Srishti Khanda Extracted Page 595
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-595
Sanskrit Original
इंद्रियग्राममावृत्य रम्यसाधनसंविधिः। चिंतयित्वेति मदनो भूतभर्तुस्तदाश्रमम् ॥२९९॥ जगाम जगतीसारं सरलद्टुमवेदिकम् । शांतसत्वसमाकीर्णमचलं प्राणिसंकुलम्॥२२०॥ नानापुष्पलताजालं सानुसंस्थगणेश्वरम् । निर्व्यग्रवृषभोदघुष्टं नीलशाद्दलसानुकम् ॥२२१॥ तत्रापश्यन्त्रनेत्रस्य रम्यं कंचिद्द्वितीयकम्। वीरकं वीरलोकेशमीशानसदृशद्युतिम्॥२ २२॥ पक्वं कुंकुमकिंजल्कपुंजपिंगजटासटम् । वेत्रपाणिं तमव्यग्रमुग्र चाभद्रभूषणम्॥२२३॥ ततो निमीलितोन्निद्रपद्मपत्रांतलोचनम् । प्रेक्षमाणमृजुस्थानं नासावंशाग्रगोचरम् ॥२२४॥ अतीवरम्यसिहेद्रचर्मलंबोत्तरीयकम् । श्रवणाहिफणोम्मुक्तनिश्वासानलपिंगलम् ॥२२५॥ प्रेखत्कपोलपर्यंतचुबिलंबिजटाचयम् । कृतवासुकिपर्यंतं नाभिमूलनिवेशितम्॥२२६॥ ब्रह्मांजलिस्थनासाग्रनिबद्धोरगभूषणम् । ददर्श शङ्करं कामः क्रमप्राप्तांतिकः शनैः ॥२२७॥ ततो भ्रमरझंकारमालंब्य ट्रुमसानुगम् ।प्रविष्ट: कर्णरंध्रेण भवस्य मदनो मनः ॥२२८॥ शाङ्करस्तमथाकर्ण्यं मधुरं मदनाश्रयम्। सस्मार दक्षतनयां दयितां रंतुमानसः ॥२२९॥ तत: शिवस्य शनकैस्तिरोधायातिनिर्मला । समाधिभावनातस्थौ लक्ष्यप्रत्यक्षरूपिणी ॥२३०॥ ततस्तन्मयतां यातः प्रत्यूह पिहिताशयः । विवेशविबुधाधीशो विकृतिं मदनात्मिकाम् ॥२३९॥ ईषत्क्रोधसमाविष्टो धैर्यमालंब्ध्य घूर्जटिः । निरस्य मदनं स्थित्वा योगमायासमावृतः ॥२३२॥ स तया मायया विष्टो जज्वालमदनस्ततः । इच्छाशरीरोदुर्जञेयो दोषावासो महायशः ॥२३३॥ दुस्तर मैं तप: स्थित शङ्करजी के स्थिर मन वाले शङ्करजी के विषय में इन्द्रिय समूह को आच्छन्न करके मनोज्ञ साधनों से सम्पन्न अपना कार्य करना प्रारम्भ करूंगा । इसतरह से विचार करके कामदेव ने शङ्करजी के आश्रम में प्रवेश किया ॥२१७-२१९॥ वह संसार के सारभूत सरल वृक्षों से जिसकी वेदी बनी थी, शान्त जीव जिसमें चारो ओर भरे थे ॥२२०॥ उस समय अनेक प्रकार के पुष्पों एवं लताओं से घिरे हुए शिखर पर गणेश्वर बैठे थे । व्यग्रताहीन वृषभ हुंकार भर रहा था । उस शिखर पर हरियाली छायी हुयी थी ॥२२१॥ वहाँ पर कामदेव ने शङ्करजी के ही समान मनोहर किसी दूसरे वीरक को देखा, जिसकी कान्ति शङ्करजी के समान थी, तथा जो वीर लोकेश था ॥२२२॥ उसकी जटा पके हुए कुंकुम के केसर के समान पीली थी । वह अपने हाथ में वेत्र लिए हुए था, व्यग्रता रहित वह उग्र तथा अभद्र आभूषणों को धारण किए था ॥२२३॥ उसके बाद कामदेव ने विकसित कमल दल के समान सीधे अपनी नासिका के अग्रभाग को देखने वाले ॥२२४॥ जिनके कन्धे पर मृगराज के चर्म से बना उत्तरीय लटक रहा था, कानों में लगे सर्प के फुफकार की ज्वालाग्नि से पीले से प्रतीत होने वाले ॥२२५॥ जिनकी झूलती हुयी जटा गालों तक लटक रही थी, वासुकि सर्प से बना यज्ञोपवीत नाभी पर्यन्त लटक रहा था ॥२२६॥ ब्रह्माज्ञलि पर विद्यमान नासिका के अग्रभाग में सर्प निर्मित भूषण लगा हुआ था । इस प्रकार के शङ्करजी को कामदेव ने देखा और धीरे से उनके सन्निकट में आया ॥२२७॥ उसके पश्चात् शिखर के वृक्षों पर विद्यमान भ्रमरों के झंकार के सहारे कामदेव ने शङ्करजी के कान के छिद्र से मन में प्रवेश किया ॥२२८॥ उसके बाद उस कामात्मक झंकार को सुनकर रमण करने की इच्छा से शङ्करजी. ने दक्ष की पुत्री (सती) का स्मरण किया ॥२२९॥ उसके बाद लक्ष्य के साक्षात्कार स्वरूपिणी अत्यन्त निर्मल समाधि की भावना तिरोहित हो गयी ॥२३०॥ उसके बाद विध्नित अन्तःकरण वाले देवताओं के स्वामि तन्मय हो गये और उनमें कामात्मक विकार उत्पन्न हो गया ॥२३१॥ उसके बाद थोड़े से क्रोध युक्त तथा योगमाया से समावृत भगवान् शिव धैर्य धारण करके काम को दूर करके स्थित हो गये ॥२३२॥ उस माया के द्राण
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