Srishti Khanda Extracted Page 603

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-603

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Sanskrit Original

ne श्रीपद्ममहापुराण । हरिरस्ति जगद्धाता श्रीकान्तोऽ नन्तमूर्तिमान् ॥३२५॥ जप्यो यज्ञभुजामस्ति तथेन्द्रः पाकशासनः । देवतानां निधिश्चास्ति ज्वलनस्सर्वकाधुक् ॥३२६॥ वायुरस्तिजगद्धाता यः प्राणस्सर्वदेहिनाम्। तथा वैश्रवणो राजा सर्वार्थमहिमा प्रभुः ॥३२७॥ एभ्य एकतमं कस्मान्नत्वं संप्राप्तुमिच्छसि । उतान्यस्मादिह प्राप्यं सुखं ते मनसेहितम्॥३२८॥ एवमेतत्तथा पुत्रि प्रभावो लोकसम्पदाम् । अस्मिन् देहे परे वापि कल्याणप्राप्तये तव ॥३२९॥ पितुरेवास्ति ते सर्व सुरेम्यो यन्निवेदितम् । वरस्य प्राप्तये क्लेशस्स चाप्यत्राफलस्तरुः ॥३३०॥ प्रायेण प्रार्थितो ह्वार्थस्समर्थो ह्यतिदुर्लभः। स्वस्थानविनियोगित्वात्पुत्रि तत्रापि लभ्यते ॥३३१॥ इत्युक्तवत्सु कुपिता मुनिवयेंषु शैलजा। उवाच क्रोधरक्ताक्षी विस्फुरद्दशनच्छदा ॥३३२॥ देव्युवाच असद्दहस्य का नीतिर्व्यसनस्य क्व यंत्रणा। विपरीतार्थबोद्धारः सत्पथे केन योजिताः ॥३३३॥ एवं मां वित्थ दुष्यज्ञामस्थानासदग्रहप्रियाम्। न मां प्रति विचारोस्ति यदहंकारमानिनी ॥३३४॥ प्रजापतिसमाः सर्वे भवंतः सर्वदर्शिनः । न नूनं वित्थ तं देवं शाश्वतं जगतः प्रभुम्॥३३५॥ अजमीशानमव्यक्तममेयमहिमोदयम् । आस्तां तत्कर्मसद्धावं संबोधं तावदावृतम् ॥३३६॥ विदुस्तं न हरिब्रह्ममुखा अपि सुरेश्वराः । यत्तस्य विभवं स्वोत्थं भुवनेषु विजृंभितम् ॥३३७॥ माला धारण करते हैं ॥३२३॥ वे फुफकारते हुए सर्प को भूषण बनाते हें । शमशान में निवास करते हैं तथा भयङ्कर ् रमथगण उनके अनुचर हैं ॥३२४॥ जिनके चरणों पर अनेक इन्द्र अपना शिर रखते हैं, अपने शत्रुओं का विनाश करने वाले, श्रीहरि जगत् के धाता (पालक) हैं लक्ष्मीपति हैं, तथा मूर्तिमान अनन्त हैं ॥३२५॥ सभी देवता उनका भजन करते हैं तथा पाकशासन इन्द्र भी देवताओं के स्वामी हैं । अग्नि सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले देवता हैं ॥३२६॥ जगत् के पालक वायुदेव हैं, वे सम्पूर्ण जगत् के प्राण स्वरूप हैं । इसीतरह कुबेर भी समस्त धनों के स्वामी तथा महिमा सम्पन्न हैं ॥३२७॥ इन सवो में से किसी एक को तुम क्यों नहीं प्राप्त करना चाहती हो । अथवा यदि इन सवों से भिन्न व्यक्ति द्वारा प्राप्य सुख प्रभाव तथा लोक की सम्पत्ति तुम प्राप्त करना चाहती हो या इस जन्म में या जन्मान्तर में सुख को प्राप्त करना चाहती हो तो ॥३२८-३२९॥ तुम्हारे पिता की ही सम्पत्ति है, जो सभी देवताओं को निवेदित किया गया है । तुम जिस पति को प्राप्त करने के लिए क्लेश उठा रही हो वह फल हीन वृक्ष के समान है ॥३३०॥ प्रायः अत्यन्त दुर्लभ तथा समर्थ वस्तु को प्राप्त करने की कोशिश की जाती है । पत्रि ! अपने स्थान का विनियोंग करने वाला होने के कारण वह भी प्राप्त हो जाता है ॥३३१॥ मुनियों के द्वारा इस प्रकार से कहने पर पार्वती मुनियों पर क्रुद्ध हो गयीं । वह क्रोध से आँखें लाल करके कहने लगी । उस समय उसके ओठ काँप रहे थे ॥३३२॥ देवी ने कहा-- दुराग्रह की न तो कोई नीति होती है और न तो व्यसन का कोई नियन्त्रण है । विपरीत अर्थ को जानने वालों को कोई सन्मार्ग पर कौन चला सकता है 2॥३३३॥ आपलोग मुझे इस प्रकार की ही दुष्पज्ञा तथा असद्ग्रहप्रिया समझें । मेरे विषय में विचार करने की कोई जरुरत नहीं है, क्योंकि में अभिमानिनी हूँ ॥३३४॥ आपलोग तो प्रजापति के समान सर्वज्ञ हैं । निश्चित रूप से जगत् के स्वामी शिव को नहीं जानते हैं॥ ३ ३५॥ वे अजन्मा ईशान (सम्पूर्ण जगत् के नियामक) अव्यक्त तथा असीम महिमा सम्पन्न हैं । उनके रहस्यात्मक कर्मो के सद्भाव को कोई नहीं जानता है ॥३३६॥ उनको यथार्थ रूप से श्रीहरि और ब्रह्मा आदि देवेश्वर भी नहीं जान पाते हैं । उनका स्वाभाविक ऐश्वर्य सम्पूर्ण लोकों में व्याप्त है ॥३३७॥ वह समस्त जीवों को ज्ञात हें, फिर भी उसको

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