Srishti Khanda Extracted Page 607

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-607

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Sanskrit Original

संप्राप्य तु गिरेः प्रस्थं ददृशुः शङ्कराश्रमम् । प्रशांताशेषसत्वौधं पर्यस्तिमितकाननम् ॥३७७॥ निः शब्दक्षोभसलिलप्रयातं सर्वतोदिशम् । तत्रापश्यंस्ततोद्वारें वीरकं वेत्रपाणिनम् ॥३७८॥ तमेते मुनयः पूज्या विनीताः कार्यगौरवात् । ऊचुर्मधुर भाषाभिस्तेवाचं वाग्मिनां वराः ॥३७९॥ द्रष्टू वयमिहायाताः शङ्करं गुणनायकम् । त्रिलोचनं विजानीहि सुरकार्यप्रचोदिताः ॥३८०॥ त्वमेव नो गतिस्तत्र यथाकालानतिक्रमः । स्यात्प्रार्थथैषा प्रायेण प्रतीहारमयी प्रभो ॥३८ १॥ इत्युक्तो मुनिभिः सोऽथ गौरवात्तानुवाच ह । सवनस्यापरां संध्यां कर्तु मदाकिनीं गतः ॥३८२॥ क्षणेन भविता विप्रास्ततो द्रक्ष्यथ शूलिनम् । इत्युक्ता मुनयस्तस्थुर्यत्नात्कार्यविचक्षणाः ॥३८३॥ गंभीरांबुधरं प्रावृट् तृषिताश्चातका यथा । तथा क्षणेन निष्पन्न समाचारक्रियाविधिम् ॥३८४॥ वीरासनकृतोद्देशं मृगचर्म नियामितम्। ततो विनीतो जानुभ्यामवलंम्व्य महीं मुदा ॥३८५॥ उवाच वीरको देवं प्रणयैकसमाश्रयम्। संप्राप्ता मुनयः सप्त द्रष्टुं त्वां दीप्ततेजसम् ॥३८६॥ विभो समादिश द्रष्टुं ततो ध्यानमिहार्हसि । इत्युक्तो धूर्जटिस्तेन वीरकेण महात्मना ॥३८७॥ भ्रूभंगसंज्ञया तेषां प्रवेशाज्ञा ददौ तदा । मूर्द्धकंपेन तान्सप्त वीरकोपि महामुनीन् ॥३८८॥ आजुहाव विदूरस्थान्दर्शनाय पिनाकिनः । त्वराबद्धजटास्ते च लंबकृष्णाजिनांबराः ॥३८९॥ विविशुर्वेदिकां दिव्यां गिरीशस्यविभोस्ततः । वद्धपाणिपुटाक्षिप्तनाकपुष्पोत्त्करास्ततः ॥३९०॥ पिनाकि पादयुगलं वन्द्य नाकनिवासिनः। ततः स्निग्धेक्षिताः संतो मुनयः शूलपाणिना ॥३९९॥ हाथ में पारिजात पुष्प की माला लिए थे । उन पर भौरें मंडरा रहे थे ॥३७६॥ पर्वत के शिखर पर पहुँचकर उन लोगों ने भगवान् शिव के आश्रम का दर्शन किया । वहाँ के सभी जीव प्रशान्त थे । वह वन जैसे बिल्कुल शान्त था॥३७७॥ चारो ओर शब्द रहित था क्षोभ रहित जल प्रवाहित हो रहा था । वहाँ पर द्वार पर उन लोगों ने हाथ में वेत्र धारण किए हुए वीरक को देखा ॥३७८॥ कार्य के गौरव के कारण सभी पूज्य तथा विनम्र बोलने में निपुण उन मुनियों ने मधुर भाषाओं में कहा ॥३७९॥ हमलोग यहाँ पर गुणाग्रगण्य त्रिलोचन शङ्करजी से देवताओं के कार्य के लिए मिलने आये हैं ॥३८०॥ हमलोगों के लिए आप ही गति हैं । ऐसा करे कि समय का अतिक्रमण न हो। हे प्रभो ! यह हमलोगों की प्रतिहार स्वरूपिणी प्रार्थना है ॥३८१॥ मुनियों के द्वारा इस प्रकार से कहे जाने पर वीरक ने उनका सम्मान करते हुए कहा-- भगवान् शिव सवन की दूसर संध्या (मध्याह्न संध्या) करने के लिए मंदाकिनी में गये हें ॥३८२॥ हे समादरणीय विप्रों ! क्षणभर पश्चात् आपलोग उनका दर्शन कर पायेंगे । इस तरह से कहे जाने पर कार्य निपुण ऋषिगण वहीं बैठ गये ॥३८३॥ और उनकी उसीतरह प्रतीक्षा करने लगे जैसे प्यासे चातक पक्षी वरसाती मेघ की गम्भीर जलधारा की प्रतीक्षा करते हैं । क्षणभर सम्पूर्ण क्रियाओं को सम्पन्न हो जाने पर जब भगवान् शिव मृगचर्म पर वीरासन से बैठे थे उसी समय पृथिवी पर धुटनों को टेककर वीरक ने प्रसन्नता पूर्वक ॥३८४-३८५॥ प्रणाम करके स्नेह के एकमात्र आश्रय शिवजी से कहा--- आपका दर्शन करने के लिए देदीप्यमान तेज वाले सात ऋषि आये हैं ॥३८६॥ हे विभो ! आप उनको दर्शन का आदेश दें उसके बाद ध्यान करें; वीरक के द्वारा इस प्रकार से कहे जाने पर भगवान् शिव ने ॥३८७॥ अपने भौहों के इशारे से उन्हें प्रवेश करने के लिए आज्ञा दी । वीरक ने भी अपने शिर को हिलाकर सन्निकट में ही विद्यमान उन महामुनियों को ॥३८८॥ भगवान् शिव का दर्शन करने के लिए बुलाया । जिन लोगों ने शीघ्र ही अपनी जटा बाँध ली थी तथा जिनका कृष्णमृगचर्म का वस्न लटक रहा था ॥३८९॥ वे भगवान् शिव की दिव्य वेदी में प्रवेश किये । स्वर्गीय पुष्पों को चढकार हाथ जोड़े हुए वे॥३९०॥

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