Srishti Khanda Extracted Page 594

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-594

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Sanskrit Original

प्रोवाच पंचबाणो5 थ वाक्यं भीतः शतक्रतुम्। काम उवाच अनया देवसामग्र्या मुनिदानवभीमया ॥२०६॥ दु;साधश्शंकरो देवः किं न वेत्सि जगत््रभो। तस्य देवस्य वेत्थ त्वं कारणं पदमव्ययम् ॥२०७॥ प्रायः प्रसादे कोपेऽपि सर्व हि महतां महत् । सर्वोपभोगसारं हि सौंदर्य स्वर्गसंभवम् ॥२०८॥ विशेषं कांक्षतां शक्र सामाऱ्याद्श्रशनं फलात्। श्रुत्वैतद्वचनं शक्रस्तमुवाचामरैर्युतः ॥२०९॥ शक्र उवाच वयं प्रमाणं ते तत्र रतिकांत न संशयः । संदंशेन विना शक्तिरयस्कान्तस्य नेष्यते॥२१०॥ कस्यचिच्चक्वचिदृष्टं सामर्थ्यं न तु सर्वतः । इत्युक्तः प्रययौ कामः सहायं मधुमाश्रितः ॥२११॥ रतियुक्तो जगामाशु प्रस्थं तुहिनभूभृतः । स तु प्राप्याकरोच्चितां कार्यस्योपायपूर्विकाम् ॥२१२॥ महात्मानो हि निष्कंपा मनस्तेषां सुदुर्जयम् । तदादावेव संक्षोभ्य तेत्थं तस्य जयो भवेत् ॥२१३॥ संसिद्धिः प्रायशश्चैव पूर्व संशोध्य मानसम् । कथमेवंविधैभविद्वेषानुगमन्न॑ विना ॥२१४॥ क्रोधः क्रूरतरात्संगाद्धीषणे्ष्यामहासखी । चापल्यान्मूध्निविध्वस्तधैर्याधारमहाबला ॥२९५॥ तामस्यविनियोक्ष्यामि मनसो विकृतिं पुरः । पिधाय धैर्यद्वाराणि संतोषमपकृष्य च ॥२१६॥ अवगंतुं हि मां तत्र न कश्चिदिह पंडित: । विकल्पमात्रसंस्थानं विरूपाक्षमनोभवम्॥२ ९१७॥ प्रविश्याथ क्रियारंभी गंभीरावर्त्तदुस्तरः। भविष्यामि हरस्याहं तपः स्थस्य स्थिरात्मनः ॥२९८॥ करें । पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिए इन्द्र के द्वारा इस प्रकार से कहे जाने पर॥२०५॥ भयभीत काम ने इन्द्र से कहा काम ने कहा-- हे देव ! मुनियों तथा दानव के लिए भयङ्कर इस सामग्री के द्वारा।२०६॥ शङ्करजी को वशवर्ती नहीं बनाया जा सकता है, कया इस बात को आप नहीं जानते हैं । आप तो जानते हैं कि वे निर्विकार पुरुष हैं ॥२०७॥ प्रसाद तथा कोप दोनों के विषय में वे सवसे महान हैं । सबों के उपभोग का सार स्वर्ग में उत्पन्न सौन्दर्य है ।।२०८॥ अतएव हे इन्द्र ! आप कोई विशेष उपाय कीजिये जिसका परिणाम नाश ही होना है, उस साधारण साधन से कोई लाभ नहीं है । कामदेव की बातों को सुनकर देवताओं के साथ विद्यमान इन्द्र ने कहा ॥२०९॥ इन्द्र ने कहा-- हें रतिकान्त ! तुम्हारे विषय में हमसब लोग प्रमाण हैं । विना संदंश (क्षोम) के अयस्कान्त मणि में भी शक्ति नहीं आती है ।॥।२१०॥ किसी का कहीं पर भी ही सामर्थ्य दिखायी देता है सर्वत्र नहीं । इस तरह से कहने पर वसन्त को सहायक बनाकर कामदेव ने प्रस्थान किया ॥२११॥ रति के साथ वह शीघ्र हिमालय के शिखर पर गया वहाँ पर जाकर वह सोचने लगा कि किस उपाय से कार्य की सिद्धि हो॥२१२॥ महापुरुषों में क्षोम नहीं हो सकता है । उनके मन को जीतना कठिन है । अतएव सर्वप्रथम संक्षोभ उत्पन्न करना चाहिए, अन्यथा शङ्करजी को जीता नहीं जा सकता है ॥२१३॥ प्राय: पहले मन का संशोधन करके ही सिद्धि (सफलता) मिलती है । द्वेष का अनुगमन किए बिना इसतरह के साधनों से सिद्धि कैसे संभव है ?॥२१४॥ क्रोध अत्यन्त क्रूर है, उसकी सहायिका भयङ्कर ईर्ष्या हैमहाबलवती वह अपनी चपलता के द्वारा धैर्य को विध्वस्त कर देती है ॥२१५॥ सर्वप्रथम इनके मन में विकार उत्पन्न करने के लिए उसी का मैं प्रयोग करूँगा । धैर्य के समस्त मार्गो को अवरुद्ध करके तथा सन्तोष को भगाकर ॥२१६॥ कोई भी मुझको जानने में निपुण नहीं है । केवल विकल्प ही जिसका संस्थान है उन शङ्करजी के मन में उत्पन्न होने वाले काम में प्रवेश करके गंभीर आवर्त के कारण

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