Srishti Khanda Extracted Page 596
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-596
Sanskrit Original
हृदयान्निर्गत: सोऽथ वासनाव्यसनात्मक: । बहिस्थलं समासाद्य उपतस्थे झषध्वज:॥२३४॥ अनुयातो हि साहोन मित्रेण मधुना सह । सहकारतरोर्हएवामंदमारुतनिर्धुतम् ॥२३५॥ स्तबकं मदनो रम्यं हरवक्षसि सत्वरम् । मुमोच मोहनं नाम मार्गणं मकरध्वजः ॥२३६॥ स तस्य हृदये शुद्धे नामशाली महाशरः। पपात परुषः प्रांशुः पुष्पबाणो विमोहनः ॥२३७॥ ततः करणसंदोहे विद्धे तु हृदये भवः। बभूव भूतपोऽकंप्यथैर्योपि मदनोन्मुखः ॥२३८॥ ततः प्रभुत्वाद्धावानामावेशं स्वमपश्यत। वाक्यं बहुवभाषेऽथ प्रत्यूहप्रसवात्मकम् ॥२३९॥ ततः कोपानलोद्धूतघोरहुंकारभीषणे। बभूव वदनेनेत्रं तृतीयमनलाकुलम् ॥२४०॥ रुद्रस्य रौद्रवपुषो जगत्संहारभैरवम् । तदंतिकस्थे . मदने व्यस्फारयतधूर्जटिः ॥२४९॥ त्नत्रविस्फुलिंगेन क्रोशतां नाकवासिनाम् । गमितोभस्मतां तूर्ण कंदर्पः कामदर्पकः॥२४२॥ स तु तं भसासात्कृत्वा हरनेत्रोद्भवोऽनलः । व्यजृंभतजगद्ग्धुं ज्ञात्वा हुंकारघस्मरम् ॥२४३॥ ततो भवो जगद्धेतो व्यभजत् जातवेदसम्। सहकारे मधौ चन्दर सुमनः स्सवपरेष्वपि॥२४४॥ भृंगेषु कोकिला ये च विभागेनस्मरानलम् । सबाह्याभ्यंतरे विद्धो हरोऽथ स्मरमार्गणैः॥२४५॥ भागेष्वेतेषु संविष्टं वीक्षतीवहुताशनम्। विभक्तं लोकसंक्षोभकरं दुर्वारजृंभितम् ॥२४६॥ तत््रप्तस्नेहसंपूर्णकामेन हृदये किल। ज्वलन्नहर्निशं भीमो दुःखस्य वशगो भवत् ॥२४७॥ विलोक्यहरहुंकारज्वालाभस्मीकृतं स्मरम् । विललाप रतिः क्कूरं बंधुना मधुना सह ॥२४८॥ ततोविलप्य बहुशो मधुना परिसांत्विता । जगाम शरणं देवमिंदुमौलिं त्रिलोचनम् ॥२४९॥ Dn आविष्ट होने के कारण इच्छारूपी शरीर वाला, दुर्य तथा दोषाश्रय महान् आशय वाला कामदेव जलने लगा॥२३३॥ उसके पश्चात् वह वासना रूपी व्यसन से युक्त कामदेव बाहर निकल कर खड़ा हो गया ॥२३४॥ उसके साथ उसका मित्र वसन्त विद्यमान था । मन्दवायु से झूमते हुए आम के मनोहर वृक्ष के गुच्छों को देखकर कामदेव ने शङ्करजी के वक्षःस्थल पर मोहनाख का प्रहार किया ॥२३५-२३६॥ वह प्रख्यात महाबाण शङ्करजी के शुद्ध हदय में जोर से लगा ॥२३७॥ उसके बाद इन्द्रिय समूह तथा हृदय के विद्ध हो जाने पर भूतों की रक्षा करने वाले तथा अविचल धैर्य सम्पन्न शिव कामदेव की ओर देखे ॥२३८॥ उसके पश्चात् समस्त भाव पदार्थो के स्वामी अपने आवेश को देखे और बहुत से विष्नोत्पादक वाक्यों को ब्रोले ॥२३९॥ तदनन्तर कोपाग्नि से उत्पन्न तथा घोर हुकार से भयङ्कर मुखड़े पर तीसरा नेत्र अग्नि से व्याप्त हो गया ॥२४०॥ रुद्र के भयङ्कर शरीर का जगत् का संहार करने वाले भयङ्कर उस अग्नि को शङ्करजी ने सन्निकट में विद्यमान कामदेव पर प्रकट किया ॥२४१॥ उनके नेत्रकी चिनगारी से चिल्लाते हुए देवताओं के बीच में विद्यमान, काम के दर्प से युक्त कामदेव शीघ्र ही जलकर भस्म हो गया ॥२४२॥ शङ्करजी के नेत्र से उत्पन्न वह अग्नि कामदेव को जलाकर हुंकार जन्य तेज को जानकर संसार को जला देने के लिए बढ गया।।२४३॥ उसके बाद शङ्करजी ने जगत् का कल्याण करने के लिए उस अग्नि को आम्रवृक्ष, वसन्त, चन्द्रमा, पुष्प, भ्रमर तथा कोकिलाएँ इन सबों में विभक्त कर दिया । उसके बाद काम के बाणों से भीतर तथा बाहर विद्ध हुए शङ्करजी इन भागों में विभक्त काम को देखते हुए संसार को संक्षुब्ध करने वाले तथा जिसका विजृभण रोका नहीं जा सकता है उसको विभक्त कर दिया ॥२४६॥ उसकी प्राप्ति जन्य स्नेह के कारण कामपूर्ण हृदय के द्वारा शङ्करजी रात-दिन संतप्त होते हुए दुःखी हो गये ॥२४७॥ शङ्करजी की ज्वाला से भस्म हुए कामदेव को देखकर अपने बान्धव वसन्त के साथ रति अत्यन्त करुण विलाप करने लगी ॥२४८॥ उसके बाद बहुत अधिक विलाप करंके
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