांप्रतं सुरेश्वरैर्वदितपादपल्ल्वम् । विलोकयामो गुणगौरवर्द्धिभिः समादिशेः कार्यमशेषरक्षणम् ॥३९३॥ ततः प्रहस्य सर्वज्ञ उवाच मुनिसत्तमान् । भवतां यद्धूदिगतं कार्यं तत्कुरुताधुना॥३९४॥ इत्युक्ता मुनयस्तूर्ण ययुर्यत्र च शैलजा । बभाषिरे विभागज्ञा गिरिजां गिरिंगह्रे ॥ रम्यं प्रियमनोहारि मा रूपं तपसादह ॥३९५॥ प्रीतस्ते शङ्करः पाणिमेषप्रतिग्रहीष्यति। वयमर्थितवंतस्ते पितरं पूर्वमागताः ॥३९६॥ पित्रा सह गृहं गच्छ वयं यामः स्वमंदिरम् । इत्युक्ता तपसः सत्यं फलमस्तीति चित्य सा ॥३९७॥ त्वरमाणा ययौ वेशम पितुर्दिव्यं सुशोभितम् । सा तत्र रजनीं मेने वर्षायुतसमां सती॥३९८॥ हरदर्शनसंजातसमुत्कंठा हिमाद्रिजा । ततो मुहूर्त्ते ब्राह्मो तु तस्याश्चक्कुः सुहृत्क्रियाम्॥३९९॥ नानामंगलसंदोहान्यथावत्क्रमपूर्वकम् । दिव्यमंगलसंयोगान्मंदिरे बहुमंगले ॥४ ० ०॥ उपासत गिरि मूर्ता ऋतवः सर्वकामिकाः। वायवः सुखदाः श्वासन्संमार्जनविधौ गिरेः ॥४०१॥ हर्म्येषु श्रीः स्वयं देवीं कृतनानाप्रसाधना । कांतिः सर्वेषु भावेषु ऋद्धिश्च भरणाकुला ॥४ ० २॥ चिंतामणिप्रभृतयो रत्माशशैलं समंततः । उपतस्थुर्लताश्चापि कल्पकाद्यामहाद्रुमाः ॥४ ० ३॥ ओषध्यो मूर्तिमत्यश्च दिव्यौषधिसमन्विताः । रसाश्च धातवश्चैव सर्वे शैलस्य किंकराः ॥४०४॥ स्वर्गलोक निवासी भगवान् शिव के दोनों चरणों की वन्दना किए । उसके बाद त्रिशूलधारी भगवान् शिव ने उन लोगों को प्रेम पूर्वक देखा ॥३९१॥ मुनियों ने शिवजी की प्रसन्नता पूर्वक प्रार्थना की ॥३९२॥ मुनियों ने कहा-- बड़े- बड़े देवगण जिनके चरण कमलों की वन्दना करते है, उनका दर्शन करके हमलोग कृतार्थ हो गये । गुणों के गौरव के कारण हमलोग दर्शन प्राप्त कर रहे हैं आप सम्पूर्ण कार्यो की रक्षा का आदेश दें ॥३९३॥ उसके बाद जोर से हँसकर सर्वज्ञ भगवान् शिव ने, उन श्रेष्ठ मुनियों से कहा--- आपलोगों के हृदय में जो हो, उसे आप लोग सम्पन्न करें ॥३९४॥ इसतरह से कहने पर ऋषिगण वहाँ गये जहाँ पर पार्वतीजी थीं । उस पर्वत की गुफा में विभागों को जानने वाले ऋषियों ने पार्वतीजी से कहा-- अब तपस्या के द्वारा अपने मनोहर रूप को जलाओ मत ॥३९५॥ भगवान् शिव प्रसन्न हैं, वे आपका पाणिग्रहण करेंगे । पहले आकर के हमलोगों ने तुम्हारे पिता से भी कहा है॥ ३९६॥ तुम अपने पिता के साथ घर जाओ हमलोग अपने घर जा रहे हैं । इसतरह से कहे जाने पर पार्वती ने यह निश्चित ही तपस्या का फल है, इसतरह से सोचकर ॥३९७॥ शीघ्र ही अपने पिता के सुन्दर घर में चली गयी। सती पार्वती ने वहाँ पर एक रात्रि को दश हजार वर्ष के समान बिताया ॥३९८॥ पार्वती शङ्करजी का दर्शन करने के लिए. उत्कण्ठित थीं । उसके बाद ब्राह्म मुहूर्त में उनकी सखियों ने सारी क्रियाओं को सम्पन्न किया ॥३९९॥ उनलोगों ने क्रमश: अनेक प्रकार के मङ्गल कार्यो को सम्पन्न किया । अनेक मङ्गलों से युक्त भवन में उन सभी कार्यों को पूरा किया ॥४००॥ सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाली मूर्तिमान सभी ऋतुएँ उस समय हिमालय की सेवा कर रही थीं। पर्वत की सफाई करने का काम सुख पूर्वक वायु कर रहे थे ।॥४०१॥ उस पर्वत पर चिन्तामणि आदि रत्न भर गये कल्पलता तथा कल्पद्रुम उस पर्वत पर भर गये ॥४०३॥ दिव्य औषधियों से युक्त सभी औषधियाँ मूर्तिमान थीं । उस पर्वतराज के सभी रस तथा धातुगण किंकर हो गये थे ॥४०४॥ आश्रमों में रहने वाले सभी उस शैल के किंकर बन

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