Srishti Khanda Extracted Page 602
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-602
Sanskrit Original
° सृष्टिखण्ड ५७७ भगवंतो विजानीथ प्राणिनां मनसेप्सितम् । शरीरादिभिरर्त्थं कदर्थ्यं ते हि देहिनः ॥३१२॥ केचित्तु निपुणास्तत्र घटते विविधोद्यमैः । उपायैर्दुर्लभान्भावाऱ्ग्राप्रुवंति ह्ातंद्रिताः ॥३१३॥ अपरे तु परिच्छिद्य नानाकारानुपक्रमान् । देहांतरार्थं॑सारंभमाश्रयंति हि तद्व्रतम् ॥३१४॥ ममत्वाकाशसंभूतकुसुमस्रग्विभूषितम् । विध्यशृंगसप्रष्टुकामो हस्तः प्रसरते मुहुः ॥३१५॥ अहं किल भवं देवं पति प्राप्तुं समुद्यता । प्रकृत्यैव दुराराध्यं तपस्यंतं च संप्रति ॥३१६॥ सुरासुरैरनिर्णीतं परमार्थक्रियाश्रयम्। साम्प्रतं चापि निर्दग्यो मदनो वीतरागिणा ॥३१७॥ कथमाराधयेदीशं मादृशी तादृशं शिवम् । इत्युक्ता मुनयस्ते तु स्थिरतामनसस्ततः ॥३१८॥ ज्ञातुमस्या वचः प्रोचुः प्रक्रमात्प्रकृतार्थकम्। मुनय ऊचुः द्विविधन्तु सुखं तावत्पुत्रि लोके विभाव्यते ॥३१९॥ शरीरस्यास्य संयोगश्चेतसश्चापि निर्वृतिः । प्रकृत्या तु स दिग्वासा भीमो भस्मास्थिभूषण:॥३२०॥ कपाली भिक्षुको नग्नो विरूपाक्षोऽस्थिरक्रियः। प्रमत्तोन्मत्तकाकारो बीभत्सो कृतसंग्रहः ॥३२१॥ पत्या न तेन चास्त्यर्थो मूर्तानर्थेन कांक्षितः । यदि स्वस्य शरीरस्य सुखमिच्छसि शाश्वतम् ॥३२२॥ तत्कथं ते महादेवाद्धूतभाजो जुगुप्सितात् । स्रवन्नरवसासास्थिकपालकृतभूषणःतत् ॥३२३॥ श्वसदुग्रभुजगेन्द्रकृतभूषणभूषितात् । श्मशानवासिनो रौद्रप्रमथानुगतादपि ॥३२४॥ पार्वती के मौन भङ्ग हो जाने पर गौरव प्राप्त पार्वती से पुन: पूछा ॥३१०॥ चारुहासिनी पार्वती भी गौरवपूर्ण मन से सभी मुनियों को देखकर अपने मौन को तोड़ती हुयी प्रकृष्ट वाणी में कहा ॥३११॥ हे भगवन् ! आपलोग तो सभी प्राणियों के मन की बात को जानते हैं । शरीरधारी जीवों को, शरीर आदि अत्यधिक कष्ट प्रदान करते हैं ॥३१२॥ उनमें से कुछ निपुण पुरुष अनेक प्रकार के प्रयास करते हैं और सावधानी पूर्वक रहकर वे उपायों के द्वारा दुष्प्राप्य मी पदार्थो को प्राप्त कर लेते हैं ॥३१३॥ दूसरे जीव अनेक प्रकार के उपायों का परित्याग करके दूसरे शरीर के द्वारा अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उस ब्रत को करते हैं ॥३१४॥ मैं तो आकाश पुष्प की माला से समलङ्कृत विन्ध्याचल के शिखर को छू लेने की इच्छा से मानो हाथ फैला रही हूँ ॥३१५॥ मैं इस समय तपस्यारत स्वभाव से ही दुराराध्य भगवान् शिव को अपना पति बनाने के लिए उद्यत हूँ ॥३१६। आज तक देवता और असुर दोनों उनकी प्राप्ति के साधनभूत कर्म का निर्णय नहीं कर सके हैं वे बीतराग हैं और इस समय उन्होंने कामदेव को भी जला दिया है ॥३१७॥ मुझ जैसी नारी उस प्रकार के शिव की आराधना कैसे करे ? इसे आपलोग बतलायें । इसतरह से पार्वती के मन की स्थिरता को जानने के लिए मुनियों ने ॥३१८॥ पार्वती की वाणी को सुनने के लिए क्रमश: प्रकृत विषय में कहा मुनियों ने कहा- हे पुत्रि ! लोक में दो प्रकार का सुख देखा जाता है ॥३१९॥ शरीर का संयोग और मन की भी शान्ति । शिव स्वभाव से नङ्गे रहने वाले हैं, भयङ्कर है, भस्म धारण करते हैं और हड्डियों का भूषण धारण करते हैं ॥३२०॥ कपाल धारण करते हैं भीख माँगते हैं, वे विरूपाक्ष हैं, क्योंकि उनके तीन नेत्र है और सदा अस्थिर रहते हैं । उनका आकार पागल जैसा है तथा घृणित है तथा अपने पास कुछ भी नहीं रखते हैं ॥३२१॥ उनको पति के रूप में प्राप्त करके तुम्हारा कल्याण नहीं होगा; वे अनर्थो के मूर्तिमान रूप हैं । यदि तुम शाश्वत अपने शरीर का सुख प्राप्त करना चाहती हो ॥३२२॥ तो फिर भूतों के प्रिय निन्दित महादेव को क्यों पति बनाना चाहती हो ? उनके शरीर से मनुष्यों की वसा टपकती रहती है, वे अस्थि तथा कपाल (मुण्डं) की
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