Srishti Khanda Extracted Page 599

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-599

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Sanskrit Original

, श्रीपद्ममहापुराण नैतदल्पमहं मन्ये कारणं लोकसुंदरि । सा तस्य वचनं श्रुत्वा उवाच मधुना सह ॥२७१॥ रुदंती शोकवचनं श्वसन्ती दैन्यवर्धनम् । रतिरुवाच कामस्य दयितां भार्या रतिं मां विद्धि सुब्रत ॥२७२॥ गिरावस्मिश्च भगवान् गिरिशस्तपसि स्थितः । तेन॒ प्रत्यूहरुष्टेन क्रोधाद्विस्फार्यलोचनम्॥२७३॥ विमुच्याम्रिशिखाज्वालां कामो भस्मावशेषितः। अहं तु शरणं याता तं देवं भयविह्वला ॥२७४॥ स्तुतवत्यथ संतुष्टस्ततो मां गिरिशोऽब्रवीत् । तुष्टोहं कामदयिते कामोत्पत्तिर्भविष्यति॥२७५॥ त्वत्स्तुतिं चाप्यधीयानो नरोभक्तद्यामदाश्रय: । लप्स्यते कांक्षितं कामंनिवर्तमरणादपि ॥२७६॥ प्रतीक्षमाणा तद्वाक्यमाशावेशवशादहम् । शरीरं परिरक्षिष्ये किंचित्कालं महाद्युते ॥२७७॥ इत्युक्तस्तु तया रत्या शैलः संभ्रमभीषणः । पाणावादाय तनयां गंतुमैच्छत् स्वकं पुरम् ॥२७८॥ भाविनोऽ वश्यभावित्वाद्धवित्री भूतभाविनी। लज्जमाना सखिमुखैरुवाच पितरं गिरिम् ॥२७९॥ शैलपुत्युवाच दुर्भगेन शरीरेण किं ममानेन कारणम् । कथं च तां दशां प्राप्तश्शङ्करो मे पतिर्भवेत्॥२८०॥ तपोभिः प्राप्यतेऽ भीष्टं नासाध्यं तु तपस्यतः । दुर्भगत्वं वृथा लोके विहिते सति साधने ॥२८९॥ तपसि भ्रष्टसंदेहा ततः स्वार्थजिगीषया । एवं तपःकरिष्येऽहं यामीत्युक्तवतीं सुताम्॥२८२॥ उवाच वाचा शैलेंद्रो गह्दस्वरवर्णया । नहीं हो सकती है । कौतूहल पूर्वक उसको देखकर पर्वतराज रोती हुयी ॥२६९॥ उस नारी के निकट गये और पूछे हिमवान् ने पूछा-- हे कल्याणि ! तुम कोन हो ? किसकी पत्नी हो ? और किसलिए रो रही हो 2॥२७०॥ हे लोक सुन्दरि मुझे लगता है कि इसका कोई बहुत बड़ा कारण होगा । हिमालय की बातों को सुनकर वसन्त के साथ विद्यमान रति ने भी ॥२७१॥ रोती हुयी तथा दीर्घ नि:श्वास लेती हुयी दैन्य भरी वाणी में कहने लगी । रति ने कहा- हे सुव्रत ! में काम की प्रियतमा पत्नी रति हूँ ॥२७२॥ इस पर्वत पर भगवान् शिव तपस्यारत हैं मेरे द्वार उत्पन्न विघ्न से रुष्ट होकर उन्होंने अपनी आँखें खोलकर ॥२७३॥ उससे उत्पन्न अग्नि के द्वारा कामदेव को जलाकर भस्म कर दिया । मैं तो भयभीत होकर उनके शरण में गयी ॥२७४॥ मेरी स्तुति से प्रसन्न होकर सन्तुष्ट शिवजी ने कहा हे कामपत्नि ! मैं संतुष्ट हूँ, काम भी उत्पन्न होयेगा ।। २७५॥ तुम्हारे द्वारा की गयी स्तुति का भक्ति पूर्वक पाठ करने वाला मेरा भक्त, मृत्यु से रहित तथा अपने समस्त अभिलषित पदार्थो को प्राप्त करेगा ॥२७६॥ आशा से आशान्वित मैं उनके वाक्य की प्रतीक्षा करती हुयी मै; हे महाद्युते ! में कुछ समय तक अपने जीवन की रक्षा करूँगी।। २७७॥ रति के द्वारा इस प्रकार से कहे जाने पर हिमवान् घबरा गये और अपनी पुत्री का हाथ पकड़कर अपने घर जाना चाहे ॥२७८॥ जीवों का कल्याण करने वाली पार्वती भावी को अवश्यंमावी जानकर लज्जित होती हुयी अपनी सखी के द्वार पिता को कहवायी ॥२७९॥ शैलपुत्री पार्वती ने कहा-- मेरे इस शरीर के दुर्भाग्य पूर्ण होने के कारण ही मेरे पति शङ्करजी की यह दशा हुयी है, दूसरा कोई कारण नही हो सकता है ।।२८०॥ तपस्या के द्वारा ही अभीष्ट मनोरथ की पूर्ति होती है । तपस्या के द्वारा कुछ भी असाध्य नहीं है । लोक में साधन के रहने पर दुर्माग्यता तो व्यर्थ है ॥२८१॥ अपने स्वार्थ को प्राप्त करने की इच्छा से पार्वती के कहने पर ॥२८२॥ शैलराज ने अपने रुद्धकण्ठ से गद्गद वाणी में कहा हिमवान् ने कहा-- हे उमे ! हे पुत्रि ! यह तुम्हारी चपलता है, तुम्हारा

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