Srishti Khanda Extracted Page 598
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-598
Sanskrit Original
त्वामिंदुमौलिं शरणं प्रपन्नाप्रियाप्तयेहं सहसा महेशम् । प्रयच्छ मे कामयशः समृद्धिं पतिं विना तंभगवन्नजीवे ॥२५९॥ प्रियः प्रियायाः पुरुषेशनित्यस्ततोपरः कोभुवनेष्विहास्ति । प्रभुः प्रभावी प्रभवः प्रियाणां प्रवीणपर्याय परापरंतपः ॥२६०॥ त्वमेव नाथो भुवनस्य गोप्ता दयालुरुन्मूलितभक्तभीतिः । इत्थंस्तुतः शङ्करइद्रमौलिर्वृषाकपिर्मन्मथकांतया तु ॥२६९॥ तुतोष दोषाकरखंडधारी उवाच चैनां मधुरं निरीक्ष्य । शङ्कर उवाच भविष्यति च कामोयं कालेकांतेऽचिरादथ ॥२६२॥ अनंग इति लोकेषु सविख्यातिं गमिष्यति । इत्युक्ता शिरसा वंद्य गिरीशं कामवल्लभा ॥२६३॥ जगामोपवनं चान्यद्रतिस्तुहिनपर्वते । रुरोद चापिबहुशो दीना रम्ये स्थले स्थले॥२६४॥ मरणव्यवसायापि निवृत्ता च शिवाज्ञया । अथ नारदवाक्येन चोदितो हिमभूधरः ॥२६५॥ कृताभरणसंस्कारां कृतकौतुकमंगलाम् । स्वर्गपुष्पकृतापीडां शुभ्रचीनांशुकांबराम्॥२६६॥ सखीभ्यां संयुतां शैलो गृहीत्वा स्वसुतां ततः। जगाम सुभगे योगे तदा संपूर्णमानसः ॥२६७॥ सकाननान्युपाक्रम्य वनान्युपवनानि च । ददर्श रुदतीं नारीमप्रतर्क्यां महौजसम् ॥२६८॥ नरूपेणेदूशीलोके रम्येषु वनसानुषु। कौतुकेन परामृष्टस्तां दृष्ट्वा रुदतीं गिरिः॥२६९॥ उपसृप्य ततस्तस्यानिकटं सोप्यपृच्छत। हिमवानुवाच कासि कस्यासि कल्याणि किमर्थं चापि रोदिषि ॥२७०॥ है॥२५८॥ मैं अपने पति को प्राप्त करने के लिए चन्द्रमौलि आपकी शरण में आयी हूँ । आप मुझे अभिलषित कामना, यश तथा समृद्धि को प्रदान करें । मैं पति के बिना जीवित नहीं रह सकती हूँ ॥२५९॥ हे पुरुषश्रेष्ठ ! पत्नी का प्रिय तो सदा उसका पति ही होता है । उससे बढकर उसके लिए (पत्नी के लिए) दूसरा कोन प्रभावी, प्रभु, शत्रुओं को संतप्त करने वाले तथा प्रवीण हो सकता है ॥२६०। आप ही भुवनों के स्वामी और रक्षक हैं । आप दयालु तथा भक्तों के भय को विनष्ट करने वाले हैं । इसतरह कामदेव की पत्नी के द्वारा स्तुति किए जाने पर, चन्द्रमौलि ॥२६१॥ चन्द्रकला को अपने शिर पर धारण करने वाले भगवान् शिव प्रसन्न हो गये और उसको देखकर मधुर वाणी में कहने लगे । शङ्करजी ने कहा-- तुम्हारा पति काम शीघ्र ही उत्पन्न होयेगा ॥२६२॥ वह संसार में अनङ्ग के नाम से विख्यात होगा । इसतरह कहने पर रति ने भगवान् शिव को शिर झुकाकार प्रणम किया ॥२६३॥ और हिमाचल के दूसरे उपवन में चली गयी । उसने विभिन्न स्थलों पर दीन होकर रुदन किया ॥२६४॥ वह मर जाना चाहती थी किन्तु शिवजी ने उसे ऐसा करने से मना कर दिया । उसके बाद नारदजी के वाक्य से प्रेरित होकर हिमालय पर्वत।।२६५।। अलङ्कार से अलङ्कृत तथा सजी धजी हुयी, स्वर्गीय पुष्पों से जिसका जूड़ा बन्धा हुआ था, स्वच्छ चीनांशुक (रेशमी वस्र) को धारण की हुयी ॥२६६॥ तथा दो सखियों के साथ विद्यमान अपनी पुत्री को लेकर हिमालय सुन्दर योग में प्रसन्नता पूर्ण मन से काननों (वनों) तथा उपवनों में गये । वहाँ पर उन्होंने अत्यन्त सुन्दरी, वहाँ उन्होंने महाओज: सम्पन्न नारी को रोते हुए देखा ॥२६८॥ संसार में ऐसी सुन्दरी मनोहर वन के शिखरों पर
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