Srishti Khanda Extracted Page 593
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-593
Sanskrit Original
RE श्रीपद्यमहापुराण आनंदादेव चाहारि हदयं मे महामुने। नाध्यवस्यति कृत्यानां विभागप्रविचारणम् ॥१९३॥ भवद्विधानां नियतममोघं दर्शनं मुने । भवद्धिरेवहिप्रोक्तं निवासायात्मरूपिणाम् ॥१९४॥ मुनीनां देवतानां च स्वयं कर्तास्मि कल्मषम् । तथापि वस्तुन्येकस्त्राज्ञा मे संप्रदीयताम् ॥१९५॥ इत्युक्तवति शैलेंद्रे स॒ तदा हर्षनिर्भरः। उवाच नारदो वाक्यं कृतं सर्वमिति प्रभो ॥९९६॥ सुरकार्ये स एवार्थ स्तवापि सुमहत्तरः । इत्युक्त्वा नारदः शीघ्रं जगाम त्रिदिवं ततः ॥१९७॥ स गत्वा देवभवनं महेद्रं संददर्श ह। ततोनुरूपे स मुनिरूपविष्टो महासने॥९९८॥ पृष्टः शक्रेण प्रोवाच गिरिजासंश्रयां कथाम्। नारद उवाच यन्मह्यामुक्तं कर्तव्यं तन्मया कृतमेवहि ॥१९९॥ कितु पंचशरस्येषुगोचरत्वमपेक्षितम् । इत्युक्तो देवराजस्तु मुनिना कार्यदर्शिना॥२००॥ चूतांकुरात्नं सस्मार भगवान्पाकशासनः । स॒ स्मृतस्तु तदा क्षिप्रं सहस्राक्षेण धीमता ॥२०९॥ उपतस्थे रतियुतः सविलासो झषध्वजः । प्रादुर्भूतं च तं दृष्ट्वा शक्रः प्रोवाच मन्मथम्॥२०२॥ शक्र उवाच उपदेशेन बहुना किं त्वां प्रति रतिप्रिय। मनोभवोसि तेन त्वं वेत्सि भूतमनोगतम् ॥२०३॥ तद्यथानुक्रमं तु त्वं कुरु नाकसदां प्रियम्। शङ्करं योजय क्षिप्रं गिरिपुत्र्या मनोभव ॥२०४॥ संयुक्तो मधुनानेन गच्छ रत्या सहायवान् । इत्युक्तो मदनस्तेन शक्रेण स्वार्थसिद्धये॥२०५॥ हूँ ॥१९२॥ हे महामुने ! मेरा हदय आनन्द से भर गया है । में इस समय ऐसा कुछ भी निश्चय नहीं कर पा रहा हूँ कि मुझे सम्प्रति क्या करना चाहिए ?॥१९३॥ हे मुने ! आप जैसे महापुरुषों का दर्शन निश्चित रूप से कल्याणकारी होता है । आपलोगों ने ही कहा है कि मैं आत्मा स्वरूप पुरुषों का निवास स्थल हूँ ॥ १९४॥ मुझमें देवताओं और मुनियों का निवास है, स्वयं तो में पापी हूँ फिर भी आप मुझे किसी कार्य को सम्पादित करने के लिए आज्ञा प्रदान करें ॥१९५॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- पर्वतराज के इस प्रकार से कहने पर अत्यन्त प्रसन्नता से भरकर देवर्षि नारदजी ने कहा हे प्रभो ! अब सब कुछ सम्पन्न हो गया ॥१९६॥ देवताओं का जो कार्य है, वही आपका भी महान् कर्तव्य है । यह कहकर नारदजी शीघ्र ही स्वर्ग लोक में चले गये ॥१९७॥ वे देवताओं के लोक में जाकर इन्द्र से मिले । उसके बाद महामुनि नारदजी अपने स्वरूपानुरूप सिंहासन पर जब बैठ गये ॥१९८॥ उसके बाद इन्द्र के द्वारा पूछे जाने पर उन्होंने पार्वती विषयक सारी बातों को बतलाया । नारदजी ने कहा-- आपने जो मुझे जो करने के लिए कहा था वह मैंने कर दिया ॥१९९॥ अब कामदेव के बाणों का विषय बनाने की आवश्यकता है । कार्य के विषय में अभिज्ञ देवर्षि के द्वारा इस तरह से कहे जाने पर ॥२००॥ पाक नामक दैत्य का वध करने वाले देवराज इन्द्र ने कामदेव का स्मरण किया । बुद्धिमान इन्द्र के द्वारा स्मरण किए जाते ही ॥२०१॥ कामदेव अपनी पत्नी रति के साथ विलास पूर्वक वहाँ उपस्थित हो गये । प्रकट हुए कामदेव को देखकर इन्द्र ने उनसे कहा ॥२०२॥ इन्द्र ने कहा-- हे रतिप्रिय ! आपको बहुत अधिक सिखाने की कोई आवश्यकता नहीं है, आप तो मनोभव हैं, अतएव किसी के मन में क्या है ? इस बात को आप स्वयं जान जाते हैं ॥२०३॥ अतएवजिसतरह से प्रारम्भ करना उचित हो उसी तरह देवताओं का आप प्रिय कार्य करें । हे मनोभव ! आप शीघ्र ही भगवान् शिव को हिमाचल की पुत्री से मिला दें ॥२०४॥ अतएव आप वसन्त तथा रति के साथ शीघ्र ही प्रस्थान
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