Srishti Khanda Extracted Page 604

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-604

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Sanskrit Original

प्रकटं सर्वभूतानां तदप्यथ न वित्थ किम् । कस्यैतद्वगनंमूर्तिः कस्याप्नमि: कस्य मारुतः ॥३३८॥ कस्य भूः कस्य वरुणः कश्चंद्रार्कविलोचनः । कस्यार्चयंति लोकेषु लिंगंभक्तद्या सुरासुराः ॥३३९॥ यच्च ब्रह्मश्वरा देवा विष्ण्विन्द्राद्या महर्षयः । प्रभावं प्रभवं वापि तेषामपि न वित्थकिम् ॥३४०॥ अदितेः कश्यपाज्जाता देवा नारायणादयः । मरीचेः कश्यपः पुत्रो ह्यादितिर्दक्षपुत्रिका ॥३४९॥ मरीचिश्चापि दक्षश्च पुत्रौ तौ ब्रह्मणः किल। ब्रह्मा हिरण्मयादंडादेव सिद्धविभूतिकः ॥३४२॥ कस्य प्रादुर भूद्ध्यानात्प्राकृतः प्राकृतांशकः । अथ नारायणेनैव स्वकीयेच्छासमाश्रयात्॥३४३॥ तत्प्रेरितः प्रयात्वेष जन्मनारायणात्मकम् । सापि कर्मण एवोक्ता प्रेरणा विवशात्मनाम् ॥३४४॥ यथोन्मादादिदुष्टस्य मतिरेवहि सा भवेत् । इष्टानेव पदार्थान् वै विपरीतान् हिं मन्यते ॥३४५॥ लोकस्य व्यवहारेषु दृष्टेषु हसते सदा। धर्माधर्मफलप्राप्तौ विष्णुमेव निबोधत॥३४६॥ विदध्वमित्थं मुनयोऽ सकृच्च मे गिरं गिरीशश्रुतिभूमिसन्निधौ । उत्कृष्टकेदारइवावनीले सुबीजमुष्टिं सुफलाय कर्षकाः ॥३४७॥ ते तां श्रुत्वा हितां रम्यां प्रक्रमात्प्रक्रमक्रियाम्। वाचं वाचांपतिप्रख्याः प्रोचुश्च स्मितसुन्दराः ॥३४८॥ मुनय ऊचुः जाते लोकविधाने तु सत्यं तत्कार्यमुत्तमम्। प्रायः प्रालेयशैलस्य शंकातत्कालरूपिणः ॥३४९॥ सत्यमुत्कंठिताः सर्वे ये ये कार्यार्थमुद्यताः । तेषां त्वरंते चेतांसि किंतु नाममहात्मनाम्॥३७५०॥ लोकयात्रानुगंतव्या विशेषेण विवक्षितैः। यतस्तद्धर्ममेधंते तत्प्रामाण्यं परे धृताः ॥३५९॥ आपलोग नहीं जानते हैं । यह आकाश अग्नि तथा वायु किसकी मूर्ति (शरीर) है पृथिवी और जल भी किसके शरीर हैं । चन्द्रमा और सूर्य किसके नेत्र हैं ? समस्त लोकों में देवता एवं असुर किसके लिङ्ग की भक्तिपूर्वक पूजा करते हैं ॥३३९॥ ब्रह्मा आदि देवता विष्णु, इन्द्र, यम महर्षिगण उनके ही प्रभाव से उत्पन्न हैं, क्या इस बात को भी आपलोग नहीं जानते हैं 2॥३:४०॥ नारायण आदि देवता आदिति और कश्यप के पुत्र हैं । कश्यप महर्षि मरीचि के पुत्र हैं, और अदिति दक्ष की पुत्री हैं ॥३४१॥ मरीचि तथा दक्ष ये दोनों ब्रह्मा के पुत्र हैं हिरण्मय अण्ड से ब्रह्मा की विभूति है ॥३४२॥ किसके ध्यान से प्राकृत तथा प्राकृतांश पदार्थो की उत्पत्ति होती है ? नारायण ही अपनी इच्छा से ॥३४३॥ सम्पूर्ण जन्मों को ग्रहण करते हैं । वह कर्माधीनों के इच्छा भी कर्मवशात् होती है ॥३४४॥ जिस तरह उन्माद इत्यादि दोष से दूषित व्यक्ति की बुद्धि ही दूषित होती है उसके कारण वह अभिप्रेत पदार्थों को भी विपरीत ही समझने लगता है ॥३४५॥ वह सदा लौकिक व्यवहारों को देखकर हँसता है । इष्ट और अनिष्ट फल की प्राप्ति का कारण आपलोग विष्णु को ही जानें ॥३४६॥ हे मुनियों ! आपलोग इस तरह शङ्कर के श्रवण की भूमि रूप मेरे सन्निकट बार-बार कहते रहें । उत्तम खेत में डाले गये सुन्दर बीज से सुन्दर फल ही किसान प्राप्त करते हैं।३४७॥ वे मुनिगण आदि से अन्त तक पार्वती की मनोहर वाणी को सुनकर जो वाणी बृहस्पति की वाणी के समान युक्ति युक्त थी मनोहर मुस्कान करते हुए कहने लगे ॥३४८॥ मुनियों ने कहा-- लोक का विधान हो जाने पर तो वह कार्य उत्तम ही होता है, प्राय: हिमवान पर्वत की शङ्का तत्कालानुरूप ही थी ॥३४९॥ जो लोग कार्य करने के लिए उद्यत हैं, वे तो शीघ्रता कर रहे हैं, वे महात्मागण अपने अन्त:कारण में शीघ्रता करना चाहते हैं॥३५०॥ विशेष रूप से प्रख्यात पुरुषों के द्वारा तो लौकिक विधान का अनुसरण किया ही जाना चाहिए; क्योंकि उन धर्मो की वृद्धि होती है और दूसरे लोग जो उनका अनुसरण करने वाले होते हैं, वे उनको प्रमाण मानते

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