Srishti Khanda Extracted Page 600
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-600
Sanskrit Original
हिमवानुवाच उमेति चापलं पुत्रि नक्षमं तावकं वपुः ॥२८३॥ सोढुं क्लेशानुरूपस्य तपसः सौम्यदर्शने। भावीन्यपि च कार्याणि पदार्थानि सदैव तु ॥२८४॥ भाविनोर्था भवंत्येव बहवोऽनिच्छतोपि हि । तस्मान्न तपसा तेस्ति बाले किंचित्प्रयोजनम् ॥२८५॥ भवनं चैव गच्छामि चितयिष्यामि तत्र वै। इत्युक्ता यदा नैवगृहमन्वेति शैलजा ॥२८६॥ ततोद्रिश्चिंतयाविष्ट: स्वसुतां प्रशशंस च । ततोरिक्षे दिव्या च वागभूनद्धुवनत्रये॥२८७॥ उमेति चापलं पुत्रि त्वयोक्ता तनया यतः। उमेति नाम तेनास्या भुवनेषु भविष्यति॥२८८॥ सिद्धिमूर्तिमती त्वेषा सार्थयिष्यति चितितम् । इति श्रुत्वा तु वचनं स तदाकाशमंडले ॥२८९॥ अनुज्ञाय सुतां शैलो जगामाशु स्वमंदिरम्। पुलस्त्य उवाच शैलजापि ययौ शैलमगम्यमपि दैवतैः ॥२९०॥ सखीभ्यामनुयाता तु नियता नगराजजा । शृंगं हिमवतः पुण्यं नानाधातुविभूषितम् ॥२९९॥ दिव्यपुष्पलताकीर्ण भ्रमरोदधुष्टपादपम्। दिव्यप्रस्रवणोपेतं मनोर थशतोज्ज्वलम् ॥२९ २॥ नानापक्षिसमायुक्तं चक्रवाकोपशोभितम् । जलजस्थलजैः पुण्यैः प्रफुल्लैरुपशोभितम्॥२९३॥ चित्रकदरसंगुह्यं दिव्यगेहसमन्वितम् । विहंगसंघसंुष्टं कल्पपादपसंकटम् ॥२९४॥ तत्रापश्यन्महाशाखं शाखिनं हरितच्छदम् । सर्वर्तुकु सुमोपेतं चक्रवाकोपशोभितम् ॥ २९ ५॥ नानापुष्पशताकीर्ण॑ नानाविधफलान्वितम्। त्यक्तं _ सूर्यस्यरुचिभिर्भिन्नसंहतपल्लवम् ॥२९६॥ a शरीर तपस्या के योग्य नहीं है ॥२८३॥ तुम सौम्य दर्शना हो, तुम तपस्या के क्लेशों को नहीं वर्दास्त कर सकती हो, जिस कार्य को होना होता है, वह होकर ही रहता है ॥२८४॥ बहुत अधिक नहीं चाहने पर भी अवश्यं भावी कार्य होता ही है । अतएव हे बाले ! तपस्या करने की तुम्हें कोई आवश्यकता नहीं है ॥२८५॥ हम घर चलते है, और वही जाकर विचार करते है कि मुझे क्या करना चाहिए ? इस तरह से कहने पर भी जब शैलपुत्री अपने घर नहीं जाना चाही ॥२८६॥ उसके बाद चिन्ताग्रस्त हिमवान् ने अपनी पुत्री की प्रशंसा की उसी समय त्रैलोक्य के अन्तरिक्ष में आकाश वाणी हुयी ॥२८७॥ तुमने चूकि अपनी पुत्री को उमा यह तुम्हारी चपलता कहा है; अतएव इसका उमा नाम त्रैलोक्य में विख्यात होगा ॥२८८॥ यह तो सिद्धि की मूर्ति है, यह अपने अभिलषित अर्थ की सिद्धि करेगी । आकाशमण्डल में इस वाणी को सुनकर पर्वतराज ॥२८९॥ आपनी पुत्री को तपस्या की अनुमति प्रदान कर अपने घर चले गये । पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- पार्वती भी देवताओं के लिए भी आगम्य स्थल पर चली गयी॥२९०॥ पर्वत पुत्री के साथ उसकी दो सखियाँ भी थीं । वह अनेक धातुओं से मण्डित हिमवान के पवित्र शिखर पर चली गयी॥२९१॥ वह दिव्य पुष्पों एवं लताओं से भरा था, वृक्षों पर भैरें मंडरा रहे थे । दिव्य झरने प्रवाहित हो रहे थे, तथा अनेक प्रकार के मनोरथों से वह युक्त था ॥२९२॥ वहाँ पर अनेक प्रकार के पक्षी विद्यमान थे, वह चकवा चकई से सुशोभित था । वहाँ पर स्थल कमल विकसित थे ॥२९३॥ अद्भुत कन्दराएँ वहाँ विद्यमान थीं । वहाँ दिव्य गृह विद्यमान थे । पक्षियों का समूह कलरव कर रहा था , घने कल्प वृक्षों से वह भरा हुआ था ॥२९४॥ वहाँ पर पार्वती ने हरे पत्ते वाले महान् वृक्ष को देखा । उसमे सभी ऋतुओं के पुष्प विकसित थे, चक्रवाक पक्षी से वह सुशोभित था ॥२९५॥ अनेक प्रकार के पुष्प वहाँ विखरे थे, अनेक प्रकार के फल लगे थे । सूर्य की किरणों से
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