Srishti Khanda Extracted Page 597
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-597
Sanskrit Original
भृंगानुयातां संगृह्य पुष्पितां सहकारजाम्। लतां पत्रद्रुमच्छन्नां जातां परभृतां सखीम् ॥२५०॥ निबध्य तु जटाजूटं कुटिलैरलकै रति: । उर्र्त्य गात्रं शुभ्रेण हृद्येन स्मर भस्मना ॥२ ५१॥ जानुभ्यामवनिं गत्वा प्रोवाचेन्दुविभूषणम् । रतिरुवाच नमः शिवायास्तु मनोमयाय जगन्मयायाद्भुतवर्त्मने नमः ॥२५२॥ नमःशिवायास्तु सुरर्चिताय तुभ्यं सदा भक्तकृपापराय । नमो भावायास्तु भवोद्भवाय नमोस्तु ते ध्वस्तमनोभवाय ॥२५३॥ नमोस्तु मायामदनाश्रयाय नमोनिसर्गामलभूषिताय । नमोस्त्वमेयाय गुणाय नाय नमोस्तुसिद्धायपुरातनाय ॥२५४॥ नमःशरण्याय नमोऽ गुणाय नमोस्तुते भीमगणानुगाय । नमोस्तु नानाभुवनद्धिकर्त्रे नमोस्तु भक्ताभिमतप्रदाय।। २५ ५॥ नमोथ कर्मप्रसवे नमः सदा अनंतरूपायसदैव तुभ्यम् । असह्याकोपाय सदैव तुभ्यं शशांकचिह्णाय नमोस्तु तुभ्यम् ॥२५६॥ असीमलीलापरमस्तुताय वृषेंद्रयानाय पुरांतकाय। नमः प्रसिद्धाय महौषधाय नमोस्तु नानाविधरूपकाय ॥२५७॥ नमोस्तु कालाय नमः कलाय नमोस्तु ते कालकलातिगाय । चराचराचार्यविचार्यवर्यमाचार्यमुत्प्रेक्षित भूतसर्गम् ॥२५८॥ वसन्त ने रति को सान्त्वना प्रदान किया । उसके पश्चात् रति ने चन्द्रमौलि त्रिलोचन भगवान् शङ्कर की शरणागति की॥२४९॥ तदनन्तर जिस पर भौरें मडरा रहे थे ऐसी विकसित आम की लता को लेकर जो पत्ते तथा वृक्ष से पृथक् हो गयी थी, जो कोयल की सखी थी उस ॥२५०॥ अपने घुंघराले अलकों से जटा बनाकर रति ने कामदेव के भस्म को अपने सम्पूर्ण शरीर में पोतकर ॥२५१॥ दोनों घुटनों को पृथिवी पर टेककर भगवान् शङ्कर से कही रति ने कहा--- मनोमय जगत्स्वरूप, अद्भुत मार्गावलम्बी भगवान् शिव को नमस्कार है ॥२५२॥ सदा भक्तों पर कृपा करने वाले तथा देवताओं से पूजित आप भगवान् शिव को नमस्कार है, कामदेव को भस्म करने वाले तथा संसार की सृष्टि करने वाले आप शिव को नमस्कार है ॥२५३॥ मायामय काम के आश्रयभूत तथा स्वाभाविक रूप से निर्मल तथा अलङ्कृत शिव को नमस्कार है । अप्रमेय तथा समस्त गुणों के आश्रय तथा प्राचीन सिद्ध भगवान् शिव को नमस्कार है ॥२५४॥ सबों को अपने शरण में रखने वाले प्राकृतिक गुणों से रहित तथा भयङ्कर गुणों से अनुसृत शिव को नमस्कार है । अनेक भुवनों की समृद्धि करने वाले तथा अपने भक्तों को अभिप्रेत फल प्रदान करने वाले शिव को नमस्कार है ॥२५५॥ कर्मो को उत्पन्न करने वाले, हे अनन्त रूपों वाले भगवन् शिव ! आपको नमस्कार है । चन्द्रमोलि तथा असह्य कोप करने वाले भगवान् शिव आप को नमस्कार है ॥२५६॥ असीम लीलाओं को करने वाले, रूप से जिनकी स्तुति की जाती है, वृषेन्द्र नन्दी को अपना वाहन बनाने वाले तथा त्रिपुर का विनाश करने वाले आपको नमस्कार है । प्रसिद्धमहौषध स्वरूप तथा अनेक प्रकार के रूपों को धारण करने वाले भगवान् शिव को नमस्कार है ॥२५७॥ काल स्वरूप, कला स्वरूप तथा काल की कला का विषय नहीं बनने वाले, चराचर के आचार्य विचारणीय विषयों का विचार करने में श्रेष्ठ आचार्य तथा भूतसर्ग की सृष्टि करने वाले आपको नमस्कार
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