Srishti Khanda Extracted Page 606
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-606
Sanskrit Original
जितार्कज्वलनज्वाला तपस्तेजोमयी ह्युमा । प्रोक्ता सा मुनिभिः स्निग्धं मानिन्याह वचोर्थवत्॥३६४॥ नाहं क्षुद्रात्किलेच्छामि ऋते शर्वात्पिनाकिन: । स्थितं च तारतम्येन प्राणिनां परमर्द्धिदम्॥३६५॥ धीरतैश्चर्यकार्याणि प्रमाणमतुलं महत्। यस्मान्नकिंचिदपरं यच्च यस्मात््रवर्तते ॥३६६॥ यस्यैश्वर्यमनाद्यंतं तमहं शरणं गता । समः स व्यवसायश्च दीर्घेण विपरीतकः ॥३६७॥ एवं निशम्य ते वाचं देव्या मुनिवरास्तदा। आनंदाश्रुपरीताक्षाः सस्वजुस्तां तपस्विनीम् ॥३६८॥ ऊचुश्च परमप्रीताः शैलजां मधुरं वचः । ऋषय ऊचुः अत्यद्धुतमहो पुत्रि ज्ञानमूर्तिरिवामला ॥३६९॥ प्रसादयसि नो भावं भवभावतप्रतिश्रयात् । ननु विद्यो वयं तस्य देवस्वैश्वर्यमद्धतम्॥३७०॥ त्वन्निश्चयस्य दृढतां वेत्तुं वयमिहागताः। अचिरादेव तन्वंगि कामस्त्वेष भविष्यति ॥३७९॥ आदित्यस्सप्रभो याति रत्नेभ्यः का द्युतिः पृथक् । कोर्थो वर्णान्स्वकांस्त्यक्त्वा तथा त्वं गिरिशं विना ॥३७२॥ यामोनेकाभ्युपायेन तमभ्यर्थयितुं वयम् । अस्माकमपि चैषोर्थः सुतरां हृदि वर्तते ॥३७३॥ अतस्त्वमेव सा बुद्धिर्यतो नीतिस्त्वमेव हि। अतो निःसंशयं कार्य शङ्करोपि विधास्यति ॥३७४॥ इत्युक्त्वा पूजितास्सर्वे मुनयो गिरिकन्यया । प्रययुर्गिरिशं द्रष्टं प्रस्थं हिमवतो महत् ॥३७५॥ गंगांम्भः प्लावितात्मानः पिंगा बद्धजटासटाः। भृंगानुयातपाणिस्थमंदारकुसुमस्रजः ॥३७६॥ सम्पन्न पार्वती का तेज सूर्य और अग्नि से भी अधिक था । मुनियों के द्वारा मधुर वाणी कहे जाने पर स्वाभिमानिनी उमाने सार्थक वाणी कहा ॥३६४॥ मैं शिव से भिन्न किसी दूसरे क्षुद्र को नहीं प्राप्त करना चाहती हूँ । वे ही सबों के भीतर तारतम्य रूप से स्थित हैं और पापियों क कल्याण करने वाले हैं ॥३६५॥ वे ऐश्वर्यमय कार्यो को धारण किए हैं । उनका प्रमाण अतुलनीय और महान् है । उनसे भिन्न कोई भी दूसरा वस्तु नहीं हैं जिससे कोई वस्तु प्रवर्तित होती हो । जिनका ऐश्वर्य अनादि और अनन्त है, मैं उन्हीं के शरणागत हूँ । वे सबों के प्रति समदर्शी हैं तथा व्यवसाययुक्त हैं । दीर्घ काल से विपरीत है ॥३६७॥ पार्वती की इस तरह की वाणी को सुनकर उन दिव्य मुनिश्रेष्ठो की आँखों में आनन्दाश्रु भर गया तथा उस तपस्विनी का उन लोगों ने आलिङ्गन किया ॥३६८॥ अत्यन्त प्रसन्नता पूर्वक उन लोगों ने पार्वती से मधुर वाणी में कहा ऋषियों ने कहा-- पुत्रि ! तुम अत्यन्त विमल ज्ञान की मूर्ति के समान हो।।३६९॥ भगवान् शिव में भक्तिभाव से युक्त होने के कारण हमारी भावनाओं को प्रसन्न कर रही हो । हमलोग भगवान् शिव के अद्भुत ऐश्वर्य को जानते हैं ॥३७०॥ तुम्हारे निश्चय की दृढता को जानने के लिए हमलोग यहाँ आये हैं । हे तन्वंगि ! शीघ्र ही तुम्हारी यह इच्छा पूर्ण होगी ॥३७१॥ सूर्य प्रभा के साथ ही रहते है, उनसे पृथक् रत्नों की काति का क्या महत्त्व हैं ? अपने वर्ण का परित्याग करने से कौन सा लाभ है ? उसीतरह शङ्कर के बिना तुम्हारा क्या महत्त्व है ॥३७२॥ हमलोग अनेक उपायों के द्वार उन भगवान् शिव की प्रार्थना करने के लिए जा रहे हैं । इस समय हमलोगों के भी हृदय में यही प्रयोजन (इच्छा) है ॥३७३॥ अतएव तुम ही नीति सम्पन्न बुद्धि स्वरूपिणी हो । अतएव बिना संशय के तुम्हें इस कार्य को करना चाहिए और शङ्करजी भी ऐसा ही करेंगे ॥३७४॥ इसतरह से कहकर तथा पार्वतीजी के द्वारा पूजित सभी ऋषिगण शङ्करजी का दर्शन करने के लिए हिमालय के महान शिखर पर चले गये ॥३७५॥ वे लोग गङ्गाजल में स्नान किए थे, अपनी पीली जटाओं को बाँधे हुए थे । वे अपने
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