Srishti Khanda Extracted Page 601

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-601

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Sanskrit Original

तत्रांबराणि संत्यज्य भूषणानि च शैलजा । संवीतावल्कलै दिव्यै दर्भनिर्मितमेखला ॥२९७॥ त्रिः स्नाता पाटलाहारा बभूव शरदांशतम् । शतमेकेन जीर्णेन पर्णेनावर्त्तयत्तदा ॥२९८॥ निराहारा शतं साभूत्समानां तपसो निधिः। तत उद्वेजिताः सर्वे प्राणिनस्तपसोग्रिना ॥२९९॥ ततः सस्मार भगवान् मुनीन्सप्तशतक्रतुः। ते समागम्य मुदिताः सर्वे समुदितास्तथा॥३००॥ पूजितास्ते महेद्रेण पप्रच्छुस्तत्प्रयोजनम् । किमर्थं हि सुरश्रेष्ठ संस्मृतास्तु वयं त्वया ॥३०९॥ शक्रः प्रोवाच शृण्वंतु भगवंत: प्रयोजनम् । हिमाचले तपो घोरं तप्यते भूधरात्मजा ॥३०२॥ तस्याभिमतयोगेन भवंतः कर्तुमर्हथ । तपःसमापनं देव्या जगदर्थे त्वरान्विताः ॥३०३॥ तथेत्युक्त्वा ततः शैलं सिद्धसंघातसेवितम् । ऊचुरागम्य मुनयस्तामथो मधुराक्षरम् ॥३०४॥ पुत्रि कस्ते व्यवसितः कामः कमललोचने । तानुवाच ततो देवी सादरं गौरवान्मुनीन् ॥३०५॥ देव्युवाच तपस्यंतो महाभागाः प्रोह्य मौनं भवादृशाम् । वंदनाय नियुक्ताधीर्याचयत्यविकल्पितम्॥३०६॥ सुप्रसन्नमुखा यूयं गृहीत्वासनमादितः । उपविष्टाः श्रमं मुक्त्वा ततः प्रक्ष्यथ मामनु ॥३०७॥ इत्युक्तास्ते ततश्चक्रुस्तत्रासनपरिग्रहम् । सा च तान्विधिवत्पूर्वं पूजयित्वा विधानतः ॥३०८॥ उवाचादित्यसंकाशान्मुनीन्सप्त ऋषीन् शनैः । त्यक्त्वा ब्रतात्मकं मौनं नत्वा च विधिवन्मुनीन्॥३०९॥ भगवंतोपि मौनांते तस्याः सप्तर्षयोप्यथ । गौरवाधारतां प्राप्तां पप्रच्छुस्तां पुनस्तथा ॥३९०॥ सापि गौरवगर्भेण मनसा चारुहासिनी। मुनीन्सर्वास्तथालोक्य प्रोवाच प्रोह्य वाग्यमम् ॥३१९॥ रहित तथा घने पल्लव से भरा हुआ था वह वृक्ष ॥२९६॥ वहाँ पर पार्वती ने अपने वस्त्रों और आभूषणों का परित्याग करके दिव्य वल्कलों तथा कुश निर्मित मेखला को धारण किया ॥२९७॥ वह तीन बार स्नान करती थी तथा पाटलपुष्पों का आहार सौ वर्षों तक करती रही । उसके बाद उसने सौ वर्ष पुराने पत्तों को खाकर बिताया॥२९८॥ तपस्या की खजाना के समान वहा पार्वती निराहार रही । उसके वाद उस तपस्या की अग्नि से सभी प्राणी उद्विग्न हो गये ॥२९९॥ तदनन्तर इन्द्र ने सप्तर्षियों का स्मरण किया । वे सभी महर्षि प्रसन्नता पूर्वक इन्द्र के पास आये॥३००॥ इन्द्र ने उन सभी महर्षियों की पूजा की इसके वाद महर्षियों ने अपने स्मरण किए जाने के प्रयोजन के विषय में पूछा ऋषियों ने कहा-- हे सुरश्रेष्ठ ! आपने हमलोगों का स्मरण किसलिए किया है 2॥३० १॥ शक्र ने कहा-- हे भगवन् आपलोग उस प्रयोजन को सुनें इन्द्र ने कहा-- हिमालय पर्वत पर हिमालय पुत्री घोर तपस्या कर रही हैं ॥३०२॥ आपलोग उसके अभिमत योग को करे |आपलोग जगत का कल्याण करने के लिए उसकी तपस्या को शीघ्र समाप्त करायें ॥३०३॥ ठीक है; इसतरह कहकर ऋषिगण सिद्ध समूह से सेवित हिमालय पर्वत पर आये । आकर उन लोगों ने मधुर वाणी में पार्वती से कहा ॥३०४॥ हे कमल के समान नेत्र वाली पुत्रि ! तुम क्या प्राप्त करना चाहती हो ? उन मुनियों के गौरव का अनुभव करती हुई देवी पार्वती ने उन सबों से कहा ॥३०५॥ देवी पार्वती ने कहा- हे तपस्वि महाभागों ! आप जैसे महापुरुषों का वन्दन करने के लिए विकल्प रहित नियुक्त बुद्धि से बन्दन करना उत्कृष्ट होता है ॥३०६॥ पहले आप लोग प्रसन्नता पूर्वक आसन ग्रहण करें; बैठ जाने के पश्चात् थकान मिटा लेने के पश्चात् आपलोग हमसे पूछें ॥३०७।। इसतरह से कहने पर मुनियों ने आसन ग्रहण किया । पार्वती देवी ने भी सर्वप्रथम उन मुनियों की विधपूर्वक पूजा की ॥३०८॥ इसके पश्चात् सूर्य के समान देदीप्यमान उन सप्त ऋषियों से अपना ब्रतात्मक मौन भङ्ग करके तथा सविधि प्रणाम करके कहा ॥३०९॥ सप्त ऋषियों ने भी

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