Srishti Khanda Extracted Page 605
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-605
Sanskrit Original
न श्रीपद्ममहापुराण इत्युक्ता मुनयो जग्मुस्त्वरितास्तुहिनाचलम्। तत्र ते पूजितास्तेन हिमशैलेन सादरम् ॥३५२॥ ऊचुर्मुनिवराः प्रीताः स्वल्पकं तु त्वरान्विताः । मुनय ऊचुः देवो दुहितरं साक्षात्पिनाकी तव मार्गते ॥३५ ३॥ तच्छीघ्रं पावयात्मानमाहुत्येवानले हुतम् । कार्यहि तच्च देवानां सुचिरं परिवर्तते ॥३५४॥ जगदुद्धाराणायैष विधातव्यः समुद्यमः । इत्युक्तस्तु तदा शैलो हषविशवशान्मुनीन् ॥३५५॥ असमर्थोभवद्दक्तुमुत्तरंप्रार्थयन्निव । ततो मेना मुनीन्वंद्य प्रोवाच स्नेहविक्लबा ॥३५६॥ दुहितुस्तान्मुनीश्चैव वचनं स्वयमर्थवत्। मेनोवाच यदर्थ दुहितुर्जन्म चेच्छत्यपि महाफलम् ॥३५७॥ तदेवोपस्थितं सर्व प्रक्रमेणैव सांप्रतम् । कुलजन्मवयोरूपविभुत्वैस्सहितोपि यः ॥३५८॥ वरस्तस्यापि नाहूय सुता देया ह्ययाचतः । दिग्वासा जटिलः शूली दग्धकामोपि कामदः॥३५९॥ स तु मत्सुतया घोरः कथं नाम उपास्यते । मुनय ऊचुः ऐश्वर्यमवगच्छस्व शंकरस्य सुरासुराः ॥३६०॥ आराध्यमानपादाब्जयुगलाश्च सुनिर्वृताः । यस्योपयोगि यद्रूपं तेन तत्प्रार्थ्यते चिरम् ॥३६१॥ घोरं तपस्यते बाला तेन रूपेण निर्वृता। यत्सा व्रतानि दिव्यानि नयिष्यति समापनम् ॥३६२॥ तदत्रावहिता तावदस्मास्वेव भविष्यति । इत्युक्त्वा गिरिणा सार्द्ध ययुर्यत्रास्तिशैलजा ॥३६३॥ हें॥३५१॥। पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- यह कहकर वे मुनिगण शीघ्र ही हिमालय के पास गये । वहाँ पर हिमालय ने उन लोगों की आदर पूर्वक पूजा की ॥३५२॥ शीघ्रता करने के कारण मुनियों ने थोड़ी बातें की । आपकी पुत्री को पिनाकधारी भगवान् शिव प्राप्त करना चाहते हैं ॥३५३॥ अतएव शीघ्र ही अग्नि में प्रदत्त आहुति के समान आप अपने को पवित्र बना लें । उससे देवताओं का बहुत बड़ा कार्य होने वाला है ॥३५४॥ जगत् का उद्धार करने के लिए आपको यह कार्य अवश्य करना चाहिए । इसतरह से कहे जाने पर हर्षातिरेक के कारण मुनियों को उत्तर नहीं दे सके । उसके बाद हर्ष से परिपूर्ण मेना ने मुनियों की वन्दना करके कहा ॥३५५-३५६॥ उन मुनियों से उन्होने अपनी पुत्री विषयक सार्थक बातें की मेना ने कहा-- जिसके लिए महाफलवान पुत्री के जन्म की कामना की जाती है ॥३५७॥ वह सव कुछ इस समय क्रमश: प्राप्त हो गया है । कुल, जन्म, अवस्था, रूप तथा ऐश्वर्य सम्पन्न ही।।३५८॥ वर होता है उसको बिना बुलाये विना याचना किए ही पुत्री का दान करना चाहिए। वे दिग्बर, जटाधारी, काम को जलाने वाला तथा दूसरों की कामना को पूरा करने वाले हैं ॥३५९॥ उनकी मेरी पुत्री घोर उपासना के द्वार क्यों उपासना करती है । मुनियों ने कहा-- जिनके दोनों चरणों की उपासना देवता और असुर करके अपनी कामनाओं को पूर्ण कर लेते हैं, उन भगवन् शिव के ऐश्वर्य को जानो । जिसके लिए जो उपयोगी होता है, वह उसी की उपासना करता है ॥३६०-३६१॥ भगवान् शङ्कर के उस रूप से संतुष्ट होकर वह बाला उनकी घोर तपस्या करती है । अब वह अपने दिव्य ब्रतों का समापन करेगी ॥३६२॥ अतएव सावधान वह हमलोगों के बीच में होगी। यह कहकर वे मुनिगण हिमालय पर्वत के साथ वहाँ गये जहाँ पार्वती तपस्या करती थीं ॥३६३॥ तपस्या के तेज से
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